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अर्थात्ः दूर है वसंत

बजट की एक संख्या या एक आंकड़ा ऐसा है जिसे कायदे से समझने के बाद सबके दिमाग पर चढ़ा फागुन उतर गया है.

अर्थात‍् अर्थात‍्

वही आदर्श मौसम/और मन में कुछ टूटता-सा :

अनुभव से जानता हूं कि यह वसंत है

वसंत की जगह बजट शब्द रख दें तो रघुवीर सहाय की इस क्षणिका का अर्थ नहीं बदलेगा. बजट, वसंत का सहोदर है सो उम्मीदें ज्यादा ही बौराती हैं, अलबत्ता कोई गारंटी नहीं कि हर बजट के बाद आर्थिक परिवेश में वासंती टेसू-पलाश दहक उठें. 

केंद्र सरकार के बजट इतने बड़े नहीं होते कि पलक झपकते ही आर्थिक माहौल बदल दें. लेकिन वे आने वाले मौसम की खबर जरूर देते हैं. इस बजट की एक संख्या या एक आंकड़ा ऐसा है जिसे कायदे से समझने के बाद सबके दिमाग पर चढ़ा फागुन उतर गया है.  

वित्त मंत्री ने कहा है कि 2020-21 में भारत की विकास दर (जीडीपी) महंगाई को मिलाने के बाद 10 फीसद रहेगी. यानी जीडीपी की विकास दर 5 से 6 फीसद और महंगाई भी 5 से 6 फीसद. 

इस बजट का यह आंकड़ा ही, इसका सब कुछ है. यही आकलन निवेश पर रिटर्न, बाजार में मांग और सरकार को मिलने वाले राजस्व की बुनियाद है. अब विदेशी निवेशकों से लेकर उद्योगपति, बैंकर तक सभी मंदी की लंबी सर्दी-गर्मी से बचने की तैयारी में जुट रहे हैं. आम लोगों यानी कामगारों, छोटे कारोबारियों, नौकरीपेशा और बेरोजगारों के लिए इस आंकड़े का मतलब तो कहीं ज्यादा गहरा और व्यापक है. 

निवेश और मांग 

• केवल छह फीसद या महंगाई मिलाकर केवल दस फीसद विकास (लगातार तीसरे वर्ष 7 फीसद से कम की विकास दर) के बाद अब भारत के लिए 9-10 फीसद के विकास की मंजिल दूर हो गई है. दहाई के अंक में ग्रोथ तो अगले पांच साल तक नामुमकिन है 

• सरकार को मांग या निवेश में फिलहाल किसी तेज बढ़त की उम्मीद नहीं है. खबर हो कि मौजूदा वित्त वर्ष में निवेश 15 साल के न्यूनतम स्तर पर है. इसके बढ़ने में वक्त लगेगा 

महंगाई और बचत 

• यह विकास दर (5 या 6 फीसद) व्यावहारिक तौर पर आने वाले महीनों में महंगाई की दर के लगभग बराबर होगी. या फिर महंगाई इससे ज्यादा होगी. खाद्य महंगाई बढ़ने लगी है और पुराने तजुर्बे बताते हैं कि ईंधन या मैन्युफैक्चरिंग की महंगाई इसका पीछा करती है. अब जबकि कंपनियों को मांग बढ़ने की उम्मीद कम है तो कीमतें बढ़ाकर नुक्सान की भरपाई होगी 

• बढ़ती महंगाई मांग को खाएगी और बचत पर रिटर्न को नकारात्मक बना देगी 

कमाई और रोजगार 

• मरियल विकास दर की रोशनी में कंपनियों के मुनाफे दबाव में रहेंगे. यानी कि नए निवेश से रोजगार या आय (वेतन या मजदूरी) में उतनी भी बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं जितनी की कीमतें बढ़ेंगी 

• जब सात फीसद विकास दर पर भारत में बेकारी की दर 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर थी तो आगे क्या होगा, यह समझा जा सकता है 

सरकारों के राजस्व 

• दस फीसद (महंगाई सहित) विकास दर यानी बेहद कमजोर ग्रोथ की रोशनी में सरकारी राजस्व (केंद्र व राज्य) के आकलन तितर-बितर हो जाएंगे जैसा कि 2019-20 में हुआ. ऐसे में सरकार अगले साल शायद उतना भी खर्च न कर सके जितना इस साल हुआ है 

• अगर राजस्व संभालने के लिए जीएसटी बढ़ता है तो मंदी के करेले पर नीम चढ़ जाएगा 

कर्ज और ब्याज  

• कमजोर जीडीपी के साथ महंगाई बढ़ने और भारी सरकारी घाटों (केंद्र व राज्य) का असर बाजार में ब्याज दरों (बाॅन्ड यील्ड) पर पड़ना तय है. रिजर्व बैंक ने इसलिए ही ब्याज दरों में कमी रोक दी है. 

निवेश और शेयर बाजार 

• इतने कमजोर जीडीपी के बाद कंपनियों के मुनाफे किस गति से बढ़ेंगे? कुछ कंपनियां बेहतर रिटर्न दे सकती हैं लेकिन आमतौर पर कमाई में 9-10 फीसद की बढ़ोतरी के बाद उन कंपनियों में कौन निवेश करेगा जो तेज विकास की उम्मीद के चलते, जिनके शेयर दोगुनी ऊंची कीमत (मूल्य-आय अनुपात) पर मिल रहे हैं 

2019-20 में विकास दर केवल पांच फीसद रही है. बजट से ठीक पहले सरकार ने पिछले वर्षों का जीडीपी का आकलन घटाया (2018-19 में 6.8 से 6.1 फीसद और 2017-18 में 7.17 से 7 फीसद) है. यानी कि भारत में मंदी की ढलान दो साल पहले शुरू हो चुकी थी. 

सनद रहे कि गिरती ग्रोथ तेजी से नहीं लौटती. 2008 के संकट के बाद, बीते एक दशक में दुनिया (चीन भी) तेज ग्रोथ का मुंह नहीं देख सकी. बुढ़ाती जनसंख्या के बीच यह कमजोर विकास दर करीब एक-तिहाई आबादी की खपत में बढ़ोतरी को सीमित कर देगी. बुढ़ाती जनसंख्या के बीच यह जिद्दी मंदी भारत में अधिकांश आबादी के निम्न या मझोली आय के शिकंजे से निकलने की कोशिशों पर सबसे ज्यादा भारी पड़ने वाली है. 

सरकार थक गई है. अधिकांश भारतीयों को यह वक्त बेहद संभल कर बिताना होगा. भारतीय अर्थव्यवस्था का वसंत और दूर खिसक गया है. 

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