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Shamli district politics: गन्ने की मिठास वाले शामली में क्या फिर दिखेगी मुस्लिम और जाटों की एकजुटता?

UP election news: शामली जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं. इस इलाके में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर होती है. योगी सरकार में गन्ना मंत्री सुरेश राणा भी शामली जिले की थाना भवन सीट से ही विधायक हैं. इस इलाके में जाट और मुस्लिम वोटरों का सबसे ज्यादा दबदबा है. अगर इन दोनों का गठजोड़ किसी की भी नैया आसानी से पार लगा सकता है.

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शामली में बड़े पैमाने पर होती है गन्ने की खेती शामली में बड़े पैमाने पर होती है गन्ने की खेती
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गन्ने की खेती का हब है पश्चिमी यूपी का शामली
  • शामली जिला 2011 में बना, तीन विधानसभा सीटें
  • थाना भवन सीट से भाजपा विधायक हैं सुरेश राणा

शामली, पश्चिमी यूपी के जाट लैंड का एक महत्वपूर्ण जिला है. शामली को मायावती सरकार के कार्यकाल में 2011 में नया जिला बनाया गया था. हालांकि, मायावती सरकार ने जिले का नाम प्रबुद्धनगर रखा था जिसे बदलकर अखिलेश यादव सरकार में शामली कर दिया गया. जिला बनने से पहले शामली एक तहसील के रूप में स्थापित था, और मुजफ्फरनगर जनपद के अंतर्गत ये इलाका आता था. 

शामली के आसपास सहारनपुर, मुजफ्फरनगर जिले हैं. हरियाणा का पानीपत भी यहां से नजदीक ही है.

जिले में तीन विधानसभा सीटें हैं- शामली, थाना भवन और कैराना. यूं तो ये इलाका अपने गन्ने के लिए भी मशहूर है लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों का असर यहां के सामाजिक सौहार्द पर भी देखने को मिला. कैराना से पलायन की खबरें पूरे देश में चर्चा का विषय बनीं तो बीजेपी नेता सुरेश राणा भी अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहे. ये पूरा इलाका गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है, और सुरेश राणा ही योगी सरकार में गन्ना मंत्री हैं. 

किसान नेता राकेश टिकैत लगातार गन्ने के रेट का मसला उठाते रहे हैं. उनका कहना है कि पिछली तीन सरकारों की तुलना की जाए तो योगी सरकार में गन्ने के रेट में सबसे कम बढ़ोतरी हुई है. वो योगी सरकार को इस मामले में तीसरे नंबर पर बताते हैं. 

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जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर मुस्लिम, जाट और दलित वोटरों का प्रभाव है. माना जाता है कि यहां का जाट और मुस्लिम वोटर मिलकर किसी भी पार्टी को जिताने की ताकत रखता है. राष्ट्रीय लोकदल और सपा के उम्मीदवार इसी समीकरण के सहारे यहां से जीतते भी रहे हैं. लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से जाट वोट बीजेपी के पाले में नजर आया जिसका सियासी फायदा भी पार्टी को पहुंचा. लेकिन 2022 के चुनाव में किसान आंदोलन से जाट और मुस्लिमों की दूरियां कम हुई हैं. आरएलडी और सपा ने गठबंधन किया है जिससे राजनीतिक हालात काफी बदले हैं. 

थाना भवन सीट

इस सीट से भाजपा के सुरेश राणा लगातार दो बार से विधायक हैं. थाना भवन विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की कुल संख्या करी साढ़े तीन लाख है. इनमें 50 हजार के करीब जाट है जबकि एक लाख से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं. इनके अलावा सैनी 40 हजार के करीब, कश्यप 30 हजार के करीब और जाटव करीब 45 हजार है. इनके अलावा पासी, कोरी, चौहान, राजपूत, ब्राह्मण और गुर्जर वोट भी कुछ-कुछ संख्या में है. 

साल 2017 के चुनाव में इस सीट से भारतीय जनता पार्टी के सुरेश राणा दूसरी बार जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. उन्होंने बसपा के अब्दुल वारिस खान को हराया था. इस चुनाव में उन्हें 90995 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर रहे बसपा उम्मीदवार अब्दुल वारिस को 74178 वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर रहे रालोद उम्मीदवार जावेद राव को 31275 वोट मिले थे, सपा उम्मीदवार चौथे नंबर पर रहे थे. 
2012 विधानसभा चुनाव के आंकड़ों की बात करें तो इस सीट से भाजपा के सुरेश राणा कड़ी टक्कर के बाद विजयी हुए थे. उन्होंने रालोद के अशरफ अली खान को हराया था. इस चुनाव में सुरेश राणा को 53719 वोट जबकि दूसरे नंबर पर रहे अशरफ अली खान को 53454 वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर बसपा के अब्दुल वारिस खान थे, जिन्हें 50001 वोट मिले थे. चौथे नंबर पर समाजवादी पार्टी के किरनपाल कश्यप थे, जिन्हें 10198 वोट मिले थे. 

कैराना सीट

कैराना में वोटरों संख्या 3 लाख 17 हजार के करीब है. इस इलाके से हुकुम सिंह भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता हुआ करते थे. वो सांसद भी रहे. 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने उनकी बेटी मृगांका सिंह को यहां से उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वह चुनाव नहीं जीत सकी थीं. वर्तमान में यहां से समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन विधायक हैं. नाहिद हसन और उनके परिवार का यहां की राजनीति में दशकों से दबदबा रहा है. 

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कैराना लोकसभा सीट पर 2014 में भाजपा के हुकुम सिंह सांसद बने थे. उनके देहांत के बाद जब 2018 में यहां उपचुनाव हुआ तो आरएलडी के टिकट पर नाहिद हसन की मां तबस्सुम हसन को उतारा गया. सपा ने भी उन्हें सपोर्ट किया और उन्होंने बीजेपी को हरा दिया. नाहिद हसन के पिता चौधरी मुनव्वर हसन भी यहां से सांसद और विधायक रहे हैं. कुल मिलाकर इस मुस्लिम गुर्जर परिवार का कैराना की राजनीति में लंबे समय से कायम है. 

2012 विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां से बीजेपी के टिकट पर हुकुम सिंह लड़े थे और जीत दर्ज की थी. जबकि दूसरे नंबर पर बसपा के अनवर हसन थे. तीसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के अयूब जंग थे.

शामली विधानसभा

2012 में हुए यूपी के चुनाव में शामली विधानसभा सीट पर कांग्रेस के पंकज मलिक विधायक बने थे. पंकज मलिक ने समाजवादी पार्टी के वीरेंद्र सिंह को हराया था. पंकज मलिक को 53947 वोट मिले थे. पंकज मलिक अब समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं. पंकज एक जाट नेता हैं और इस सीट पर सबसे ज्यादा मतदाता जाट और मुस्लिम का है. हालांकि, 2017 के चुनाव में जब बीजेपी की लहर चली तो उसके उम्मीदवार तेजेंद्र निरवाल ने पंकज मलिक को हरा दिया. 

करीब साढ़े तीन लाख वोट वाले इस क्षेत्र में जाट और मुस्लिम करीब 70-70 हजार है. वाल्मीकि वोट की तादाद यहां अच्छी खासी है जो करीब 40 हजार से ज्यादा है. वहीं, कश्यप करीब 25 हजार, ब्राह्मण करीब 22 हजार, वैश्य करीब 38 हजार और गुर्जर करीब 21 हजार हैं. इनके अलावा सैनी, प्रजापति और पांचाल वोट के भी छोटे-छोटे पॉकेट हैं. 

मुद्दे
शामली शहर में रेलवे फाटक पर फ्लाईओवर का नहीं बनना भी इस बार एक बड़ा मुद्दा बन गया है. यहां रेलवे फाटक नहीं होने से करीब 30 से 45 मिनट तक का जाम लग जाता है. हर चुनाव से पहले नेता इस समस्या का समाधान करने का वादा करते हैं लेकिन सच बात ये है कि अभी तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सका है. इसके अलावा बाईपास नहीं होने के चलते भी शहर में लंबा जाम लगता है. क्षेत्र के लोग इस समस्या के समाधान के लिए भी काफी समय से राजनीतिक दलों पर दबाव बनाते रहे हैं. गन्ने का रेट भी यहां के किसानों का बड़ा मुद्दा है और बिजली के महंगे रेट से भी लोग आजिज हैं.


 

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