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क्या आपके बच्चे भी एक-दूसरे से जलते हैं? क्या आप भी हैं जलनखोर? जानिए इसकी वजहें

आपस में जलने की आदत बहुत बुरी है. लेकिन ये कई बार जानबूझ कर नहीं होती. कहीं न कहीं हमारे मन में ये बात बचपन से भर दी जाती है कि हमें दूसरों से कंपटीशन करना है, यही कंपटीशन पर्सनैलिटी के बहुत से विकार पैदा कर देता है. अगर आप भी दूसरों से जलते हैं तो अपना सकते हैं ये टिप्स...

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प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

दो साल पहले जब कविता ने स्टार्टअप शुरू किया था तो पत‍ि का फुल सपोर्ट था. अब जब उसने पति को बताया कि उसे अवॉर्ड मिलने वाला है तो इंजीनियर पति विवेक का रिएक्शन एकदम अलग सा था. फिर धीरे धीरे कव‍िता को अक्सर फील होने लगा कि उसके पति को हमेशा उसकी सफलता से परेशानी होती है. 

कविता का केस अकेला नहीं है. रिश्तेदार, पड़ोसी, सहकर्मी से लेकर आपस के लोग अक्सर आसपास के लोगों से जलन का श‍िकार हो जाते हैं. इस जलन के चलते न सिर्फ रिश्ते खराब होते हैं, बल्क‍ि कई बार लोग एक दूसरे के नुकसान का सोचने लगते हैं. बात यहीं तक हो तो भी चल जाए, लेकिन वो खुद भी दूसरों को नुकसान पहुंचाने पर उतारू हो जाते हैं. ये भावना कहीं न कहीं जलने वाले व्यक्त‍ि को कुंठ‍ित और उसकी पर्सनैलिटी को भी कमजोर कर देती है. वो अक्सर किसी न किसी ग‍िल्ट से गुजरता है. मनोचिकित्सक आपसी जलन को मनोवैज्ञानिक भाषा में तमाम तरह से डिफाइन करते हैं. 

भोपाल के जाने माने मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि ये जलन या द्वेष किसी दूसरे व्यक्त‍ि के गुण, सफलता या उस पर नियंत्रण पर केंद्र‍ित होता है. अपने आदर्श या आसपास के लोगों से तुलना करना, फिर उसमें समता-विषमता खोजकर उस पर खीझना व्यक्त‍िगत आकलन होता है. यही आकलन आपकी एक सेल्फ इमेज क्र‍िएट कर देता है. व्यक्त‍ित्व की खामियों के कारण ही हम समानता की बजाय विषमता पर ध्यान ज्यादा केंद्र‍ित करते हैं. 

Sibling Rivalry: भाई-बहन के झगड़े में ये वजह है खास

इहबास दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि अक्सर मेरे पास पेरेंट्स आते हैं जो कहते हैं कि उनके बच्चे टीनएज में आपस में इतना झगड़ते हैं कि एक दूसरे के साथ समन्वय में दिक्कत आ रही है. डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि इसे मनोविज्ञान की भाषा में सिबलिंग राइव्लरी (Sibling rivalry) कहा जाता है. डॉ ओमप्रकाश बताते हैं कि आजकल आमतौर पर माता-पिता की तुलना में भाई-बहन बचपन में एक साथ अधिक समय बिताते हैं. सहोदर बंधन अक्सर जटिल होता है और यह माता-पिता द्वारा उनका ट्रीटमेंट कैसे होता है, उनका व्यक्तित्व क्या है और परिवार के बाहर के लोगों और अनुभवों जैसे कारकों से प्रभावित होता है. ये प्रतिद्वंद्विता विशेष रूप से तीव्र होती है जब बच्चे हमउम्र और एक ही जेंडर के होते हैं या जहां एक या दोनों बच्चे बौद्धिक रूप से प्रतिभाशाली होते हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

कौन है जिम्मेदार 

डॉ सत्यकांत कहते हैं कि इस जलन में पूरा जिम्मेदार सामाजिक ताना बाना होता है, जिसमें हमें इंसानियत का दायरा न के बराबर सिखाया जाता है. बचपन से ही हम बच्चों की तुलना शुरू कर देते हैं. पेरेंट‍िंग के जरूरी हिस्सों में ये बात आती है कि अपने बच्चे को कभी किसी से तुलना न करें. वो बताते हैं कि हाल ही में एक ऐसा केस सामने आया जिसमें छोटी बहन ने बड़ी बहन का पूरा असाइनमेंट खराब कर दिया. वो उसे पढ़ने नहीं दे रही थी, मां को हारकर एक बहन को अपने मायके छोड़ना पड़ा. इस केस की काउंसिलिंग में सामने आया कि माता-पिता ही दोनों बच्च‍ियों की तुलना करते थे कि एक पढ़ने में कितनी गंभीर है और दूसरी एकदम आलसी है. 

पेरेंट‍िंग में ये बात ध्यान रखें 

पेरेंट‍िंग का सबसे जरूरी मंत्र है कि हम अपने बच्चे को निस्वार्थ प्रेम करें. उन्हें कभी ये जताते हुए प्रेम न करें कि आज ज्यादा गोरे दिख रहे हो, आज टेस्ट में ज्यादा नंबर आए हैं. ऐसा करते हुए भी किसी बच्चे से तुलना न करें. ध्यान रखें कि कभी आपके बच्चे के मन में ये न आए कि प्यार पाने के लिए मुझे कुछ होना जरूरी है. समाज में तुलना का भाव खत्म हो, बचपन से ही बच्चे के भीतर ईर्ष्या द्वेष न पनपने पाए. 

बच्चों में स्पोर्ट्स स्प्र‍िट भरें.

जैसे खेल में जीत हार होती है, वैसे ही जीवन है. ये भी ध्यान रखें कि कहीं अन्य जगह या किसी अन्य परिवार से ऐसी फीलिंग आ रही हो तो उस पर भी कंट्रोल करें. कभी बच्चे को ये न लगे कि हमको वेलिडेशन तभी मिलेगा जब मैंने कुछ बहुत अच्छा कया. ये भाव धीरे-धीरे अमानवीयता लाने लगता है. 

जलन के ये तीन मनोवैज्ञानिक पहलू 

पैश‍िव एग्रेसन: डॉ सत्यकांत कहते हैं कि द्वेष का दायरा संकुचित होता है और द्वेष का जहर अपने ही झेलते हैं. इसके जरिये कई बार पैश‍िव एग्रेसन आ जाता है. इसमें हम दूसरे माध्यम से गुस्सा निकालना, साजिश रचना, बैक बाइटिंग करना शुरू कर देते हैं.

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

इनफिरियोरिटी कॉम्प्लेक्स: जिन लोगों में खुद को लेकर एक हीन भावना होती है, उनमें भी जलन का भाव बहुत तीव्र होता है. इसके अलावा लोगों के साथ अटैचमेंट होने पर भी हीन भावना से ग्रसित लोग अव‍िश्वास का भाव, जलन और कुंठा रखते हैं, जिससे रिश्ते खराब होते हैं. 

नेगेट‍िव सेल्फ इमेज- मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि आपकी सेल्फ इमेज जितनी पूअर होगी, ईर्श्या की तीव्रता उतनी ही ज्यादा होगी. हम अपने ब्रेन को बचपन से जैसा ट्रीटमेंट मिलता है, वैसे ही आगे भी ट्रेंड कर देते हैं कि हमें आगे रहना है. हर शर्त पर आगे रहना है, इसके लिए चाहे सामने वाले को गिराना पड़ जाए. लेकिन इससे खुद का ही ज्यादा नुकसान होता है. 

जरूरी हैं ये तीन बातें 

1- आप स्वयं पर ध्यान केंद्र‍ित करें, कभी दो लोगों की तुलना हो ही नहीं सकती, क्यों‍कि हर व्यक्त‍ि का ब्रेन और बॉडी सब अलग होता है. आप अपने तरीके से जीने को जिंदगी का फंडा बनाएं. 

2- आप दूसरों के कामों को सराहना सीखें. खुले मन से दूसरों से सीखें,अगर आपसे कोई जलता है तो आप उससे अपना व्यवहार सकारात्मक ही रखें. साथ ही उसके सामने शो ऑफ करने से बचें. कई बार लोग दूसरों को जलाने की प्रवृत्त‍ि के श‍िकार होते हैं. 

3- दूसरों के स्पेस को प्रतिबंध‍ित न करें. जलन की भावना जब र‍िश्तों में आती है तो उसमें बहुत बड़े पर्सनल नुकसान हो जाते हैं. आप कभी भी रिश्तों में दूसरों के स्पेस को न लेने की और न उसे आच्छादित करने का प्रयास करें. खासकर पति-पत्नी या भाई बहन के रिश्ते में कभी एक दूसरे से तुलना करके आगे न बढ़ें, बल्क‍ि सहयोगी के तौर पर हमेशा साथ रहें. 

 

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