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अर्थातः आखिरी रास्ता

गौर करिए कि इतने भारी संसाधन पचाने के बावजूद बजट हमारी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं लाता. अर्थव्यवस्था में कुल पूंजी निवेश की पांच फीसद जरूरत भी सरकार पूरी नहीं कर पाती.

अर्थात‍् अर्थात‍्

सरकारी कंपनियों और संपत्ति‍यों की बिक्री पर गुस्साने से पहले बजट के आंकड़े करीब से पढि़ए, आत्मनिर्भरता का सबसे निर्मम सत्य वहां छिपा है. शुक्र है कि सरकार ने यह सच स्वीकार कर लिया कि आम लोगों की बचत निचोडऩे और टैक्स लगाने की अधि‍कतम सीमा आ चुकी है. 

आर्थि‍क समीक्षा ने कहा कि मंदी थमने के बावजूद बेकारी में बढ़ोतरी जारी रह सकती है (इकोनॉमिक हिस्टीरिसिस). इसके बावजूद सरकार मंदी के जख्मों पर मरहम तो दूर, रुई भी इसलिए नहीं रख सकी क्योंकि मंदी में सारे विकल्प सूख गए हैं. अब अगर बचत और टैक्स से अलग नए संसाधन नहीं जुटाए गए तो सरकार मंदी के बीच लंबी महंगाई और संकट बुला बैठेगी. 

सिर्फ बचत से नहीं बचेगी मुसीबत 
2021 में केंद्र सरकार का घाटा पांच दशक के सर्वोच्च स्तर 9.5 फीसद पर है. राज्यों को मिलाकर कुल घाटा जीडीपी के अनुपात में 20 फीसद पर पहुंच रहा है. (जीडीपी 193 लाख करोड़ रु. और घाटा 38-39 लाख करोड़ रु.) सरकारी कंपनियों के बाजार कर्ज और बजट से छिपाए गए ऋणों को मिलाने के बाद यह राशि‍ और बड़ी हो जाती है.

इस घाटे की भरपाई के लिए सरकार हमारी वित्तीय बचत का कर्ज के तौर पर इस्तेमाल करती है. 2018 के आंकड़ों के मुता‍बिक, भारत की 51 फीसद वित्तीय बचतें बैंक में हैं जो सरकार को कर्ज देते हैं. करीब 19 फीसद बचत बीमा में, 13 फीसद प्रॉविडेंट फंड/लघु बचत स्कीमों में और 14 फीसद शेयर-म्युचुअल फंड आदि में हैं. 

इन बचतों का 50 फीसद हिस्सा (2018-19) सरकारी (केंद्र और राज्य) कर्ज बटोर ले जाते हैं. हमारी बचत वाली जेब में सरकार का हाथ चौड़ा होता जा रहा है. 2020-21 में बजट में लघु बचतों से 5 लाख करोड़ रु. उधार लिए जाएंगे जो बजट के शुरुआती आकलन का दोगुना है. यानी बैंक में रखी बचत से सरकार के घाटे पूरे होंगे और छोटी बचत स्कीमों के फंड का इस्तेमाल भी होगा.

अब जानिए, सबसे डरावना सच! जीडीपी के अनुपात में भारत की वित्तीय बचत 6.5 फीसद है. यानी केवल 12-13 लाख करोड़ रु. और सरकार का कर्ज इस साल करीब 39 लाख करोड़ रु. हो गया है. अगर हमारी पूरी बचत (12-13 लाख करोड़ रु.) होम कर दी जाए तो भी इसकी भरपाई नहीं हो सकती क्योंकि हम सब जि‍तना बचा रहे हैं, अकेले सरकारों की कर्ज जरूरत उसकी दोगुनी है. 

निचोडऩे की सीमा 
लोग रियायत चाहते थे लेकिन यह बजट पेट्रोल-डीजल पर ऊंचा टैक्स बनाए रखेगा. नया सेस आया है. सरकार अगले साल की पहली तिमाही में सरकारी उपक्रम विनिवेश की गति देखेगी. अगर गाड़ी तेज नहीं चली तो फिर नए टैक्स लगाए बिना 2021-22 के घाटे को नियंत्रित (लक्ष्य 6.8 फीसद) करना असंभव होगा.  

टैक्स की सुइयां केवल केंद्रीय बजट तक सीमित नहीं हैं. राज्यों के पास सरकारी कंपनियां बेचने की सुविधा नहीं है इसलिए अब 29 बजट नए टैक्स लगाएंगे या बिजली-पानी जैसी सेवाओं की दरें बढ़ाएंगे.
भारतीय अर्थव्यवस्था के दो सुलगते यथार्थ इस बजट से खुलकर सामने आ गए हैं:

एक—आम लोगों की आय, खपत और बचत के हर हिस्से पर भरपूर टैक्स है. सरकार की कमाई का 53 फीसद टैक्स से आता है. 

दो—आम लोगों की करीब 50 से 55 फीसद बचत सरकार कर्ज के रूप में ले लेती है जिस पर महंगाई दर से भी कम रिटर्न मिलता है. 

गौर करिए कि इतने भारी संसाधन पचाने के बावजूद बजट हमारी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं लाता. अर्थव्यवस्था में कुल पूंजी निवेश की पांच फीसद जरूरत भी सरकार पूरी नहीं कर पाती. इसी तरह कुल रोजगारों का पांच फीसद हिस्सा भी सरकार नहीं देती. 

सरकारी कंपनियों में लगा बजट से निवेश, बैंक की एफडी जितना रिटर्न भी नहीं देता. इसलिए जहिर है, इन्हें बेचने से संसाधन मिलेंगे और हर साल इन पर लगने वाली पूंजी भी बचेगी. फिर भी अगर इनकी बिक्री से किसी को राजनैतिक चिढ़ होती हो तो इतिहास बताता है कि इतनी ही चिढ़ भाजपा और उसके विचार परिवार को भी होती रही है. सरकारें विनिवेश से हमेशा डरती हैं लेकिन अब कोई विकल्प नहीं है.

टैक्स अधि‍कतम सीमा तक लग चुके हैं, कमाई और मंदी के बीच हम कितनी और बचत करेंगे. अगर सरकारी कंपनियां नहीं बि‍कीं तो 

•करेंसी छाप कर सरकार कर्ज लेगी, किल्लतों के बाजार में कम सामान के पीछे ज्यादा पैसा यानी महंगाई, रुपए की कमजोरी, बचतों पर रिटर्न का विनाश

•टैक्स लगाने के नए तरीकों का आवि‍ष्कार होगा 

इसलिए सरकारी सेल के विरोध के बजाए सरकार का खर्च घटने की मांग होनी चाहिए, जिससे टैक्स कम होने का रास्ता खुले न कि इस महासेल से आने वाली पूंजी को भी सरकारी खर्च का दानव
निगल जाए. 

सरकार समझ रही है कि अर्थव्यवस्था की वित्तीय जमीन मजबूत किए बि‍ना आत्मनिर्भरता का कोई मतलब नहीं है. हमें भी समझना होगा कि वित्तीय तौर पर बदहाल सरकार हम पर किस कदर भारी पड़ सकती है. 

अर्थव्यवस्था के दो सुलगते यथार्थ इस बजट से खुलकर सामने आ गए हैं

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