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अर्थात्: जीएसटी में दिखाएं दम

सरकार अगर नोटबंदी के बजाए जीएसटी पर साहस दिखाती तो सचमुच बड़े बदलाव हो सकते थे.

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नोटबंदी के बजाए जीएसटी पर साहस दिखाती तो सचमुच बड़े बदलाव हो सकते थे
नोटबंदी के बजाए जीएसटी पर साहस दिखाती तो सचमुच बड़े बदलाव हो सकते थे

नोटबंदी पर मलहम का इंतजार शुरू हो गया है लेकिन पेन किलर की तलाश सब्सिडी और इनकम टैक्स की पुरानी दुकानों में ही हो रही है यानी कि आम लोगों के खाते में कुछ पैसे या मुट्ठी भर आयकरदाताओं को रियायतों का चूरन. नोटबंदी भारत के ताजा इतिहास का सबसे साहसिक प्रयोग है और इसका बुरा असर खत्म करने का तरीका भी उतना ही साहसिक होना चाहिए.
नोटबंदी का वास्तविक मरहम प्रधानमंत्री की मेज पर रखा है बशर्ते वे उसे आजमाने की हिम्मत जुटा सकें.
उस मरहम का नाम है जीएसटी.
जीएसटी अभी सरकार की टकसाल में है जो नोटबंदी का सबसे कामयाब दर्द निवारक हो सकता है बशर्ते इसे हकीकत में क्रांतिकारी सुधार में बदल दिया जाए. अच्छा जीएसटी मांग वापस ला सकता है, निवेश का माहौल बदल सकता है और काले धन की चुनौती का इलाज बन सकता है जो नोटबंदी के बाद भी मौजूद रहेगी.
लेकिन जीएसटी का अभी जो प्रारूप हमारे सामने है, उसके लागू होने पर न केवल नोटबंदी की तकलीफें दोगुनी हो जाएंगी बल्कि काले धन की मुसीबत और बढ़ सकती हैं. नोटबंदी की तकलीफों के बदले अच्छा जीएसटी कैसे गेम चेंजर हो सकता है?

भारत में उपभोग पर भरपूर टैक्स लगता है. एक्साइज, सर्विस टैक्स, वैट आदि को मिलाकर न केवल कई किस्म के टैक्स हैं बल्कि उनकी कई दरें हैं. अधिकांश काला धन खपत यानी व्यापार पर लगने वाले टैक्सों की चोरी से बनता है. व्यापारी टैक्स देना चाहते हैं लेकिन कारोबार लागत बेहद ऊंची है. टैक्स का बोझ लाभ के मार्जिन सीमित कर देता है इसलिए चोरी होती है. कई स्तरों पर लगने वाला टैक्स महंगाई में तेजी और मांग में कमी की वजह है.

जीएसटी को इन सभी मुसीबतों का इलाज मान कर लाया जा रहा है.
लेकिन जीएसटी काउंसिल ने जिस टैक्स ढांचे को मंजूरी दी है उसमें तीन जीएसटी (सेंटर, स्टेट और इंटरस्टेट) और पांच दरें (0, 5,12,18 और 28 फीसदी) हैं. इसके ऊपर केंद्र सरकार सेस लगाएगी. राज्य भी सेस लगाना चाहते हैं यानी जीएसटी गेमचेंजर नहीं बल्कि मौजूदा टैक्स ढांचे जैसा हो जाएगा.

जीएसटी में निर्माता और विक्रेता को कच्चे या तैयार माल पर चुकाए गए टैक्स वापस मिलेंगे ताकि अंतिम उपभोक्ता को टैक्स पर टैक्स की मार व महंगाई से बचाया जा सके. लेकिन कई दरों वाला जीएसटी इनपुट क्रेडिट को बेहद जटिल और कारोबारियों के लिए चुनौती बनाने वाला है.

तो सरकार से अब जिस हिम्मत की दरकार है वह रही यहः
एक—जीएसटी में केवल दो टैक्स दरें रखी जाएं. न कि तीन तरह के जीएसटी, कोई सेस न अन्य टैक्स. एक दर आम खपत वाले उत्पाद व सेवाओं के लिए और एक लग्जरी उत्पादों के लिए. यह 12 और 18 फीसदी हो सकती हैं.
दो—हर तरह की टैक्स रियायतों की समाप्ति. न कोई टर्नओवर छूट सीमा, न किसी उद्योग के लिए विशेष छूट.  
तीन—छोटे-बड़े सभी तरह के कारोबारियों के लिए जीएसटी के तहत अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, जैसे कि आम लोगों के लिए पैन अनिवार्य है.

यह बदलाव संभव हैं क्योंकि जीएसटी का कानून अभी संसद नहीं पहुंचा है. अगर ऐसा जीएसटी हमें मिलता है तो नोटबंदी के कई नुक्सानों की भरपाई हो सकती हैः
 नोटबंदी ने खपत और मांग को तोड़ दिया है. जीएसटी का मौजूदा स्वरूप टैक्स का बोझ घटाने में कोई बड़ा योगदान नहीं करेगा, जबकि दो दरों वाले जीएसटी से बड़ी मात्रा में उत्पादन व सेवाएं सस्ती होंगी. यह महंगाई को नियंत्रित रखते हुए मांग को नई ताकत दे सकता है. यह लिखने की जरूरत नहीं कि ऊंचा टैक्स, चोरी और काले धन की वजह है.
 मौजूदा जीएसटी के तहत कारोबारियों को 30 से 60 तक पंजीकरण व रिटर्न भरने होंगे. इससे कंप्लायंस कॉस्ट बढऩे का डर है. एक अच्छा सहज जीएसटी कई तरह के रिटर्न पंजीकरण से मुक्ति देगा. सभी कारोबारियों के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन के जरिए हर तरह के उत्पादन, वितरण और खपत को टैक्स की निगाह में लाया जा सकता है यानी कि वह काम हो सकता है जिसे नोटबंदी नहीं कर पाई.
कम टैक्स और सभी कारोबारियों का पंजीकरण राज्यों के लिए ज्यादा राजस्व की गारंटी है. राज्यों को होने वाले नुक्सान की भरपाई की गारंटी केंद्र सरकार पहले ही दे चुकी है.
कम टैक्स, ज्यादा मांग और कारोबारी सहजता—यही तो चाहिए निवेश के लिए. जिसका माहौल नोटबंदी ने खत्म कर दिया है.
 
नोटबंदी के तहत आम लोग तो तपस्या कर चुके. अब जीएसटी को बड़ा सुधार बनाने के लिए सरकार को त्याग और तपस्या करनी होगी. खर्चे घटाने होंगे, सरकारी कंपनियों का निजीकरण करना होगा, घाटा कम करना होगा और खपत पर तरह-तरह के भारी टैक्स व सेस लगाकर उपभोग को चूसने की आदत छोडऩी होगी.

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतिगत लक्ष्य सही चुने हैं? इस सवाल का जवाब तो इतिहास देगा लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बीच तुलना करने पर यह महसूस करना मुश्किल नहीं है कि जीएसटी को क्रांतिकारी बनाने के बजाए सरकार ने नोटबंदी के जरिए ग्रोथ के पैरों पर कुल्हाड़ी मारकर मंदी व बेकारी को न्योता दे दिया. कम टैक्स वाला जीएसटी कारोबारी पारदर्शिता ला सकता है जो काले धन पर रोक की पहली शर्त है. बचा हुआ काम नकद लेन-देन और नकदी व सोना रखने की सीमा तय करने, एकाउंटिंग सुधार, जमीन-सोने की खरीद पर पहचान अनिवार्य करने व राजनैतिक चंदों में पारदर्शिता के जरिए हो सकता है.

केंद्र व राज्यों के बीच झगड़े में फंसे जीएसटी को प्रधानमंत्री के राजनैतिक नेतृत्व की जरूरत है. यदि वे देश को सहज और कम महंगाई वाला टैक्स सिस्टम दे सके तो यह न केवल आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी बल्कि यह नोटबंदी से कहीं बड़ा और दूरगामी सुधार साबित होगा, जिसका इंतजार देश बरसों से कर रहा है.

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