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'मां बने बिना अधूरी है स्त्री', क्या हर महिला के लिए संतानोत्पति जरूरी है?

क्या एक महिला के लिए मां बनना जरूरी है? क्या मां बनना एक स्त्री के लिए उसके स्त्रीत्व की अनिवार्य शर्त है? अगर कोई महिला मां नहीं बनना चाहती या किसी कारणवश नहीं बन पा रही तो क्या ये ऐसी वजहें हैं जिन्हें लेकर समाज या परिवार उसके प्रति हीनभावना से भर जाए? और क्या मां बनना और समय पर गर्भधारण करना महिला की सेहत से जुड़ा मसला भी है? aajtak.in ने इसे लेकर संबंधित पक्षों से बातचीत की. 

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प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

आज के दौर में ऐसे जोड़ों, खासकर महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, जो बच्चा नहीं चाहतीं. जैसे-जैसे महिलाएं घर की चाहरदिवारी से बाहर निकल अलग-अलग क्षेत्रों में अपना करियर बना रही हैं, ये ट्रेंड जोर पकड़ रहा है. तेजी से बढ़ती आबादी के लिहाज से यह अच्छी बात भी है, हालांकि इसे लेकर सवाल भी हैं.

सवाल ये कि क्या एक महिला के लिए मां बनना जरूरी है? क्या मां बनना एक स्त्री के लिए उसके स्त्रीत्व की अनिवार्य शर्त है? अगर कोई महिला मां नहीं बनना चाहती या किसी कारणवश नहीं बन पा रही तो क्या ये ऐसी वजहें हैं जिन्हें लेकर समाज या परिवार उसके प्रति हीनभावना से भर जाए? और क्या मां बनना और समय पर गर्भधारण करना महिला की सेहत से जुड़ा मसला भी है? aajtak.in ने इसे लेकर संबंधित पक्षों से बातचीत की. 

जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में समाजशास्त्र विभाग की प्रो राज्यलक्ष्मी कहती हैं कि औरतों को समाज से ऐसी ही सोच मिली है. बांझ जैसे शब्द को सामान्य रूप में स्वीकृति मिलने के बजाय ये एक गाली, एक कठोर ताना है. सामाजिक पहलू से देखें तो किसी देश और समाज में ह्यूमन रिसोर्स बढ़ना बहुत महत्वपूर्ण है. इसीलिए महिला की मुख्य जिम्मेदारी बच्चा पैदा करना स्थापित कर दिया गया है.

वो कहती हैं कि महिलाओं को भी इस टैबू से बाहर निकलना चाहिए कि वो किसी भी तरह से मां बनें तभी स्त्रीत्व पूरा होगा. आपका स्त्रीत्व आपके जीवन के दूसरे पहलुओं में भी है, न कि सिर्फ मां बनने पर. अगर किसी लड़की की इच्छा नहीं है कि वो मां बने, उसका करियर है, या वो अलग से अपनी तरह से जीवन व्यतीत करना चाहती हैं तो इसमें उसपर कोई दबाव नहीं बना सकता. ये औरत के लिए कोई नियम नहीं होना चाहिए. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
प्रतीकात्मक फोटो (Getty)

चाइल्ड राइट एक्टिविस्ट सुधा झा कहती हैं कि बच्चों को पाला ही ऐसे जाता है कि पढ़ाई करो, नौकरी करो फिर शादी करो, लेकिन लड़कियों को इसके तुरंत बाद मां बनने का भी प्रेशर आने लगता है. 

AOGD(Association of Obstetricians and Gynecologists of Delhi) की प्रेसीडेंट डॉ अचला बत्रा कहती हैं कि ये सोसायटी का सबसे बड़ा टैबू है कि मां बनना औरत की हेल्थ के लिए बहुत जरूरी है. इस पर कोई स्टडी नहीं है कि मां न बनने वाली औरतें मां बनने वाली महिलाओं से कम हेल्दी होती हैं. अगर कई बार मां न बनने पर दिक्कतें आती हैं तो मां बनने पर भी औरतों में समस्याएं आ सकती हैं. हार्मोनल चेंज और मेंटल हेल्थ की बात करें तो दोनों ही स्थितियों में ये समस्या एक जैसी हो सकती है. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज आगरा की सीनियर गाइनी सर्जन डॉ निधि सिंह कहती हैं कि किसी महिला से 'जरूर प्रेगनेंट हो' ऐसा नहीं कह सकते. लेकिन मां बनने के लिए उनकी काउंसिलिंग फायदे बताकर ही की जाती है. लड़कियों को बताया जाता है कि कैसे बायोलॉजिकली, फिजिकली, इमोशनली और सोशली मां बनना अच्छा है. लेकिन प्रेग्नेंसी होने से आप हर प्रॉब्लम से एकदम दूर हैं, ऐसा तो कहा ही नहीं जा सकता. 

छोटे शहर से दिल्ली रहने आई वनिता (परिवर्तिीत नाम) कहती हैं कि जिस देश की आबादी इतनी ज्यादा है, वहां मां बनना या किसी भी तरह से अपने ही बच्चे की ख्वाहिश करना सही सोच नहीं है. आज मेरी उम्र 37 साल हो रही है. मेरे घर में शादी से ज्यादा इस बात का ताना दिया जाता है कि अरे इतनी उम्र हो गई, शादी नहीं करोगी तो आगे कोई फायदा नहीं होगा. मम्मी तो साफ साफ कह देती हैं कि मां नहीं बन पाओगी,तो जिंदगी के सुख से वंचित रहोगी. ये इस समाज द्वारा घोषित सबसे बड़ा सुख है. माना कि मां होना एक खूबसूरत अहसास है, लेकिन अपने पैरों पर खड़े होना, स्वाभिमान से जीना, दुनिया की सैर करना ये अहसास भी कहां कमतर हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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सोशल एक्टिनविस्ट आरिफा एविस कहती हैं कि हर लड़की मां तो बन जाए लेकिन समाज के तौर पर लोग करियर ओरिएंटेड महिलाओं के साथ प्रेगनेंसी के दौरान कैसे पेश आते हैं ये भी देखा जाना चाहिए. कॉरपोरेट कंपनियां इन मांओं के बारे में कैसे सोचती हैं. वो प्रेगनेंट महिला और पुरुष कर्मचारी में से किसे तवज्जो देती हैं. इसका जवाब कोई भी वो महिला बता देगी जिसके सामने प्रेगनेंसी में जॉब बदलने का संकट आ गया हो. इतना ही नहीं वर्कप्लेस पर नई नई मां बनी कर्मचारियों को एक कम प्रोडक्टिव कर्मचारी के तौर पर देखा जाता है. कुछ वक्त पहले एक बैंक ने अपनी गाइडलाइन में प्रेगनेंसी को टेंपररी अनफिट बताया, वहीं दूसरे बैंक ने तय किया कि जॉब इंटरव्यू के समय अगर औरत प्रेगनेंट है तो उसे वेटिंग लिस्ट में रखें. अब आप ये बताइए कि मां बनने के इस खूबसूरत एहसास के साथ समाज का नजरिया कौन बदलेगा. इसलिए मैं हमेशा कहती हूं कि मां बनने का महिमा मंडन पितृसत्ता की बड़ी साजिश है. लड़‍कियों पर ये अन‍िवार्य शर्त लगाकर उनकी पॉवर को भी सीमित कर देते हैं. 

प्रो वर्षा गुप्ता, राजधानी कॉलेज डीयू में अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं. प्रो वर्षा कहती हैं कि अंग्रेजी साहित्य में ऐसी कई लेखिकाएं हैं जिन्होंने अपनी आर्ट ऑफ राइटिंग को ही अपनी संतान माना. उन्होंने समाज को जवाब दिया कि उन्होंने मां न बनने को अपनी च्वाइस बनाया है. कोई पढ़ी-लिखी और करियर के अच्छे मुकाम पर पहुंची महिला अगर मां न बनना चुनती है तो वो एक या दो बच्चों की परवरिश की जगह हजारों बच्चों को कुछ बेहतर देकर जा रही है. मां बनने के लिए अपना बच्चा पैदा करने का कॉन्सेप्ट भी बहुत गलत है. मां तो आप बच्चा गोद लेकर भी बन सकती हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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सोशल एक्टिविस्ट हुस्न तबस्सुम कहती हैं कि मेरा जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ. मुझे समझाया गया कि लड़की को शादी करना जरूरी है, क्योंकि ये सुन्नत है. मैंने कहा कि आप लोग कुरान को ठीक से पढ़िए, उसमें च्वाइस है कि आप शादी करें या न करें. मुझे हमेशा लगा कि जिसको जानती नहीं, उससे शादी कैसे कर सकती हूं. फिर एक बार बगैर शादी मां बनने की च्वाइस पर आर्टिकल लिखा जो उन औरतों के लिए था कि जो शादी नहीं करना चाहतीं, लेकिन बच्चा चाहती हैं. इस पर काफी लोगों ने ऐतराज भी किया. हम ये सोचते हैं कि बच्चे के लिए शादी को भी जरूरी बनाया गया क्योंकि शादी हो गई फिर बच्चे नहीं हुए तो बच्चों को लेकर प्रेशर दिया जाता है कि बच्चा नहीं होगा तो संपूर्ण नहीं होगी. मुझे हमेशा लगता है कि मां बनने से  औरत की संपूर्णता की परिभाषा पितृसत्ता ने गढ़ी है. जबकि बच्चा पैदा करना न करना औरत की मर्जी पर होना चाहिए. फिर भी उसे धर्म-आध्यात्म, सामाजिक नियम कानून से जोड़कर बहुत टिपिकल बना दिया गया है.

लेकिन, क्या औरतों को बच्चे पैदा करना बंद कर देना चाहिए? इसका जवाब है नहीं, बस थोड़ा सा चेंज लाना चाहिए. हमें ये सोचना समझना होगा कि बच्चा पैदा करना जितना नॉर्मल बात है, इसी तरह से बच्चे न पैदा करना भी कोई बीमारी, लांछन या सोसायटी के ख‍िलाफ जाने जैसा नहीं है. किसी मेडिकल प्रोफेशनल को बच्चे पैदा करने को सेहत अच्छी रखने के तरीके के रूप में ही नहीं बताना चाहिए. ऐसे तो औरत 14 से पचास साल की उम्र तक सिर्फ बच्चे ही पैदा करती रह जाएगी. निश्चित रूप से हम इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं. 

ऐसे भी रह सकते हैं स्वस्थ 

अब सवाल है कि क्या व्यायाम, अच्छी लाइफस्टाइल और योगिक पद्धति शरीर में होने वाले इस उतार-चढ़ाव को सामान्य कर सकती है? तो निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है. अगर कोई औरत इसे अपनाती है तो उसके  लिए अपने शरीर को स्वस्थ और स्थिर रखना आसान हो जाता है. फिर चाहे शरीर में गर्भधारण की वजह से असंतुलन आया हो या गर्भधारण नहीं करने की वजह से आया हो - दोनों ही स्थितियों में इस प्रैक्ट‍िस से संतुलन लाया जा सकता है. 

 

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