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सितंबर में भी स्कूल खुलने की उम्मीद नहीं, 58% पेरेंट्स भी कर रहे इनकार

2020-2021 शून्य शिक्षा वर्ष नहीं होगा, संसदीय समित‍ि की बैठक में ये बात साफ की गई. हालांकि अभी ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया कि स्कूल कॉलेज दोबारा कब शुरू होंगे.वहीं एक हालिया सर्वे में मौजूदा स्थिति में 58% अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के पक्ष में नहीं हैं.

प्रतीकात्मक फोटो प्रतीकात्मक फोटो

कोरोना महामारी की वजह से स्कूली छात्रों की पढ़ाई का बड़ा नुकसान सहना पड़ रहा है. मार्च के तीसरे हफ्ते से ही देश के सभी सरकारी और प्राइवेट स्कूल बंद हैं. हालांकि पिछले कुछ समय से स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेज के जरिए पढ़ाई कराई जा रही है. लेकिन ये व्यवस्था शहरों में बड़े स्कूलों तक ही सीमित है. अधिकतर ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की हर जगह पहुंच न होने की वजह से स्कूली पढ़ाई ठप है.

सोमवार को शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की बैठक हुई. राज्य सभा सांसद विनय सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता में स्थायी समिति की बैठक में स्कूल-कॉलेज खोलने और परीक्षाओं को दोबारा आयोजित कराए जाने जैसे मुद्दों पर विचार हुआ. इसके अलावा इस बात पर भी चिंता जताई गई कि कोरोना महामारी की वजह से स्कूल बंद होने से बच्चों को मिड डे मील नहीं मिल पा रहा. मंत्रालय के अधिकारियों ने समिति को बताया कि अभी स्कूल खोलने की कोई योजना नहीं है. इन अधिकारियों के मुताबिक स्कूल खोलने का फैसला स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाह और सभी राज्यों के फीडबैक के मुताबिक ही लिया जाएगा.

अभी ऑनलाइन व्यवस्था चलती रहेगी

2020-2021 शून्य शिक्षा वर्ष नहीं होगा, बैठक में ये बात साफ की गई. हालांकि अभी ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया कि स्कूल कॉलेज दोबारा कब शुरू होंगे. फिलहाल अभी जो ऑनलाइन क्लासेस की जो व्यवस्था है, वो वैसे ही चलती रहेगी. ये व्यवस्था चौथी क्लास और उससे ऊपर वाले छात्रों के लिए ही है. समिति ने शिक्षा मंत्रालय को सुझाव दिया कि स्कूलों में नर्सरी से तीसरी क्लास तक बच्चों को ऑनलाइन न पढ़ाया जाए. समिति ने यें भी सुझाव दिया कि चौथी से सातवीं क्लास तक के बच्चों को ऑनलाइन क्लासेस में सीमित स्तर पर पढ़ाया जाए. आठवीं क्लास से बारहवीं क्लास के बच्चों को ऑनलाइन क्लासेज के जरिए पूरी पढ़ाई कराई जाए.

समिति के कई सदस्यों ने ऑनलाइन क्लास पर चर्चा के दौरान कहा कि कई बच्चों के पास ऑनलाइन क्लासेज के लिए लैपटॉप और मोबाइल फोन जैसी सुविधाएं नही हैं, ऐसे में गरीब परिवारों को रेडियो-ट्रांजिस्टर देकर कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए.

बच्चों को मिड डे मील न मिलने पर जताई गई चिंता

सूत्रों के मुताबिक समिति के कुछ सदस्यों ने कहा कि कोरोना महामारी के कारण स्कूल बंद होने के कारण कई जगह बच्चों को मिड डे मील के लिए मना कर दिया गया है, इससे उनके कुपोषण के शिकार होने का खतरा बढ़ गया है. शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक राज्य सरकारों से कहा गया है कि बच्चों को खाना देने या उनके परिवार को राशन देने जैसे विकल्पों पर काम किया जाए.

हालांकि शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने संसदीय समिति के सदस्यों को स्पष्ट कर दिया कि अभी कोरोना महामारी के कारण जिस तरह से संक्रमण फैला हुआ है, उसमें अभी स्कूलो को खोलने का फ़ैसला जल्दबाज़ी में नहीं लिया जाएगा. इसके मायने साफ है कि अनलॉक-4 में भी स्कूल खुलने की उम्मीद नहीं के बराबर है. 31 अगस्त के बाद से देश में अनलॉक-4 की शुरुआत हो रही है .

सूत्रों के मुताबिक शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने समिति के सदस्यों को बताया कि ये शैक्षणिक वर्ष कॉलेजों के लिए जीरो एकेडमिक ईयर नहीं होगा. समिति के सदस्यों ने मंत्रालय के अधिकारियों को सुझाव दिया कि कॉलेज के छात्रों को एक क्वश्चन बैंक दिया जाए ताकि उन पर कोई दबाव न पड़े.

58% अभिभावक 1 सितंबर से स्कूल खोलने के पक्ष में नहीं: सर्वे

बता दें कि हालिया एक सर्वे के मुताबिक मौजूदा स्थिति में ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने के पक्ष में नजर नहीं आ रहे हैं. लोकल सर्किल्स की ओर से किए गए सर्वे में अभिभावकों से पूछा गया कि 15 सितंबर से स्कूल खुलते हैं तो उनकी क्या राय है. सर्वे में देश के अलग अलग हिस्सों से 25,000 से अधिक लोगों की प्रतिक्रिया ली गई.

पहले सवाल में पूछा गया कि अगर 1 सितंबर से 10-12वीं और फिर 15 दिन बाद 6-10 क्लासेज के लिए स्कूल खोलने का फैसला लिया जाता है तो आप इसे कैसे लेंगे. इस पर 58% ने असहमति जताते हुए ‘ना’ में जवाब दिया. सिर्फ 33% ने “हां’ में जवाब दिया. 9 प्रतिशत ने कोई स्पष्ट राय व्यक्त नहीं की.

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