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UP Election: क्या कांग्रेस की चुनावी नैया पार करा पाएगी पीड़िताओं को पावर देने की पहल?

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 50 महिलाओं को टिकट देने के साथ-साथ उन महिलाओं को भी प्रत्याशी बनाया है, जो किसी न किसी मामले में पीड़ित रही हैं. प्रियंका गांधी ने पीड़ित माहिलाओं को टिकट देकर नई सियासी इबारत लिखने की जरूर कोशिश की है, लेकिन ये महिलाएं क्या कांग्रेस की चुनावी नैया पार लगा सकेंगी?

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और आशा वर्कर पूनम पांडेय कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और आशा वर्कर पूनम पांडेय
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेस नेताओं के बेटे-बेटियों को मिले टिकट
  • प्रियंका ने कई दिग्गज नेताओं को उतारा
  • 50 महिलाओं और 40 युवाओं को भी कांग्रेस का टिकट

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के लिए कांग्रेस ने गुरुवार को अपने 125 उम्मीदवरों के नामों का ऐलान किया. सूबे की सियासत में कुछ अप्रत्याशित करने की संभावना के मद्देनजर प्रियंका गांधी ने 40 फीसदी टिकट देने के साथ-साथ कई उन महिलाओं को भी प्रत्याशी बनाया है, जो किसी न किसी मामले में पीड़ित रही हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि पीड़ित महिलाओं को पावर देने की प्रियंका गांधी की पहल क्या कांग्रेस की चुनावी नैया भी पार कराएगी? 

कांग्रेस ने उन्नाव गैंगरेप पीड़िता की मां आशा सिंह को बांगरमऊ सीट से टिकट दिया है. ऐसे ही आशा वर्कर पूनम पांडे को शाहजहांपुर सीट से प्रत्याशी बनाया है, जिन्हें पिछले साल नवंबर में शाहजहांपुर में यूपी पुलिस ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मिलने की कोशिश के दौरान पीटा था. ऐसे ही लखनऊ में सीएए के खिलाफ प्रदर्शन में जेल जाने वालीं सदफ जफर को लखलऊ सेंट्रल सीट से प्रत्याशी बनाया है. 

वहीं, सोनभद्र के उम्भा गांव में जमीन को लेकर गोंड आदिवासियों की कानूनी लड़ाई के अगुवा रामराज गोंड को भी पार्टी ने टिकट दिया है. प्रयागराज में बड़े खनन माफियाओं के खिलाफ मोर्चा खोलने पर अल्पना निषाद के नाव को तोड़ दिया गया था, जिन्हें प्रियंका गांधी ने प्रयागराज साउथ सीट से कैंडिडेट घोषित किया है. ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में लखीमपुर खीरी में बीजेपी नेताओं की हिंसा की शिकार बनीं ऋतु सिंह को मोहम्मदी सीट से प्रत्याशी बनाया गया है.  

प्रियंका गांधी की नई इबारत लिखने की कवायद
कांग्रेस ने भले ही अपनी पहली ही लिस्ट में ऐसी महिलाओं को टिकट दिए हों, जो योगी सरकार में अत्याचार या प्रताड़ना की शिकार हुई हैं. हालांकि इन सभी महिलाओं के लिए विधानसभा पहुंचना आसान नहीं है. उन्हें सपा, बसपा और बीजेपी जैसी पार्टियों के मजबूत कैंडिडेट से मुकाबला करना होगा. यह बात जरूर है कि उनके प्रति लोगों को सहानुभूति है, लेकिन वोट में कितना तब्दील होगी, यह कहना मुश्किल है. 

कांग्रेस के पास न सियासी जमीन, न चेहरा
राजनीतिक विश्लेषक काशी प्रसाद यादव का मानना है कि कांग्रेस इस चुनाव में एक अलग तरीके की राजनीति कर रही है, क्योंकि अपनी खोई हुई जमीन को वापस हासिल करने के लिए पार्टी के पास कुछ अलग करने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है. प्रियंका गांधी को यह फैसला इसलिए लेना पड़ा है कि वे जानती हैं कि बिना इस तरह के कदम उठाए न तो पार्टी चर्चा में आ सकती है और न ही खोया हुआ जनाधार. 

वह कहते हैं कि कांग्रेस ने ज्यादा से ज्यादा महिलाओं, युवाओं, नए चेहरों और पीड़ित-शोषित लोगों को प्रत्याशी बनाकर एक प्रयोग कामयाब जरूर किया है, लेकिन उनकी चुनावी नैया पार लगना आसान नहीं है. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सूबे के जिन सीटों पर उन्हें प्रत्याशी बनाया गया है, वहां पर विपक्षी दलों से तगड़े उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा यूपी में अभी चुनाव के लिए जातीय समीकरण भी काफी महत्व रखते हैं. कांग्रेस ने जिन पीड़ित को दिया है, वहां पर उनकी जाति का वोट जरूर है, लेकिन वो कितना हासिल कर पाएंगी यह चुनौती होगी. 

'प्रियंका का प्लान भविष्य के लिए है'
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि कांग्रेस ने जिन पीड़ित महिलाओं को टिकट दिए हैं, उसके जरिए बड़ा सियासी संदेश देना का मकसद है. हो सकता है बहुत सारे प्रत्याशी चुनाव न जीते, लेकिन वो अगर दूसरे या तीसरे नंबर पर रहकर भी अच्छा वोट शेयर लाते हैं तो भविष्य के लिए बड़ा संकेत होगा. कांग्रेस के लिए आने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी सियासी जमीन तैयार करने का मौका मिल जाएगा, क्योंकि पार्टी का असली मकसद 2024 है. प्रियंका गांधी ने इसी रणनीति के तहत टिकट बांटे हैं कि वे प्रदेश में एक नया नेतृत्व तैयार करना चाहती हैं, इसलिए इसे जीत और हार की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए?

 

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