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ज्ञानवापी पर हिंदुओं की इन 3 मांगों पर होगी सुनवाई, Waqf और वर्शिप एक्ट क्यों नहीं हुआ लागू?

ज्ञानवापी मस्जिद परिसर को सौंपने समेत हिंदू पक्ष की तीन मांगों से जुड़ी याचिका को वाराणसी की जिला अदालत ने सुनवाई के लायक माना है. ये दूसरी बार है जब वाराणसी की जिला अदालत ने मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया. जानें क्या हैं हिंदू पक्ष की मांगें और मुस्लिम पक्ष ने क्या रखी थीं दलीलें?

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ज्ञानवापी मस्जिद का मामला तीन अदालतों में चल रहा है. (फाइल फोटो-PTI)
ज्ञानवापी मस्जिद का मामला तीन अदालतों में चल रहा है. (फाइल फोटो-PTI)

वाराणसी जिला अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ी मुस्लिम पक्ष की याचिका एक बार फिर खारिज कर दी है. जिला अदालत ने मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज करते हुए हिंदू पक्ष की मांगों को सुनवाई के लायक माना है. हिंदू पक्ष ने याचिका दायर कर ज्ञानवापी मस्जिद में मिले कथित शिवलिंग की पूजा का अधिकार मांगा था. 

वाराणसी की जिला अदालत में किरन सिंह ने याचिका दाखिल की थी. किरन सिंह विश्व वैदिक सनातन संघ की महासचिव हैं. उनकी याचिका पर अंजुमन इंतजामिया कमेटी ने सवाल उठाया था. यही कमेटी ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख का काम संभालती है. 

फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जज महेंद्र कुमार पांडेय ने किरन सिंह की याचिका को सुनवाई के लायक माना है. उन्होंने याचिका पर सुनवाई के लिए 2 दिसंबर की तारीख तय की है.

हिंदू पक्ष की क्या हैं मांगें?

इस साल 24 मई को किरन सिंह ने जिला कोर्ट में अर्जी दायर की थी. 25 मई को जिला जज एके विश्वेश ने इस मामले को फास्ट-ट्रैक कोर्ट को ट्रांसफर कर दिया था. इस अर्जी में उन्होंने तीन मांगे की थीं. 

- पहलीः ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में मुस्लिमों की एंट्री पर रोक लगाई जाए.
- दूसरीः ज्ञानवापी परिसर सनातन संघ को सौंपा जाए.
- तीसरीः परिसर में मिले शिवलिंग की पूजा का अधिकार दिया जाए.

मुस्लिम पक्ष का क्या है कहना?

किरन सिंह की याचिका के जवाब में अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने भी याचिका दायर कर दी. इसमें हिंदू पक्ष की याचिका पर सुनवाई न करने की मांग की गई थी.

मुस्लिम पक्ष की ओर से दलील दी गई थी कि इस मामले में 1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू होता है, इसलिए इस पर सुनवाई नहीं की जा सकती.

जिला कोर्ट ने सितंबर में अपने फैसले में पहले ही साफ कर दिया था कि इस मामले में वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है. चूंकि, हिंदू 1993 तक यहां रोजाना पूजा करते आ रहे थे और उसके बाद साल में एक बार पूजा करते रहे थे, इसलिए ये कानून लागू नहीं होता.

वहीं, ज्ञानवापी परिसर सौंपने की मांग पर मुस्लिम पक्ष ने दलील दी थी कि ये संपत्ति वक्फ की है और वक्फ में भी दर्ज है, इसलिए इस प्रॉपर्टी को देखने का अधिकार अदालत को नहीं है. सिर्फ वक्फ ट्रिब्यूनल ही इस मुकदमे को देख सकता है.

अब आगे क्या?

वाराणसी की जिला कोर्ट ने हिंदू पक्ष की याचिका को मंजूर कर लिया है. अब इस पर 2 दिसंबर को सुनवाई होगी. 

अदालत ही इस पर फैसला लेगी कि ज्ञानवापी परिसर हिंदू पक्ष को सौंपा जाए या नहीं और उन्हें वहां पूजा का अधिकार दिया जाए या नहीं?

तीन अदालतों में चल रहा मुकदमा?

ज्ञानवापी मस्जिद का मामला जिला कोर्ट से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक चल रहा है. जिला कोर्ट में ही इसे लेकर दो मामलों पर सुनवाई हो रही है.

जिला अदालत में पहला मामला तो श्रृंगार गौरी मंदिर से जुड़ा है, जिस पर 5 दिसंबर को अगली सुनवाई होगी. दूसरा मामला किरन सिंह की याचिका का है.

वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिंदू पक्ष ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे पुरातत्व विभाग से कराने की मांग को लेकर याचिका दायर की है. इस पर अगली सुनवाई 28 नवंबर को होगी.

जबकि, सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सर्वे कमिश्नर नियुक्त करने के फैसले को चुनौती दी गई है, जिस पर सुनवाई हो रही है. इसके अलावा प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट को लेकर भी मामला चल रहा है. 11 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कथित शिवलिंग को संरक्षित रखने का फैसला दिया था.

कथित शिवलिंग का क्या है मामला?

पिछले साल 18 अगस्त को पांच महिलाओं ने वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिविजन) के सामने अर्जी दायर की थी. महिलाओं ने ज्ञानवापी मस्जिद के बगल में बने श्रृंगार गौरी मंदिर में रोजना पूजन-दर्शन की मांग की थी. इस पर जज रवि कुमार दिवाकर ने मस्जिद परिसर का सर्वे कराने का आदेश दिया था.

अदालत के आदेश पर इसी साल 14,15 और 16 मई को ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे किया गया. सर्वे के बाद हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने यहां शिवलिंग मिलने का दावा किया था. हालांकि, मुस्लिम पक्ष का दावा था कि ये शिवलिंग नहीं, बल्कि फव्वारा है जो हर मस्जिद में होता है. 

इसके बाद 20 मई को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सिविल जज से जिला अदालत के जज को ट्रांसफर कर दिया. कोर्ट ने कहा कि ये मामला काफी 'जटिल' और 'संवेदनशील' है, इसलिए बेहतर होगा कि इसकी सुनवाई 25-30 साल का अनुभव रखने वाले जज करें. 

ज्ञानवापी को लेकर क्या है विवाद?

जिस तरह से अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद था, ठीक वैसा ही ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर का विवाद भी है. स्कंद पुराण में उल्लेखित 12 ज्योतिर्लिंगों में से काशी विश्वनाथ को सबसे अहम माना जाता है.

1991 में काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरोहितों के वंशज पंडित सोमनाथ व्यास, संस्कृत प्रोफेसर डॉ. रामरंग शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता हरिहर पांडे ने वाराणसी सिविल कोर्ट में याचिका दायर की.

याचिका में दावा किया कि काशी विश्वनाथ का जो मूल मंदिर था, उसे 2050 साल पहले राजा विक्रमादित्य ने बनाया था. 1669 में औरंगजेब ने इसे तोड़ दिया और इसकी जगह ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी. इस मस्जिद को बनाने में मंदिर के अवशेषों का ही इस्तेमाल किया गया.

हिंदू पक्ष की मांग है कि यहां से ज्ञानवापी मस्जिद को हटाया जाए और पूरी जमीन हिंदुओं को सौंपी जाए.

 

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