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...जब पहली बार चुनावी मैदान में उतरे थे लालू, बना दिए थे कई रिकॉर्ड

अपने 4 दशकों से अधिक वक्त के सियासी सफर में लालू ने छात्र यूनियन, संसद, विधानसभा, विधान परिषद समेत कई चुनाव लड़े लेकिन सबसे पहले चुनाव की बात ही कुछ अलग थी.

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव (फाइल) बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव (फाइल)

  • बिहार में जारी है चुनावी सरगर्मी
  • अक्टूबर-नवंबर में हो सकता है मतदान
  • राजद को सत्ता में वापसी की उम्मीद

बिहार में चुनावी सरगर्मी तेज हो रही है. अक्टूबर-नवंबर तक राज्य में चुनाव हो सकते हैं. सभी दल अपने गठबंधन और रणनीति को फाइनल करने में जुट गए हैं. मुकाबला नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए और तेजस्वी के चेहरे के साथ उतर रहे महागठबंधन के बीच ही होता दिख रहा है. आरजेडी प्रमुख लालू यादव भले ही रांची के रिम्स में चारा घोटाले की सजा काट रहे हों लेकिन सबकी निगाहें लालू की रणनीति पर टिकी हुई है. कई सवालों पर चर्चा तेज है कि क्या लालू चुनाव से पहले बेल पर बाहर आएंगे? क्या रिम्स से ही लालू आरजेडी की चुनावी रणनीति को साधेंगे?

लालू पर खासतौर से निगाहें इसलिए भी हैं क्योंकि बिहार की सियासत में लालू से ज्यादा जमीनी पकड़ और लंबा अनुभव किसी के पास नहीं रहा है. छात्र राजनीति के बाद 1977 में लालू यादव पहली बार चुनाव लड़े थे. उसके बाद चारा घोटाले में सजा सुनाए जाने के बाद 2014 से लालू चुनाव में नहीं उतर सके.

43 साल का सियासी अनुभव

अपने 4 दशकों से अधिक वक्त के सियासी सफर में लालू ने छात्र यूनियन, संसद, विधानसभा, विधान परिषद समेत कई चुनाव लड़े लेकिन सबसे पहले चुनाव की बात ही कुछ अलग थी. 43 साल पहले के इस चुनाव में लालू पहली बार उतरे थे. 1977 के लोकसभा चुनाव में उतरे 29 साल के युवा लालू ने कई सियासी कीर्तिमान खड़े किए थे.

लालू का पहला चुनाव

11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज में जन्मे लालू यादव जेपी मूवमेंट के समय पटना यूनिवर्सिटी में छात्र नेता थे. 1974 के जेपी आंदोलन के समय लालू खूब सक्रिय रहे और पटना में छात्र आंदोलन की अगुवाई कर जेपी के करीब भी आ गए. इसके बाद जब इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1977 में 6th लोकसभा चुनाव हुए तो लालू छपरा सीट (वर्तमान सारण सीट) से उतरे. तब सिर्फ 29 साल की उम्र में लालू चुनाव में उतरे थे.

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भारतीय लोकदल के टिकट पर उतरे थे लालू

देश में इमरजेंसी को लेकर कांग्रेस के खिलाफ नाराजगी के बीच ये चुनाव हो रहा था. जनता पार्टी के साथ गठबंधन के बीच लालू भारतीय लोकदल के टिकट पर उतरे. लालू के सामने चुनावी मैदान में कांग्रेस के राम शेखर प्रसाद सिंह थे. इसके अलावा सीपीआई और कई निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में थे.

कैसे रहे थे नतीजे?

इमरजेंसी के खिलाफ जमकर देशभर में जेपी ने अभियान चलाया और कांग्रेस को हराकर जनता पार्टी की सरकार बनवाने में सफल रहे. मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. छपरा लोकसभा सीट से उतरे लालू के युवा चेहरे ने भी चुनाव में कमाल दिखाया. इस चुनाव में छपरा सीट पर 6,58,829 वोटर्स थे. छपरा लोकसभा सीट पर 73.89% वोटिंग हुई और कुल 4,83,198 वोट पड़े. इनमें से युवा नेता लालू ने 4,15,409 यानी 85.97% वोट हासिल किए.

बाकी के सभी उम्मीदवार कुल मिलाकर सिर्फ 14 फीसदी वोट ही हासिल कर पाए. कांग्रेस के उम्मीदवार राम शेखर प्रसाद सिंह को सिर्फ 8.61 % वोट मिले. जबकि सीपीआई के शिवबचन सिंह को 4.39% वोट.

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बन गए थे कई रिकॉर्ड

इस चुनाव में लालू महज 29 साल की उम्र में उतरे थे. संसद पहुंचने वाले सबसे युवा नेताओं में लालू शामिल थे. लालू ने चुनाव में 85 फीसदी से अधिक वोट हासिल किए. अपने निकटतम प्रतिद्वंदी से लालू के वोटों का अंतर 77 फीसदी से अधिक था. बिहार में जनता पार्टी और सहयोगी दलों ने इस चुनाव में 54 में से सभी 54 सीटों पर जीत हासिल की जबकि कांग्रेस के खाते में एक भी सीट नहीं गई. देशभर में भी कांग्रेस को सिर्फ 189 सीटें मिलीं जबकि जनता पार्टी गठबंधन को 345 सीटें हासिल हुईं.

लालू 1980 में जनता पार्टी से अलग हो गए और वीपी सिंह की अगुवाई वाले जनता दल की राजनीति शुरू हुई. इसके बाद लालू ने MY समीकरण यानी मुस्लिम-यादव वोटों पर फोकस किया. 1990 के चुनाव में जनता दल को बिहार विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिली और लालू को सीएम पद. लालू 1990 से 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. चारा घोटाले में घिरने पर लालू ने जनता दल से अलग होकर अपनी पार्टी आरजेडी बना ली और पत्नी राबड़ी देवी को सीएम बनवा दिया. बाद में 2004 से 2009 तक केंद्र की यूपीए सरकार में लालू रेल मंत्री भी रहे.

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आखिरी बार कब चुनाव लड़े लालू?

लालू ने 2009 में आखिरी बार लोकसभा चुनाव लड़ा था. लालू दो लोकसभा सीटों से उतरे थे. सारण से लालू जीत गए लेकिन पाटलीपुत्र से अपने पुराने साथी रंजन यादव से हार गए. 2013 में चारा घोटाले में सजा सुनाए जाने के बाद लालू के चुनाव लड़ने पर 11 साल के लिए रोक लग गई.

इसके बाद, 2015 में लालू-नीतीश साथ थे और महागठबंधन को बिहार में बड़ी जीत मिली लेकिन बाद में नीतीश के एनडीए में जाने के बाद फिर आरजेडी विपक्ष में आ गई. इस बार फिर बिहार में चुनावी सरगर्मी बढ़ी है तो लालू को लेकर चर्चा तेज है. बिहार की राजनीति में लालू के करिश्माई व्यक्तित्व और चुटिले अंदाज में सियासी हमलों का अलग ही प्रभाव है और देखना होगा कि लालू की इस चुनाव में क्या भूमिका रहती है.

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