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फैक्ट चेक: हिंदी साइनबोर्ड पर कालिख पोतने का ये वीडियो है दो साल पुराना

इंडिया टुडे के एंटी फेक न्यूज वॉर रूम (AFWA) ने पाया कि वीडियो के साथ किया जा रहा दावा गलत है. ये वीडियो कम से कम दो साल पुराना है और पंजाब के पटियाला का है. इसका किसानों के मौजूदा विरोध-प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है.

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क्या पंजाब में तीन नए कृषि कानूनों के साथ हिंदी का ​भी विरोध हो रहा है? सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो के सहारे कुछ ऐसा ही दावा किया जा रहा है. वीडियो में पगड़ी पहने एक व्यक्ति साइनबोर्ड पर हिंदी में लिखे अक्षरों पर कालिख पोतता हुआ दिख रहा है. कहा जा रहा है कि ये वीडियो पंजाब का है जहां प्रदर्शनकारी किसान कृषि कानून के बहाने हिंदी भाषा का भी विरोध कर रहे हैं. साथ ही ये भी दावा किया जा रहा है कि किसान आंदोलन का असली एजेंडा सामने आ रहा है जो कि हिंदी और हिंदुओं का विरोध करना है. 

वीडियो में देखा जा सकता है कि साइनबोर्ड में हिंदी, अंग्रेजी और पंजाबी- तीनों भाषाओं में लिखा है, “उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र” और एक व्यक्ति हिंदी में लिखे शब्दों को मिटा रहा है.

वीडियो के साथ हिंदी में लिखा गया है, “असली चेहरा अब सामने आ रहा है। टॉवर तोड़ने के बाद अब पंजाब में हिंदी नही चलेगी... किसान आन्दोलन बहाना है हिन्दू और हिन्दू विरोध असली मकसद है। ये ही है, किसान आंदोलन की हकीकत? ये खालिस्तानी आंदोलन है, किसानों के भेष में आतंकी, उनके समर्थक है, उनका एजेंडा,अराजकता फैलाना, मोदी सरकार को गिराना और देश के आम जनता को परेशान करना है...”

इंडिया टुडे के एंटी फेक न्यूज वॉर रूम (AFWA) ने पाया कि वीडियो के साथ किया जा रहा दावा गलत है. ये वीडियो कम से कम दो साल पुराना है और पंजाब के पटियाला का है. इसका किसानों के मौजूदा विरोध-प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है.

ये वीडियो फेसबुक और ट्विटर पर खूब जमकर वायरल हो रहा है. पोस्ट का आर्काइव यहां देखा जा सकता है.

AFWA की पड़ताल 

यांडेक्स रिवर्स सर्च की मदद से हमने पाया कि ये वायरल वीडियो फरवरी 2019 में यूट्यूब पर अपलोड किया गया था. 

 साइनबोर्ड से सुराग लेते हुए हमने पाया कि उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (NZCC) संस्कृति मंत्रालय के तहत आता है जो कि पंजाब के पटियाला में स्थिति है. वीडियो और इससे जुड़ी घटना के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए हमने NZCC के निदेशक प्रो सौभाग्य वर्धन से संपर्क किया.

प्रो वर्धन ने बताया कि ये घटना करीब दो साल पुरानी है. उन्होंने कहा कि उस दौरान पूरे चंडीगढ़-बठिंडा बेल्ट में एक अभियान चला था जिसके तहत प्रदर्शनकारी हिंदी में लिखे साइनबोर्ड को मिटा रहे थे. उसी दौरान ये बोर्ड भी पोत दिया गया था. हालांकि, प्रो वर्धन ये नहीं बता सके कि वीडियो में दिख रहा है व्यक्ति कौन है.

9 जनवरी को AFWA ने इसी तरह की एक और रिपोर्ट प्रकाशित की थी जो कुछ तस्वीरों के बारे में थी. इन तस्वीरों में कुछ लोग हाईवे पर लगे साइनबोर्ड पर हिंदी में लिखे शब्दों को मिटा रहे थे. इन तस्वीरों के साथ भी यही दावा किया जा रहा था कि पंजाब में किसान आंदोलन के दौरान हिंदी का विरोध कर रहे हैं. 

हमने पाया कि तस्वीरें अक्टूबर 2017 की हैं जब पंजाब के कुछ हिस्सों में उग्र सिख संगठनों ने एक विरोध-प्रदर्शन के दौरान साइन बोर्ड पर कालिख पोत दी थी. इन संगठनों की मांग थी कि साइनबोर्ड पर पंजाबी भाषा को प्राथमिकता मिले और बोर्ड पर जगह के नाम को पंजाबी में सबसे ऊपर लिखा जाए. 

जाहिर है कि पंजाबी को तवज्जो देने को लेकर चले इस आंदोलन की पुरानी तस्वीरों और वीडियो के सहारे किसान आंदोलन के बारे में भ्रम फैलाया जा रहा है.

(पटियाला से मुनीष कौशल के इनपुट के साथ)

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दावा

हिंदी साइनबोर्ड पर ​कालिख पोत रहे सिख के वीडियो ने किसान आंदोलन का असली एजेंडा उजागर कर दिया है. ये किसानों के वेष में खालिस्तानी हैं जिनका असली मकसद हिंदी और हिंदुओं का विरोध करना है.

निष्कर्ष

ये वीडियो करीब दो साल पहले पंजाब के पटियाला में उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र का है जब वहां ‘हिंदी थोपने’ का विरोध किया जा रहा है. इसका ​मौजूदा किसान आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है.

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