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नींद में बड़बड़ाना भी ठीक हो सकता है, जानिए- डॉक्टर कैसे करते हैं इलाज

कुछ लोग नींद के आगोश में जाते ही बड़बड़ाने लगते हैं. बच्चों और बुजुर्गों में खासकर ये समस्या होती है कि वो नींद में तेज आवाज में चिल्लाते हैं. लेकिन बहुत से लोग ये ही नहीं समझते कि ये एक मानसिक समस्या है और इसका इलाज भी किया जा सकता है. आइए जानते हैं कि आख‍िर ये किस वजह से होता है और इसका क्या इलाज है.

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प्रतीकात्मक फोटो प्रतीकात्मक फोटो

अगर आप अपनी डेली रूटीन का सबसे जरूरी हिस्सा यानी अपनी नींद पूरी कर लेते हैं तो बहुत खुशकिस्मत हैं. अच्छी नींद आना आपके शरीर के स्वस्थ होने का संकेत है. वरना दुनिया भर में ऐसे लोगों की तादाद भी बहुत ज्यादा है जो नींद में चलते हैं या खाते हैं. वहीं कुछ लोगों को रात-रात भर नींद नहीं आती. कोई बुरे डरावने सपनों से परेशान रहता है तो कोई रात में बार बार जागकर सोता है. किसी को बैठकर सोना पड़ता है तो कोई घंटों नींद का इंतजार करता है. कोई एक बार सो जाए तो थोड़ी देर में दोबारा नींद खुलने पर उसे नींद नहीं आती. 

नींद से संबंध‍ित समस्याओं में एक समस्या है नींद में बड़बड़ाने-चिल्लाने या नींद में चलने की ये वो समस्याएं हैं जिनसे जूझने वाले व्यक्त‍ि अपने घर में ही अलग थलग पड़ जाते हैं. नींद में अचानक तेज आवाज में बड़बड़ाने के कारण लोग उन्हें घर में भी अलग कर देते हैं. वहीं सोशल लाइफ में भी वो कहीं बाहर जाकर नाइट स्टे नहीं कर सकते. ये अवस्था काफी बुरी होती है. इसके पीछे कई स्वास्थ्य कारकों के साथ कोई ड्रग या पार्किंसन जैसी बीमारी जिम्मेदार होती है. 

भोपाल मध्यप्रदेश के जाने माने मनोरोग चिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि नींद में चलने और खाने की समस्या से ग्रसित लोगों में पैरासोम्न‍िया की समस्या हो सकती है. ये एक बिहैविरल स्लीप एबनॉर्मिलिटी है, जिससे ग्रसित लोग प्राय- ये ही नहीं मानते कि उनको सच में ये समस्या है. क्योंकि सोने के दौरान किए गए उनके आसामान्य व्यवहार उन्हें जागने के बाद याद ही नहीं रहते. कई बार बताए जाने पर ही ये इसे मान पाते हैं. 

इन वजहों से होता है स्लीप डिसऑर्डर पैरासोम्निया
सर गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ राजीव मेहता कहते हैं कि तनाव, चिंता, घबराहट, डिप्रेशन के कारण भी इस तरह के स्लीप डिसऑर्डर पैदा हो सकते हैं. इसके अलावा जिन लोगों को पीटीएसडी (Post-traumatic stress disorder )की समस्या है, उनमें नींद में चलने या बड़बड़ाने के लक्षण दिखाई देते हैं. इसके अलावा कुछ दवाओं का इस्तेमाल और अनिद्रा की समस्या (insomnia)भी खास वजह है, जिससे उनकी नींद हमेशा अधूरी रहती है और मन बेचैन रहता है. जो लोग न्यूरोलॉजिकल कंडीशन (Parkinson’s disease)से जूझ रहे हैं, उनमें भी पैरासोम्निया के सिंप्टम आ जाते हैं. 

स्लीप एप्न‍िया से जुड़ी है ये समस्या 
ResMed में एश‍िया और लेट‍िन अमेरिका के मेडिकल अफेयर्स हेड डॉ सिबाशीष डे का कहना है कि स्लीप एपनिया एक गंभीर और लाइफ थ्रेटनिंग स्थ‍ित‍ि है. कमोबेश स्लीप एपनिया सभी आयु वर्गों या किसी भी जेंडर को हो सकती है, लेकिन ये पुरुषों में अधिक आम है. असल में स्लीप एपनिया एक श्वास संबंधी विकार है जो नींद के दौरान सांस लेने में संक्षिप्त रुकावट को दर्शाता है. 

आपको बता दें कि स्लीप एप्न‍िया के कारण ही अक्सर पैरासोम्न‍िया की समस्या आती है. नींद में बाधा कई तरह की स्लीप एब्नॉर्मलटीज पैदा करती है. स्लीप स्पेशलिस्ट Parasomnia की पहचान के लिए पीड़‍ित व्यक्त‍ि के स्लीपिंग बिहेवियर को समझते हैं. मेडिकल कंडीशन के साथ ही ये पता करते हैं कि आप किन दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके लिए उन लोगों से भी जानकारी ली जाती है जो आसपास रहते हैं या सोते हुए देखते हैं. इसके अलावा Polysomnogram टेस्ट के जरिये भी इसका पता लगाया जाता है. 

समस्या होने पर किसके पास जाएं 
वैसे तो नींद की अनियमितता से जुड़ी ये सभी समस्याएं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हैं. ये मनोचिकित्सा में ट्रीट भी की जाती हैं. लेकिन आज कल स्लीप स्पेशलिस्ट भी अपनी फील्ड में मुखर हुए हैं. डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि पैरासोम्न‍िया का इलाज दवाओं के साथ साथ थेरेपीज से भी किया जाता है. वो कहते हैं कि इसे ट्रीट करने के लिए कॉग्नेटिव बिहेवियरल थेरिपी (Cognitive behavioral therapy) के अलावा कॉग्नेटिव बिहेवियरल थेरिपी, साइकोथेरिपी (psychotherapy), रिलेक्सेशन थेरिपी (relaxation therapy), हिप्नोसिस (hypnosis) आदि से भी इस समस्या का इलाज किया जाता है. ट्रीटमेंट के साथ ही लाइफस्टाइल और नींद की आदतों में भी सुधार की सलाह दी जाती है. 

 

 

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