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सरदार उधम: थैंक्यू, शूजित सरकार

शूजित सरकार द्वारा बनाई गई सरदार उधम की बहुत ज्यादा तारीफ हो रही है. इस तारीफ में सबसे बढ़िया बात ये है कि लोग सिर्फ कहानी, कैरेक्टर की तारीफ नहीं कर रहे हैं बल्कि उसके बनाने के तरीके की बात की जा रही है.

Vicky Kaushal Vicky Kaushal
स्टोरी हाइलाइट्स
  • विक्की कौशल की फिल्म सरदार उधम रिलीज़
  • लोगों को पसंद आया है शूजित सरकार का काम

दिल्ली से 100 किमी. उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ में एक कस्बा है, हस्तिनापुर. वही जगह जिसे आज के वक्त में दुनिया महाभारत के इतिहास, जैन धर्म के पवित्र स्थान, सिखों के पंज प्यारों में से एक के जन्मस्थान के तौर पर जानती है. उसी हस्तिनापुर में एक उधम सिंह चौक है, जहां उधम सिंह की मूर्ति लगी है. एक हाथ में बंदूक है, दूसरे में किताब. सरदार उधम सिंह के साथ मेरा पहला परिचय यही रहा है, उसके अलावा स्कूल की किताबों में जब जलियांवाला बाग का चैप्टर आया तब उधम सिंह का ज़िक्र हुआ था.

ये सिर्फ ज़िक्र तक ही सीमित रहा, जब बड़े हुए और किताबों के जरिए इतिहास को जानना चाहा तो सरदार भगत सिंह से आगे नहीं बढ़ पाए. अमेज़न प्राइम पर हाल ही में स्ट्रीम हुई सरदार उधम फिल्म को देखने के बाद पहला किस्सा यही याद आता है. इस फिल्म को शूजित सरकार ने डायरेक्ट किया है, विक्की कौशल ने उधम सिंह की भूमिका निभाई है. 

गैंग्स ऑफ वासेपुर में रामाधीर सिंह की भूमिका निभाने वाले तिग्मांशु धूलिया ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि समाज में हीरो खत्म हो चुके हैं, इसलिए बॉलीवुड अब बायोग्राफी ही बना रहा है. ये सच भी है अगर पिछले पांच साल के इतिहास को देखें तो हर क्षेत्र से जुड़ी बायोग्राफी बनी हैं. बॉलीवुड पर मानो बायोग्राफी बनाने का भूत सवार हो गया है. 

आसान भाषा में समझें तो बायोग्राफी बनाना मुश्किल और आसान दोनों हो सकता है. किसी भी सब्जेक्ट को चुनकर आपको उसके बारे में जो जानकारी मौजूद है, उसे इकट्ठा करना है. यानी आपको किसी ओरिजिनल टॉपिक का इंतज़ार नहीं करना है, ना ही उसे ढूंढना होगा. मेहनत यहां होगी कि जब आप अपना टॉपिक चुन लें, तब अपनी रिसर्च शुरू करें मौजूदा चीज़ों को एकजुट करें और उसे स्क्रीनप्ले में उतार दें. 

शूजित सरकार द्वारा बनाई गई सरदार उधम की बहुत ज्यादा तारीफ हो रही है. इस तारीफ में सबसे बढ़िया बात ये है कि लोग सिर्फ कहानी, कैरेक्टर की तारीफ नहीं कर रहे हैं बल्कि उसके बनाने के तरीके की बात की जा रही है. गांव-छोटे कस्बों में रहने वाले व्यक्ति के हाथ में जबसे नेटफ्लिक्स-प्राइम जैसी चीज़ें आई हैं, तब से उसके हाथ में वर्ल्ड सिनेमा आ गया है इसलिए अब उसके पास किसी की तुलना करने के लिए बड़ा उदाहरण है. 

मिल्खा सिंह, एमएस धोनी, भगत सिंह, बॉमकेश बख्शी या अन्य किसी भी कैरेक्टर पर बनी बायोग्राफी के बाद अक्सर सिर्फ उनसे जुड़े किस्सों की बात होती है. फिल्म कैसी बनी, क्या बढ़िया था क्या नहीं यहां तक की चर्चा कुछ जगहों पर सिमट जाती है. सरदार उधम के साथ ऐसा नहीं हुआ, उधम सिंह के अलावा बात जलियांवाला बाग के किस्से से निकलते हुए डायरेक्टर के काम और एक्टर की अदाकारी पर हुई. 

Vicky Kaushal

शूजित सरकार ने इसी प्वाइंटर पर बाज़ी मारी है, क्योंकि उन्होंने बॉलीवुड में बायोग्राफी बनाने के एक नए (शायद सही भी) तरीके को आगे बढ़ाया है. जहां किसी बायोग्राफी या फिल्म का मतलब सिर्फ जोशीले नारे, बचपन से मर जाने तक की कहानी तक सीमित नहीं होता है. फिल्म के क्राफ्ट की तारीफ की तुलना ब्रिटिश शॉ पिकी ब्लाइंडर्स और अन्य हॉलीवुड की कई फिल्मों, टीवी शो से हो रही है. 

इसका सबसे अच्छा उदाहरण सरदार उधम में ये दिखता है कि ब्रिटिश शो में जिस चीज़ पर काम किया जाता है, वो है स्क्रीन पर दिखने वाले कलर की शेड. शूजित सरकार ने उस शेड पर शानदार काम किया, इसलिए जब किसी हिन्दी फिल्म को देखते हुए स्क्रीन का अनुभव आता है वो इस फिल्म में कतई नहीं है. 

फिल्म का सबसे बेहतरीन हिस्सा इसका क्राफ्ट, फिल्म दिखाने का तरीका ही है शायद इसलिए इसपर सबसे ज्यादा बात हो रही है (यहां भी की गई है). शूजित सरकार कई साल से इस फिल्म को बनाने का इंतज़ार कर रहे थे, इरफान खान के साथ इस फिल्म को बनाना चाहते थे. लेकिन किस्मत अपनी ही चलाती है इसलिए अब जाकर विक्की कौशल के साथ फिल्म बन गई. 

विक्की कौशल ने इस फिल्म के साथ बिल्कुल सही काम किया. शायद वह खुद को पूरी तरह से अपने डायरेक्टर को सौंप चुके थे. खैर, मसान-उरी-मनमर्ज़ियां में विक्की कौशल का काम बताता है कि कैरेक्टर के हिसाब से वो काफी कुछ जादू कर सकते हैं. विक्की को पंजाबी होने का फायदा मिला, वो कैरेक्टर की रुह से जुड़ पाए. उनकी पंजाबी, उनका दर्द पर्दे पर हल्का सा भी फिल्मी नहीं लगा था.

इस तरह के टॉपिक पर बनी फिल्में आपको बांध कर रखती हैं, आखिर तक तनाव वाला माहौल बनाकर रखती हैं. लेकिन एक एक्टर और डायरेक्टर की ‘बड़ी सोच’ वहां पता लग जाती है जब सीरियस माहौल वाले सीन, कैरेक्टर में कुछ ऐसा हो जाए जो बिल्कुल सिंपल हो. क्योंकि कोई भी आम आदमी ऐसे कैरेक्टर को तभी अपना मानेगा जब सबकुछ फिल्मी नहीं होगा. फिल्म में एक सीन है जब सरदार उधम लंदन पहुंचा है और लोगों से वहां संगठन बनाने की बात कर रहा है, इतना टाइट सीन जब खत्म होता है तब आखिर में उधम पूछता है ‘लड्डू खा लूं’. वो लड्डू उठाता है और निकल जाता है, ये सीन छोटा है लेकिन उस सीरियस मोड़ पर उसे करना फिल्म को रिच कर देता है.

आरुषि हत्याकांड पर बनी तलवार फिल्म में जब इरफान खान वाली सीबीआई और दूसरी सीबीआई में बहस चल रही होती है, तब वह फिल्म की स्क्रिप्ट के हिसाब से काफी टेंशन वाला सीन है. लेकिन वही सीन फिल्म में सबसे हल्के-फुल्के माहौल में किया गया है, इसलिए वो सीन बार-बार याद किया जाता है.

शूजित सरकार ने एक और बड़ी लकीर को खींचा है, अभी तक जब भी फ्रीडम फाइटर को किसी फिल्म में दिखाया गया है तो वो हमेशा सीरियस बातें कर रहा होता है. लेकिन कुछ वक्त के लिए सरदार भगत सिंह का जो कैरेक्टर दिखाया गया है, उसने पुरानी लकीर को मिटा दिया. एक कट में भगत सिंह बंदूकों को लेकर बात कर रहे हैं, दूसरे कट में हाथ में किताब है और उधम के साथ हंसी मज़ाक चल रहा है. 

भगत सिंह की छोटी ज़िंदगी के जो दो पहलू थे, दोनों को इसमें पिरो दिया गया. पहले बंदूक और बाद में किताब. फ्रीडम फाइटर के इन रुखों को दिखाना भी काफी जरूरी है. जिसमें शूजित सरकार काफी बेहतर कदम उठा गए. अंत में जलियांवाला बाग के हिस्से को जिस तरह से दिखाया गया है, वो किसी भी इंसान की आंखों से आंसू निकालने के लिए काफी है.  

फिल्म आई है, लोग देख रहे हैं और पसंद भी कर रहे हैं. आने वाले दिनों में इसे अवॉर्ड भी मिलेंगे, शायद एक्टर से ज्यादा अवॉर्ड डायरेक्टर और बैकग्राउंड में काम करने वाली टीम को मिल जाए. लेकिन उम्मीद है कि बायोग्राफी में क्राफ्ट, कैरेक्टर को लेकर जिस तरह का काम करने की कोशिश की गई है, उसका दायरा आगे भी बॉलीवुड में बढ़ेगा. 

साथ ही अब लोगों में उधम सिंह से जुड़ी किताबें, किस्से पढ़ने/सुनने/देखने की दिलचस्पी भी बढ़ेगी. 

 

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