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बिहार में नामांकन में तीन दिन बाकी, एनडीए-महागठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर घमासान

बिहार चुनाव का बिगुल बज चुका है और पहले चरण की सीटों के लिए नामांकन तीन दिन के बाद शुरू होना है. इसके बाद भी एनडीए और महागठबंधन में सीट शेयरिंग पर सहमित नहीं बन सकी है. एनडीए और महागठबंधन में जारी खींचतान के चलते टिकट के दावेदारों में बेचैनी बढ़ती जा रही है. हालांकि, सीट शेयरिंग को लेकर लगातार सहमति बनाने की कवायद जारी है.

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव (फोटो-india today) नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव (फोटो-india today)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बिहार में एक अक्टूबर से 71 सीटों पर नामांकन
  • महागठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर घमासान
  • एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर नहीं बन रही बात

बिहार विधानसभा चुनाव का औपचारिक ऐलान हो गया है, लेकिन अभी तक एनडीए और महागठबंधन में सीट शेयरिंग पर सहमति नहीं बन सकी है. एनडीए और महागठबंधन में सीटों को लेकर खींचतान अभी भी कायम है जबकि पहले चरण की 71 सीटों के लिए नामांकन भी एक अक्टूबर से शुरू होना है. ऐसे में टिकट के दावेदारों में काफी बेचैनी है. खासकर वैसी सीटों पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है, जहां एनडीए या महागठबंधन के घटक दलों के विधायक नहीं हैं. 

चिराग पासवान के तेवर सख्त
नीतीश कुमार की अगुवाई वाले एनडीए में जेडीयू, बीजेपी, एलजेपी और जीतनराम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा शामिल हैं, लेकिन अभी तक सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय नहीं हो सका है. ऐसे में एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान ने सीट बंटवारे को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह को पत्र लिखा है. साथ ही उन्होंने इस संबंध में बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और पीएम नरेंद्र मोदी से अब तक हुए पत्राचार की कॉपी भी भेजी है.

एनडीए में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला
एनडीए में जेडीयू बिहार में बड़े भाई की भूमिका में रहना चाहती है, जिसके तहत वो बीजेपी से ज्यादा सीटों पर दावेदारी कर रही है, लेकिन बीजेपी बराबर की भूमिका चाहती है. ऐसे में पहला फॉर्मूला ये बनाया जा रहा है कि सूबे की 243 सीटों में से बीजेपी और जेडीयू 100-100 सीटों पर चुनाव लड़े और बाकी बची 43 सीटें में से सहयोगी दल एलजेपी और जीतनराम मांझी की दी जाएं. वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव की तर्ज पर एनडीए में बीजेपी और जेडीयू के बीच सीट बंटवारे को लेकर 50:50 फॉर्मूले पर सहमति बनाए की बात हो रही है. 

बिहार में कुल 243 विधानसभा सीटें हैं. लोकसभा फॉर्मूले के तहत जेडीयू को 122 और बीजेपी को 121 सीट मिल सकती हैं. इसके बाद बीजेपी अपने कोटे से एलजेपी को तो जेडीयू अपने कोटे से जीतनराम मांझी को सीट देने के फॉर्मूले को अपना सकते हैं. हालांकि, इस फॉर्मूल के तहत बीजेपी की अपनी सीटें कम हो सकती हैं, क्योंकि एलजेपी को कम से कम 25 से 30 सीटें देनी ही होंगी. वहीं, माना जा रहा है कि नीतीश अपने कोटे से जीतन राम मांझी की पार्टी को 6-8 सीट दे सकते हैं. नीतीश अगर मांझी की पार्टी को इससे ज्यादा सीटें देते हैं तो इसका मतलब होगा कि जेडीयू अपने कुछ उम्मीदवारों को हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के टिकट पर चुनाव लड़ा सकती है. 

महागठबंधन में भी महाभारत 
वहीं, बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले विपक्षी दलों के महागठबंधन में भी सीट बंटवारे को लेकर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है. इसके चलते जीतनराम मांझी पहले महागठबंधन से नाता तोड़कर अलग हो चुके हैं और अब उपेंद्र कुशवाहा ने भी बगावती तेवर अख्तियार कर लिए हैं. ऐसे में महागठबंधन के दलों की निगाहें अब उपेंद्र कुशवाहा के अगले कदम पर हैं कि वो क्या कदम उठाते हैं. वहीं, इस बार महागठबंधन में आरजेडी और कांग्रेस के अलावा आरएलएसपी व वामपंथी दल भी शामिल हैं. ऐसे में सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान जारी है. 

महागठबंधन में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला
आरजेडी इस बार बिहार में डेढ़ सौ सीटों पर चुनाव लड़ने का दावेदारी कर रही है. वहीं, कांग्रेस ने भी करीब  65 से 70 के बीच सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना रखा है. ऐसे में सहयोगी दलों के लिए बहुत ज्यादा सीटें नहीं बच रही हैं, जिसके चलते उनकी नाराजगी बढ़ रही है. महागठबंधन में बिहार की कुल 243 सीटों में से अगर आरजेडी 150 और कांग्रेस 65 सीटें लेती हैं तो महज 28 सीटें ही सहयोगी दलों के लिए बचती हैं. ऐसे में 20 सीटें वामपंथी दलों को और उपेंद्र कुशवाहा महागठबंधन का हिस्सा रहते हैं तो उनके हिस्से आठ से दस के करीब सीटें आ सकती हैं, लेकिन इस पर वो राजी नहीं हैं. 

ऐसे में माना जा रहा है कि आरजेडी और कांग्रेस को अपने-अपने कोटे की सीटों में समझौता करना पड़ सकता है. इसके तहत आरजेडी को 140 से 145 सीटें मिल सकती हैं तो कांग्रेस को 60 से 65 सीटों के बीच संतोष करना पड़ सकता है. इस तरह से करीब 38 सीटें सहयोगी दल को दी जा सकती हैं, जिनमें से 23 सीटें वामपंथी दलों को और करीब 15 सीटें आरएलएसपी को मिल सकती हैं. इस तरह से सीट बंटवारे को लेकर आपसी सहमति को सकती है.

 

 

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