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राहत इंदौरी: हॉकी टीम के कप्तान से दिग्गज शायर तक, ऐसा रहा सफरनामा

उर्दू अदब का जहीन शायर, जिनके लहजे की बेबाकी उनकी नज्मों, शेरों और गजलों से झलकती रही. उनका जाना साहित्य जगत में एक कभी न भरने वाला अधूरापन छोड़ गया है. इस शायर की जिंदगी भी उतनी ही शफ्फाक और अलहदा रही है, जैसे कि उनकी रचनाएं.

शायर राहत इंदौरी ने दुनिया को कहा अलविदा शायर राहत इंदौरी ने दुनिया को कहा अलविदा

कवि, गीतकार, शायर राहत इंदौरी मंगलवार को दुनिया को अलविदा कह गए. उनके इंतेकाल की खबर ने पूरे साहित्य जगत को हिलाकर रख दिया है. रोजमर्रा की जिंदगी में श‍ामिल उनके शेर उन्हें लोगों के बीच स्थापित कर गए हैं.

एक जनवरी 1950 को जन्मे राहत इंदाैरी 70 साल के थे. सुबह ही उन्होंने सोशल मीडिया के जरिये बताया था कि वो कोरोना पीड़‍ित हैं. इसके बाद से ही उनके चाहने वाले उनकी खैरियत की दुआएं करने लगे थे, लेकिन हालत गंभीर होने के चलते उनकी जान नहीं बच सकी.

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इंदौर मध्यप्रदेश में जन्मे राहत इंदौरी ने अपने शहर को मानो अपने भीतर ही बसा लिया था. उनके नाम के साथ उनका शहर एक पहचान की तरह जुड़ा रहा. उन्होंने इंदौर के ही नूतन स्कूल से प्राथमिक श‍िक्षा हासिल की थी. इसके बाद इंदौर के इस्लामिया करीमीया कॉलेज (ikdc) और बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्य प्रदेश और भोज विश्वविद्यालय से तालीम हासिल की.

उन्होंने साल 1975 में बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्य प्रदेश से उर्दू साहित्य में परास्नातक करने के बाद वर्ष 1985 में, भोज विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश से उर्दू साहित्य में पीएचडी की उपाध‍ि ली. उनके पिता राफतुल्लाह कुरैशी एक कपड़ा मिल कर्मचारी थे और मां मकबूल उन निशा बेगम गृहणी थीं. राहत इंदौरी तीन भाई-बहन थे.

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स्कूल और कॉलेज के दौरान वह काफी प्रतिभाशाली स्टूडेंट थे, साथ ही वो हॉकी और फुटबॉल टीम के कप्तान भी थे. साल 1973 में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद,अगले दस वर्ष उन्होंने आवारगी में बिताए क्योंकि वो ये तय नहीं कर पा रहे थे कि जीवन में क्या किया जाए. बस पूरा दिन यहां-वहां घूमने और महफिलों में बीत जाता था. इसके बाद अपने दोस्तों से प्रोत्साहित होने के बाद, उन्होंने उर्दू साहित्य में स्नातकोत्तर करने का मन बनाया और जिसे स्वर्ण पदक के साथ उत्तीर्ण किया.

उन्हें देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर में टीचर के तौर पर ज्वाइन करने प्रस्ताव मिला था. चूंकि शिक्षण के लिए पीएचडी की डिग्री अनिवार्य थी, इसलिए उन्होंने उर्दू साहित्य में पीएचडी की और उर्दू साहित्य के प्रोफेसर के रूप में वहां अध्यापन करना शुरू कर दिया. उन्होंने वहां 16 वर्षों तक शिक्षण कार्य किया. इसके बाद उनके मार्गदर्शन में कई छात्रों ने पीएचडी की.

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कविता क्षेत्र में आने से पहले, वह एक चित्रकार बनना चाहते थे और जिसके लिए उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर पेंटिंग करना भी शुरू कर दिया था. इस दौरान वह बॉलीवुड फिल्म के पोस्टर और बैनर को चित्रित करते थे. यही नहीं, वह आज भी पुस्तकों के कवर को डिजाइन करते थे. उनके गीतों को 11 से अधिक ब्लॉकबस्टर बॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल किया गया जिसमें से मुन्ना भाई एमबीबीएस भी एक है. वह अपनी शायरी की नज़्मों को एक खास शैली में प्रस्तुत करके पूरी महफिल में वाहवाही बटोर लेते थे.

आज उनकी मौत के बाद उनकी ही लिखी पंक्त‍ियां याद आ रही हैं, जिसमें उर्दू अदब के इस हरफनमौला शायर ने दुनिया को प्रेरित किया. पढ़ें वो पंक्त‍ियां----

चराग़ों को उछाला जा रहा है

हवा पर रो'ब डाला जा रहा है

न हार अपनी न अपनी जीत होगी

मगर सिक्का उछाला जा रहा है

वो देखो मय-कदे के रास्ते में

कोई अल्लाह-वाला जा रहा है

थे पहले ही कई साँप आस्तीं में

अब इक बिच्छू भी पाला जा रहा है

मिरे झूटे गिलासों की छका कर

बहकतों को सँभाला जा रहा है

हमी बुनियाद का पत्थर हैं लेकिन

हमें घर से निकाला जा रहा है

जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो

मोहब्बत करने वाला जा रहा है

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