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Noida Airport: क्या जेवर एयरपोर्ट की पट्टी से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लॉन्च होगी बीजेपी की चुनावी यात्रा?

यूपी विधानसभा चुनाव में बार बीजेपी की चुनौती न सिर्फ कई मुद्दों से है, बल्कि पिछले चुनावों के बेहतरीन प्रदर्शन को दोहराना सबसे बड़ी चुनौतियों में एक होगा. ऐसे में सवाल है कि क्या बीजेपी फिर से करिश्माई प्रदर्शन कर पाएगी?

स्टोरी हाइलाइट्स
  • पीएम नरेंद्र मोदी ने किया जेवर में नोएडा एयरपोर्ट का शिलान्यास
  • एयरपोर्ट का शिलान्यास बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है
  • साथ ही योगी-मोदी की जुगलबंदी ने मुगालते तोड़ने की पहल की

कभी नोएडा उत्तर प्रदेश की सत्ता में बैठने वालों के लिए एक अपशकुन के तौर पर देखा जाता था. ऐसा माना जाता था कि जो भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नोएडा का रुख करता है, वो सत्ता वापसी नहीं कर पाता. योगी-मोदी की जुगलबंदी ने न सिर्फ इस मुगालते को तोड़ने की पहल की है, बल्कि नोएडा अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट के जरिए पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी गणित पर भी अब बीजेपी की नज़र है.

पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को जो बड़ी जीत हासिल हुई थी, उसमें वेस्टर्न यूपी में बीजेपी के पक्ष में चली आंधी का महत्वपूर्ण योगदान था. जेवर एयरपोर्ट के जरिए इस इलाके में विकास की योजनाओं की नई शुरुआत करने की बात अब बीजेपी कर रही है.

बीजेपी का यह प्लान
साथ ही साथ किसान आंदोलन की वज़ह से जो माहौल पार्टी के खिलाफ बना था उसका रुख मोड़ने की तैयारी भी पार्टी जेवर से करने की कोशिश करेगी. तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के बाद पहली बार प्रधानमंत्री मोदी पश्चिमी यूपी में चुनावी बिगुल फूकेंगे. निशाने पर सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि सामाजिक तौर पर बंटे इस इलाके की कई महत्वपूर्ण जातियां भी होंगी.

हाल ही में नोएडा में राजा मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण के मौके पर पार्टी को गुर्जर समुदाय का खासा विरोध झेलना पड़ा था. जेवर के आस-पास इस समुदाय की खासी आबादी है, जहां पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को लगभग हर सीट पर कामयाबी भी मिली थी. जेवर से बीजेपी को दोबारा उनके समर्थन की उम्मीद है, ताकि दिल्ली से सटे इलाकों में अपना दबदबा बरकरार रखा जाए.
 
जाट वोटरों पर सबकी नजरें
जाट वोटरों की अहमियत की अनदेखी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी समीकरण में शायद ही कोई पार्टी कर पाए. बुलंदशहर, गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, अलीगढ़, मथुरा, गौतमबुद्धनगर, बागपत, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और शामली जैसे जिले ऐसे हैं, जहां जाट वोटर अपने दम पर चुनावों का रुख बदलने की हैसियत रखते हैं.

किसान आंदोलन में इन्हीं की नाराज़गी चर्चा का विषय रही. खास तौर पर गन्ना उपजाने वाले किसान चीनी मिलों की मनमानी से परेशान हैं. सरकार से नाराज़गी इस बात को लेकर भी है कि गन्ने की कीमत उस तरीके से नहीं बढ़ाई गई जितने का वायदा किया गया था. साथ ही किसानों को मिलने वाली बिजली की कीमत हरियाणा और पंजाब की तुलना में महंगी होने का मुद्दा भी किसानी के दृष्टिकोण से काफी अहम है.

पिछले दिनों जो परेशानी किसानों के घर-घर तक पहुंची है वो है आवारा पशुओं की समस्या, जो खड़ी फसल को काफी नुकसान पहुंचा रही है. गौ वंश की सुरक्षा सुनिश्चित तो हो लेकिन किसानों का नुकसान ना हो ये आवाज़ हर ओर सुनाई पड़ी है. इन्हीं मसलों को जेवर के मंच से मोदी जी भी उठाएंगे और उनके हल की बात करेंगे ऐसा पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान मानते हैं.

कितनी टक्कर दे पाएगा विपक्ष?
लेकिन, इस बार बीजेपी की चुनौती न सिर्फ इन मुद्दों से है बल्कि अगर जयंत चैधरी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोक दल का संभावित गठबंधन समाजवादी पार्टी के साथ हुआ तो हाल के चुनावों में अपने बेहतरीन प्रदर्शन को दोहराना भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में एक होगा. जाटों के साथ मुसलमान और यादवों का वोट अगर बड़ी संख्या में गठबंधन की तरफ झुका तो सियासी तराजू भी जरूर झुकेगा.

ऐसे में अखिलेश का अपने चाचा शिवपाल यादव के साथ अनबन अगर खत्म हो गई तो मुश्किलें और बढ़ेंगी क्योंकि तब यादव और मुस्लिम वोट बंटने के आसार थोड़े कम हो जाएंगे. बीजेपी की उम्मीद इस बात पर रहेगी कि इस गठबंधन के खिलाफ एक बार फिर से ध्रुवीकरण की राजनीति काम करे और बाकी जातियों का साथ लेकर पार्टी गठबंधन के चुनावी गणित को बिगाड़ दे.

ऐसे में एआईएमआईएम के औवैसी की भूमिका और उनके परफॉर्मेंस पर भी बीजेपी की नज़र रहेगी, क्योंकि पश्चिमी यूपी के ज़्यादातर जनपदों में अल्पसंख्यक वोटर निर्मायक भूमिका में हैं. तीन तलाक जैसे कानूनों के मद्देनज़र अल्पसंख्यक महिला वोटरों को पहले भी बीजेपी साधने की कोशिस कर चुकी है जिसका परिणाम 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान कुछ हिस्सों में देखने को मिला था.

मायावती क्या खेल करेंगी?
इस लिहाज से अहम जो वोट बैंक है, वो है दलित वोटरों का. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक बड़ी आबादी दलित वोटरों की भी है, इसी वज़ह से कभी ये बीएसपी का गढ़ माना जाता था. सुप्रीमो मायावती का प्रभाव अब भी कई इलाकों में बदस्तूर कायम है, ख़ास तौर पर जाटवों में. हालांकि बाकी अनुसूचित जातियां मायावती के हिस्से से छिटक गईं और उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला. इसी इलाके के सहारनपुर से नए दलित नेता के तौर पर उभरने वाले चंद्रशेखर आज़ाद भी आते हैं, जिन्होंने फिलहाल अपने पत्ते नहीं खोले हैं.

प्रधानमंत्री की रैली से ठीक पहले अखिलेश यादव ने हाथरस की घटना पर ट्वीट करके दल्त कार्ड खेलने की कोशिश की है. बीजेपी जानती है कि बिना एससी वोटरों को साथ जोड़े हुए इस इलाके में चुनावी बैतरणी पार करना लगभग असंभव है, इसलिए प्रधानमंत्री केंद्र और राज्यों की योजनाओं के जरिए दलितों को फिर से साध रहे हैं.

एयरपोर्ट बनने से यह फायदा
ये इलाका न सिर्फ ग्रामीण परिवेश के लिए जाना जाता है बल्कि एक बड़ी आबादी दिल्ली से सटे शहरी इलाकों में भी रहती है. आम तौर पर नौकरी पेशा और उद्योगों से जुड़ी इस आबादी में पार्टी का पॉपुलरिटी ग्राफ ऊपर ही रहा है. नोएडा, गाज़ियाबाद और मेरठ सरीखे शहरों को एक्सप्रसवे से जोड़ने के बाद रैपिड रेल और अब जेवर एयरपोर्ट की सौगात से मन मोहने की कवायद है. लेकिन यहां भी बेरोज़गारी और महंगाई की मार चुनौतियों के तैर पर मुंह खोले खड़ी है.

प्रधानमंत्री मोदी की कोशिश यही है कि जेवर के लांचपैड से सियासत टेक ऑफ करे और उड़ान बाकी पार्टियों और गठबंधन से कहीं ऊंची हो, जैसा 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ 2017 के विधानसभा चुनावों में भी हुआ था.


 

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