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फैक्ट चेक- दलित समुदाय के शहीद जवान की नहीं है ये खंडित प्रतिमा, जानें पूरा सच

इंडिया टुडे एंटी फेक न्यूज वॉर रूम ने पाया कि  तस्वीर के साथ किया जा रहा दावा भ्रामक है. तस्वीर में दिख रही प्रतिमा शहीद महेश पाल की है, जो दलित समुदाय से नहीं थे.

खंडित प्रतिमा की तस्वीर खूब वायरल हो रही -16:9 खंडित प्रतिमा की तस्वीर खूब वायरल हो रही -16:9

सोशल मीडिया पर एक खंडित प्रतिमा की तस्वीर खूब वायरल हो रही है. तस्वीर के जरिये दावा किया जा रहा है कि गुजरात में एक शहीद जवान की प्रतिमा इसलिए तोड़ दी गई क्योंकि वह दलित समुदाय से था. वायरल तस्वीर में बिना सिर की एक प्रतिमा नज़र आ रही है. देखने में ऐसा लगता कि प्रतिमा सेना के किसी जवान की है.

तस्वीर को पोस्ट करते हुए लोग कैप्शन में लिख रहे हैं, "लोगो की मानसिकता देखो कहां तक गिर सकती है और हम विश्व गुरु बनने के सपने देख रहे हैं. ऐसे लोगो के लिये एक शब्द तो बनता हैं. गुजरात में एक शेङ्युल कास्ट का जवान देश के लिये शहीद हुआ और ऊसका स्मारक खङा किया गया लेकिन इनसे यह बर्दाश्त नहीं हो पाया".

इंडिया टुडे एंटी फेक न्यूज़ वॉर रूम (AFWA) ने पाया कि  तस्वीर के साथ किया जा रहा दावा भ्रामक है. तस्वीर में दिख रही प्रतिमा शहीद महेश पाल की है, जो दलित समुदाय से नहीं थे. महेश पाल हरियाणा के रहने वाले थे और 1989 में श्रीलंका में शहीद हुए थे. कुछ शरारती तत्वों ने 2018 में हरियाणा के एक गांव धनौंदा में स्थित उनकी प्रतिमा तोड़ दी थी. 

फेसबुक और ट्विटर पर इस तस्वीर को गलत दावे के साथ कई यूज़र शेयर कर चुके हैं. पोस्ट का आर्काइव यहां देखा जा सकता है. तस्वीर को हमने गूगल पर रिवर्स सर्च किया तो हमें जुलाई 2018 का एक ट्वीट मिला. ट्वीट में बताया गया था कि ये प्रतिमा शहीद महेश पाल सिंह की है, जो हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के धनौंदा गांव में लगी हुई है. कुछ कीवर्ड्स की मदद से हमें इससे जुड़ी 2018 की कुछ खबरें भी मिलीं. ‘दैनिक जागरण’ के अनुसार, जुलाई 2018 में कनीना खंड के धनौंदा गांव में कुछ शरारती तत्वों ने शहीद महेशपाल की प्रतिमा को खंडित कर दिया था. इसको लेकर ग्रामीणों ने धरना प्रदर्शन भी किया था.

‘दैनिक भास्कर’ के मुताबिक, इस मामले में पुलिस ने अजय नाम के एक आरोपी को गिरफ्तार किया था. अजय के मुताबिक, उसके परिवार का गांव के सरपंच से झगड़ा हो गया था. सरपंच को बदनाम करने के लिए उसने शहीद महेश पाल की प्रतिमा का सिर धड़ से अलग कर दिया था. बाद में आरोपी को जमानत भी मिल गई थी.

गांव के एक पंच की मदद से हमने महेश पाल के भाई जीत पाल से भी बात की. जीत का कहना था कि तस्वीर में दिख रही प्रतिमा उन्हीं के भाई की है, लेकिन इसके साथ किया जा रहा दावा गलत है. जीत के मुताबिक, वो लोग राजपूत समुदाय से आते हैं और हरियाणा के धनौंदा गांव के रहने वाले हैं. जीत पाल ने हमें बताया कि 2018 में मूर्ति खंडित होने के बाद उसे दोबारा बनवाया गया था. उन्होंने हमें नई प्रतिमा की कुछ तस्वीरें भी भेजीं.

‘पंजाब केसरी की एक खबर में बताया गया है कि शहीद महेश पाल राजपुताना राइफल्स का हिस्सा थे. 1988 में वे शांति सेना के माध्यम से श्रीलंका गए. 17 जनवरी 1989 को महेश पाल जाफरा सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ में शहीद हो गए थे. उनकी इस प्रतिमा का अनावरण जनवरी 2014 में किया गया था. हमारी पड़ताल ये बात साबित हो जाती है कि वायरल पोस्ट भ्रामक है. तस्वीर में दिख रही शहीद की प्रतिमा किसी दलित की नहीं है और न ही ये गुजरात में स्थित है.

 

फैक्ट चेक

सोशल मीडिया यूजर्स

दावा

गुजरात में एक शहीद जवान की प्रतिमा इसलिए तोड़ दी गई क्योंकि वह दलित समुदाय से था.

निष्कर्ष

तस्वीर में दिख रही प्रतिमा शहीद महेश पाल सिंह की है, जो दलित नहीं बल्कि राजपूत समुदाय से थे और हरियाणा के रहने वाले थे.

झूठ बोले कौआ काटे

जितने कौवे उतनी बड़ी झूठ

  • कौआ: आधा सच
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