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अर्थातः सब बिन सब अधूरा

दुनिया में तो मंदी है, मांग का कोई विस्फोट नहीं हुआ है फिर भी यह महंगाई कहां से आ रही?

अर्थात‍् अर्थात‍्

अमेरिका और यूरोप में उत्सवी सामान (थैंक्सगिविंग-क्रिसमस) की कमी पड़ने वाली है. चीन में कोयला कम है, बत्ती गुल है, कारखाने बंद हैं. यूरोप में गैस की कीमतें उबल रही हैं. ब्रिटेन में कामगारों की किल्लत है. रूस में मीट नहीं मिल रहा. यूरोप की कार व इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों के पास पुर्जे नहीं हैं.

दुनिया में तो मंदी है, मांग का कोई विस्फोट नहीं हुआ है फिर यह क्या माजरा है?

कहते हैं, अगर अमेरिकी राज्य न्यू मेक्सिको में कोई तितली अपने पंख फड़फड़ाए तो चीन में तूफान आ सकता है. यानी दुनिया इतनी पेचीदा है कि छोटी-सी घटना से बड़ी उथल-पुथल (बटरफ्लाइ इफेक्ट या केऑस थ्योरी) हो सकती है.

हवा पानी के बाद अगर कोई चीज हमें चला रही है तो वह सप्लाइ चेन है जो करीबी दुकान से लेकर भीतरी चीन, या दक्षिण अमेरिका के सुदूर इलाकों तक फैली हो सकती है. सामान, सेवाओं, श्रमिकों, ईंधन, खनिज आदि की ग्लोबल आपूर्ति का यह पर्तदार और जटिल तंत्र इस कदर बहुदेशीय और बहुआयामी है कि द वर्ल्ड इज फ्लैट वाले थॉमस फ्रीडमैन कहते रहे हैं कि अब दुनिया में युद्ध नहीं होंगे क्योंकि एक ही सप्लाइ चेन में शामिल दो देश एक-दूसरे से जंग नहीं कर सकते. इसे डेल (कंप्यूटर) थ्योरी ऑफ कन्फलिक्ट प्रिवेंशन कहते हैं.

दुनिया में लगभग सभी जरूरी चीजों की उत्पादन क्षमताएं पर्याप्त हैं फिर भी कारोबारी धमनियों में उतनी सप्लाइ नहीं है लंबी बाजार बंदी के बाद जितनी जरूरत थी.

विश्व की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाएं—अमेरिका, चीन, जर्मनी, यूके, रूस और ऑस्ट्रेलिया लड़खड़ा गई हैं. यही पांच देश दुनिया की सप्लाइ चेन में बड़े ग्राहक भी हैं और आपूर्तिकर्ता भी. इनके संकट पूरी तरह न्यू मेक्सिको की तितली जैसे हैं यानी स्थानीय. लेकिन सामूहिक असर पूरी दुनिया की मुसीबत बन गया है. किल्लत अब लाखों सामान की है लेकिन वह चार बड़ी आपूर्तियां टूटने का नतीजा है, जो ग्लोबल सप्लाइ चेन की बुनियाद हैं.

ऊर्जा या ईंधन में चौतरफा आग लगी है. कोविड से पहले 2020 और ’21 की भीषण सर्दियों में यूरोप ने अपने ऊर्जा भंडारों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर लिया. उत्पादन बढ़ता इससे पहले कोविड आ गया. एक साल में यूरोप में नेचुरल गैस 300 फीसद महंगी (स्पॉट प्राइस) हो गई. बिजली करीब 250 फीसद महंगी हुई हालांकि उपभोक्ता बिल नहीं बढ़े. भंडार क्षमताएं बीते बरस से 19 फीसद कम हैं.

चीन दुनिया में सबसे ज्यादा कोयला इस्तेमाल करता है. सरकार ने ऑस्ट्रेलिया से आयात रोक दिया था. चीन में कोयला महंगा है लेकिन सरकार बिजली सस्ती रखती है. नुक्सान बढ़ने से कोयले का खनन कम हुआ. बिजली की कटौती से कारखाने रुके तो अमेरिका-यूरोप व भारत में जरूरी आपूर्ति टूटने लगी. 

इधर, पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन, ओपेक कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाने के लिए इंतजार करना चाहता है इसलिए पूरा ऊर्जा बाजार ही महंगाई से तपने लगा है.

महामारी वाली मंदी से उबर रहे विश्व को यह अंदाज नहीं था कि अब तक की सबसे जटिल शिपिंग किल्लत उनका इंतजार कर रही है. बीते एक साल में कई बंदरगाहों पर जहाज फंस गए. इस बीच कंटेनर बनाने वाली कंपनियों (तीनों चीन की) ने उत्पादन घटा दिया. अब मांग है तो कंटेनर और जहाज नहीं. नतीजतन, किराए चार साल की ऊंचाई पर हैं.

यह संकट दूर होते एक साल बीत जाएगा. लेकिन तब अमेरिका में क्रिसमस गिफ्ट, रूस में खाने का सामान, ऑस्ट्रेलिया को स्टील की कमी रहेगी. भारतीय निर्यातक महंगे भाड़े से सांसत में हैं.

मध्य और पूर्वी यूरोप के मुल्कों में कामगारों की कमी हो गई है. अमेरिका और यूरोप में बेरोजगारी सहायता स्कीमें बंद होने वाली हैं. कई जगह लोग वर्क फ्रॉम होम से वापस नहीं आना चाहते. कमी है तो मजदूरी महंगी हो रही है जो कंपनियों की लागत बढ़ा रही है. ब्रिटेन में पेट्रोल, खाद्य और दूसरी जरूरी सेवाओं के लिए कामगारों की कमी हो गई है. ब्रेग्जिट के बाद प्रवासियों को आने से रोकना अब महंगा पड़ रहा है.

कहते हैं कि अगर ट्रंप की अगुआई में चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध के दौरान सेमीकंडक्टर या चिप ग्राहकों ने दोगुनी खरीद के ऑर्डर न दिए होते तो आज यह नौबत नहीं आती. चिप नया क्रूड आयल है. कोविड के कारण कारों का उत्पादन प्रभावित हुआ तो चीन व ताइवान की कंपनियों ने स्मार्ट फोन, कंप्यूटर वाले चिप का उत्पादन बढ़ा दिया. ऑटोमोबाइल की मांग लौटी तो उत्पादन क्रम में फिर बदलाव हुआ. अब सभी के लिए चिप की किल्लत है.

ईंधन, परिवहन, चिप और श्रमिक के बिना आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग मुश्किल है. इनकी कमी स्टैगफ्लेशन को न्योता दे रही है. यानी महंगाई और आर्थिक सुस्ती एक साथ. दुनिया के देशों को सबसे पहले सप्लाइ चेन यानी आपूर्ति की धमनियों को दुरुस्त करना होगा. सस्ता कर्ज मंदी से उबरने का शर्तिया इलाज रहा है लेकिन महंगाई के सामने यह दवा बेकार है. कर्ज महंगे होने लगे हैं. 

नेपोलियन बज़ा फरमाते थे: नौसिखुए कमांडर जंग में टैक्टिक्स (रणनीति) की बात करते हैं जबकि पेशेवर लड़ाके लॉजिस्टिक्स (साधनों) की. सनद रहे कि जंग अब महामारी और मंदी के साथ महंगाई से भी है.

दुनिया में तो मंदी है, मांग का कोई विस्फोट नहीं हुआ है फिर भी यह महंगाई कहां से आ रही?

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