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Brahmastra Review: ब्रह्मास्त्र की ऑफ ट्रैक कहानी करेगी टॉर्चर, 400 करोड़ में बनी फिल्म का मामला है गड़बड़

रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की मचअवेटेड फिल्म ब्रह्मास्त्र रिलीज हो गई है. फिल्म का निर्देशन अयान मुखर्जी ने किया है. उन्हें ये फिल्म बनाने में 10 साल लग गए. तो क्या अयान की ये मेहनत रंग लाई है? अगर आप ब्रह्मास्त्र देखने का प्लान बना रहे हैं तो इससे पहले ये रिव्यू पढ़ना बिल्कुल भी ना भूलें.

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रणबीर कपूर
रणबीर कपूर
फिल्म:ब्रह्मास्त्र
1.5/5
  • कलाकार : अमिताभ बच्चन, नागार्जुन, रणबीर कपूर, आलिया भट्ट, मौनी रॉय
  • निर्देशक :अयान मुखर्जी

2014 में अनाउंस हुआ कि अयान मुखर्जी अपना शाहकार बनाने की तैयारी में लग रहे हैं. अयान मुखर्जी एक ऐसा नाम है जो काफी अच्छे प्रोजेक्ट्स के साथ जुड़ा रहा. मसलन, वे स्वदेश के असिस्टेंट डायरेक्टर और वेक अप सिड के डायरेक्टर थे. ये दो नाम अपने आप में बेहद मजबूत हैं और अयान के सीवी की रीढ़ बनते हैं. ऐसे में जब आपको इतने बड़े लेवल की एक फिल्म का सपना दिखाया जाए तो हर बीतते दिन के साथ इंतजार की तीव्रता बढ़ती जाती है. ये इंतजार एक बुखार सा बढ़ता है जो शरीर को लगातार तपाता ही रहता है. लेकिन फिर आप उस बड़े से, अंधेरे से भरे हॉल में, गद्दीदार कुर्सी पर बैठते हैं और 3 घंटे बाद अपने नये पाये उस ताप से सब कुछ भस्म कर देना चाहते हैं. ब्रह्मास्त्र ने ऐसी ही गत की है.

कहानी क्या है?

एक लड़का है शिव. उसे पता नहीं है कि वो हीरो है, लेकिन वो है. दशहरा और दीवाली के बीच हुई कुछ घटनाओं के चलते उसे खुद पर शक होता है. उसे लगता है कि उसके साथ कुछ लोचा है. आगे-आगे कहानी क्लियर होती है और मालूम चलता है कि भाई के पास कुछ शक्तियां हैं जो उसे योद्धा बना सकती हैं. युद्ध किसके खिलाफ होगा? युद्ध होगा एक बलशाली नेगेटिव कैरेक्टर के खिलाफ जिसके 'नौकर' दुनिया में घूम-घूम ब्रह्मास्त्र को हासिल करने की जुगत भिड़ा रहे हैं. ब्रह्मास्त्र 3 हिस्सों में बंटा हुआ है और उन 'नौकरों' को उसे एक जगह लाकर जोड़ना है. इसी हिस्सों में बंटे ब्रह्मास्त्र को हासिल करने और उसकी रक्षा करने की कहानी है ब्रह्मास्त्र की ये पहली किस्त.

कौन-कौन हैं?

ब्रह्मास्त्र के पहले चैप्टर में शिव मुख्य कैरेक्टर है. शिव का रोल रणबीर कपूर ने किया है. उनके साथ आलिया भट्ट हैं जो ईशा का रोल कर रही हैं. गुरु रघु के रूप में अमिताभ बच्चन हैं. शाहरुख खान और नागार्जुन के छोटे-छोटे लेकिन अहम रोल हैं. शाहरुख का नाम और काम का स्वदेश से बड़ा कनेक्शन भी है. इसके अलावा मौनी रॉय और सौरव गुर्जर पूरी फिल्म में दिखते हैं. दोनों एंटी-हीरो कैरेक्टर हैं और आप पूरी फिल्म में किसी भी समय पर इनका पक्ष नहीं लेते दिखेंगे. इसके अलावा 3 जगहों पर डिम्पल कपाड़िया भी दिखायी देती हैं. 

क्या है मामला?

मामला ठीक नहीं है. पहले दस मिनट में समां बंधा, उसके बाद फिल्म की कहानी वो टेढ़ी डंडी वाला रॉकेट बन गयी जो किसके छप्पर में जा घुसे, भगवान भी न बता पाये. (पहले दस मिनट में क्या हुआ, ये इसलिये नहीं बताया जा रहा है क्योंकि स्पॉइलर की श्रेणी में आ जायेगा.)

सोचिये कि आप एक थाली लेकर बैठे हैं जिसमें बढ़िया मुलायम पकौड़ी वाली कढ़ी और चावल रखा है और उसपर तबीयत से देसी घी छोड़ा गया है. आप दनादन उसे समेटने में लगे हैं लेकिन हर दो या तीन कौर के बाद कोई बार-बार आकर आपके सामने से थाली हटा रहा है और कोल्ड-कॉफी रखे दे रहा है. आपको आगे कढ़ी-चावल खाने के लिये कोल्ड-कॉफी पीना जरूरी है. ब्रह्मास्त्र की असल सुपर-हीरो वाली कहानी वही कढ़ी-चावल है जिसकी थाली बार-बार खींची जा रही है और आपको मजबूरन शिव-ईशा की लव-स्टोरी रूपी कोल्ड-कॉफी सुड़कनी पड़ रही है.

फिल्म की शुरुआत थ्रिलिंग है और आप एक अच्छी फास्ट-पेस वाली सुपर-हीरो कहानी की अपेक्षा करने लग जाते हैं. लेकिन फिर प्रेम कथा शुरू हो जाती है और डांस होने लगता है. ऐसा डांस जिसमें भूटान की जनसंख्या जितनी जनता हीरो के पीछे नाचती दिखती है. हीरो को हीरो के रूप में स्थापित करने के क्रम में इतनी ज़्यादा मेहनत कर दी गयी है कि दशहरा के पंडाल की साज-सज्जा, भीड़, म्यूज़िक और एम्बियेंस देखकर कोल्डप्ले, एड शीरन वगैरह शर्मिंदा हो जायें. और ये समस्या पूरी फिल्म में रही है. कहानी ऐसे हाइवे पर चल रही दिखती है जिसपर हर 10 किलोमीटर बाद टोल नाका आ जाता है और आपके पास दाम चुकाने के अलावा और कोई ऑप्शन नहीं होता. ये दाम आप भयानक क्रिंज डायलॉग्स, अटपटी बातें, गैर-जरूरी सिचुएशन और गाने झेलकर चुकाते हैं. कहना न होगा कि फिल्म में असल काम की चीज महज 30 से 35 प्रतिशत है. बाकी सब आप भूल भी जाएं, कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. फिल्म अंत में ये समझाती है कि प्रेम से बड़ी ताकत इस दुनिया में और कोई है ही नहीं. लेकिन वहां तक पहुंचाने के क्रम में जिस टॉर्चर से गुजरना पड़ता है, वो अमानवीय है. शिव और ईशा की प्रेम-कथा सहज नहीं है बल्कि हमपर थोपी गयी है और इसके लिये अयान मुखर्जी के सबसे ज्यादा नंबर काटे जाने चाहिये.

फिल्म के संवाद हुसैन दलाल ने लिखे हैं. बेहद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि डायलॉग अझेल हैं. फिर वो चाहे शिव का 'लाइट एक ऐसी रोशनी है जो...' कहना हो या ईशा का अलग-अलग मौकों पर 'कौन हो तुम?' पूछना हो. आप पाएंगे कि बगैर कोई एक्स्ट्रा कोशिश किये कई मौकों पर आपका हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद माथा पीट लेता है. अव्वल तो रणबीर और आलिया को जिस तरह से मिलते हुए, उनकी दोस्ती बढ़ते हुए दिखाया गया है, अपचनीय है. दूसरा, उस सिचुएशन के साथ 'तुम अमीर हो, मैं गरीब' और 'भरोसा करना आता है?' और 'मेरे बिना तुम ठीक से रह लोगे?' टाइप्स डायलॉग कतई नहीं जाते हैं. ऐसा लगता है जैसे कोई खिलाड़ी खड़ाऊं पहनकर फ़ुटबॉल खेलने उतर गया हो. कई जगहों पर 'विलेन' और 'हीरो' के बीच की बातचीत बेहद बचकानी लगने लगती हैं.

जैसा कि बताया गया है, फिल्म के गाने कहानी पर ब्रेक लगाते हैं. कुछ फिल्मकार हैं जो अब उस बीमारी से निकल रहे हैं जहां हीरो-हीरोइन को गानों में अनिवार्य रूप से नाचना होता ही है. उन्होंने गाने रखे हैं लेकिन कहानी उन्हें सीढ़ी बनाकर आगे बढ़ती है. लेकिन धर्मा और यशराज जैसे बैनर अभी भी पुरातन पद्धति को छाती से चिपकाए हुए हैं. क्या आप सोच सकते हैं कि जब आयरन मैन की गोद में लेटा स्पाइडर मैन मर रहा हो तो पीछे उदित नारायण की आवाज़ में 'मुसाफ़िर जाने वाले, नहीं फिर आने वाले...' बजने लगे? नहीं न? लेकिन ब्रह्मास्त्र में जब दुनिया नष्ट हो रही थी, अरिजीत सिंह की आवाज़ में 'केसरिया' का एक वर्ज़न चल रहा होता है. लेकिन हां, गानों से इतर, बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा है जिसके पीछे अंग्रेज़ी कम्पोजर साइमन फ्रैन्ग्लेन का हाथ है. जहां-जहां मौका बन पाया, रोमांच पैदा करने में बैकग्राउंड म्यूजिक ने अच्छा काम किया.

इन सब के सिवा, विजुअल इफेक्ट्स का काम अच्छा है. हिंदी फिल्मों में, इक्का-दुक्का फिल्मों को छोड़ दें तो जिनमें ग्राफिक्स की गुंजाइश न के बराबर रही, अब तक का सबसे अच्छा ग्राफिक्स देखने को मिलता है. इसके विजुअल इफेक्ट्स पर DNEG नाम की कम्पनी ने काम किया है जिन्होंने फ़िल्म ड्यून को ऑस्कर भी दिलाया था.

और, अंत में:

ब्रह्मास्त्र अस्त्रवर्स की पहली किस्त है. लेकिन इसने निराश किया. फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है जो जनता ने पहले देखा ही न हो. ऐसे कैरेक्टर्स, ऐसी कहानियां, ऐसी परिस्थितियां, ऐसे एक्शन सीक्वेंस आदि ये ओटीटी पर खपने वाली जनता सालों से देखती आ रही है. ब्रह्मास्त्र में जो देखने को मिलता है वो आप पहले ही हैरी पॉटर, मार्वेल और डीसी सीरीज में देख चुके हैं. इसपर बात करने पर आ जाएं तो लम्बी लिस्ट बन सकती है. नये के नाम पर बस हिंदी पौराणिक नाम आ गये हैं. यानी नये पैकेट में वही पुरानी चीज पैक कर दी गयी है. ट्रीटमेंट वाला हिस्सा बेहद कमजोर है. लेकिन शोरूम को जगमग रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है.

 

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