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एजुकेशन न्यूज़

World Alzheimer Day 2021: अल्जाइमर होने पर बच्चों की तरह हो जाते हैं बुजुर्ग, ऐसे करें देखभाल

प्रतीकात्मक फोटो (Getty)
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World Alzheimer s Day 2021: बुढ़ापे की तमाम समस्याओं में से एक डिमेंशिया जिसे भूलने की बीमारी भी कहते हैं. इसी का एक हिस्सा है अल्जाइमर रोग, जो कि बढ़ती उम्र के साथ कई बार भूलने के गंभीर लक्षणों के साथ सामने आता है. आज वर्ल्ड अल्जाइमर डे पर एम्स में न्यूरोलॉजी प्रोफेसर व अल्जाइमर सोसायटी ऑफ इंडिया दिल्ली चेप्टर की प्रेसीडेंट प्रो. मंजरी त्रिपाठी समेत दूसरे विशेषज्ञों से इस बीमारी के बारे में जानिए और कैसे अल्जाइमर की समस्या से 35 की उम्र से ही बच सकते हैं. अगर अल्जाइमर हो जाए तो कैसे देखभाल करनी चाहिए. 

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अल्जाइमर रोग का नाम अलोइस अल्जाइमर के नाम पर रखा गया है, उन्होंने ही सबसे पहले इसकी पहचान की. अगर अल्जाइमर के लक्षणों की बात करें तो शुरुआती चरण में इसे छोटी-छोटी चीजें भूलने से पहचाना जा सकता है. कई बार बढ़ती उम्र के साथ छोटी छोटी चीजें भूलना जैसे कि चेक, पैसे, कार की चाभी कहां रखी हैं, दवाएं रखकर भूल जाना, क्या पढ़ते हैं, वो भूलने लगते हैं, शब्द भूलने लगते हैं. मंदिर या रिश्तेदारों के घर के रास्ते भूलने लगते हैं. कैलकुलेशन भूलने लगते हैं. इसके अलावा डिसिजन मेकिंग से लेकर बोलने में दिक्कत आने लगती है. कई बार इसकी वजह से सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं की गंभीर स्थिति हो जाती है. इसकी लास्ट स्टेज में पेशेंट बेड रिडेन हो जाता है.

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न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट, पारस अस्पताल, गुरुग्राम के हेड डॉ रजनीश कुमार कहते हैं कि बचपन का अल्जाइमर एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल दो अलग-अलग बीमारियों के लिए किया जाता है, पहला तब जब बच्चों की याददाश्त कम हो जाती है और दूसरा अन्य लक्षण आमतौर पर अल्जाइमर बीमारी से जुड़े होते हैं. बचपन के अल्जाइमर को 'नीमन-पिक डिजीज टाइप सी (एनपीसी) और सैनफिलिपो सिंड्रोम या म्यूकोपॉलीसेकेराइडोसिस टाइप III (एमपीएस III) कहा जा सकता है.  दोनों बीमारियों को लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर के रूप में जाना जाता है. जब किसी बच्चे को इनमें से कोई एक आनुवंशिक बीमारी होती है तो उसकी कोशिकाओं के लाइसोसोम ठीक से काम नहीं करते हैं. 

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कोशिकाओं के लाइसोसोम शुगर और कोलेस्ट्रॉल को प्रोसेस करने में मदद करते हैं ताकि शरीर उनका उपयोग बेहतर तरीके से कर सके. जब लाइसोसोम ठीक से काम नहीं कर रहे होते हैं, तो ये पोषक तत्व कोशिकाओं के अंदर जमा हो जाते हैं. इससे कोशिकाएं खराब हो जाती हैं और अंत में मर जाती हैं. एनपीसी और एमपीएस III के केसेस में कोशिका की मृत्यु होने पर याददाश्त और मस्तिष्क के अन्य कार्यों को प्रभावित करती है. समय बीतने के साथ यह मस्तिष्क में कनेक्शन में बाधा डालता है और याददाश्त तथा अन्य समस्याओं को उजागर करता है. 

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डॉ मंजरी कहती हैं कि अक्सर 60 वर्ष की उम्र के आसपास होने वाली इस बीमारी का फिलहाल कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन अर्ली स्टेज में अगर इसका पता लग जाए तो इसे बढ़ने से रोका जा सकता है. इससे बचाव का सबसे आसान तरीका यही है कि 35 साल की उम्र से ही हम अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव लाएं. जैसे कि 35 की उम्र के बाद समय समय पर ब्लड प्रेशर चेक करना, मोटापे से बचना, स्मोकिंग या एल्कोहलिक होने से बचाव और डायबिटीज पर चेक रखें. 

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इसके अलावा हमें एक्सरसाइज, योग म्यूजिक, पॉजिट‍िव थ‍िंकिंग, सोशल मीडिया से इतर रियल वर्ल्ड के दोस्तों के साथ मिलना जुलना जारी रखना चाहिए. इसके अलावा अच्छी नींद का भी इसमें बड़ा रोल होता है. हमारी आम जिंदगी में नींद बहुत जरूरी है, जब आप सोना शुरू करते हैं तो वह अवस्था नॉन-आरईएम स्लीप कही जाती है और आप अपने आराम का ज्यादातर वक्त इसी में गुजारते हैं. यह स्लीम दिमाग को हेल्दी रखने में मदद करती है. आजकल लोगों को देर रात तक जागने, सोशल मीडिया, टीवी में वक्त देना बहुत बढ़ा है. यह कई बार धीरे धीरे इंसोमेनिया का रूप ले लेते हैं. इसका अल्जाइमर में बड़ा रोल होता है. हमें समय से सोना बहुत जरूरी है. 

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डॉ मंजरी कहती हैं कि अल्जाइमर को अगर अर्ली स्टेज में ही बढ़ने से रोक दिया जाए तो इससे बचाव हो सकता है. लेकिन ये डिजीज एडवांस होने पर बुजुर्ग दो साल के बच्चे की तरह हो जाते हैं. उनके देखभाल के लिए घर में 24x7 केयर की जरूरत होती है. उन्हें टॉयलेट ट्रेनिंग से लेकर खाना खिलाने तक बच्चे की तरह ही डील करना होता है. ऐसे हाल में दिनभर उन्हें देखरेख चाहिए. न्यूक्ल‍ियर फैमिली में ऐसे बुजुर्गों की देखभाल काफी मुश्क‍िल हो जाती है. उन्हें शुरुआती दौर से ही अगर म्यूजिक थेरेपी, पेट थेरेपी, फिश पॉट, गार्डेनिंग और सामान्य इनडोर गेम में बिजी रखा जाए तो काफी फायदेमंद होता है. 

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प्रो. मंजरी का कहना है कि डिमेंश‍िया पेशेंट के लिए बेस्ट डायट इंडियन डायट मानी जाती है. इंडियन डायट में रोटी दाल सब्जी और सलाद, खीरा, अंकुरित दालें शामिल होती हैं जोकि ब्रेन के लिए बहुत अच्छी मानी जाती हैं. डिमेंश‍िया पेशेंट को  रेड मीट से बचना चाहिए. उनके लिए ब्रोकोली बहुत अच्छी होती है. इसके अलावा हेल्दी आयल्स  जैसे कि वेजिटेब‍िल आयल मस्टर्ड, ऑलिव आयल आदि देना चाहिए. उन्हें जंक फूड से बचना चाहिए खासकर मैदा की चीजें नहीं देनी चाहिए ये ब्रेन के लिए टॉक्स‍िक का काम करती हैं. उन्हें शुगर भी नहीं देना चाहिए. देखा जाए तो बचपन से ही इस तरह की डायट की आदत डालनी चाहिए. 

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ये लक्षण अध‍िक होने पर डॉक्टर से करें परामर्श 
याददाश्त में कमी
सामान्य कामकाज में कठिनाई
जरूरत की चीजों और लोगों के नाम भूलना 
निर्णय लेने में कठिनाई या गलत निर्णय लेना 
चीजों को रखकर हमेशा भूल जाना
मूड-स्वभाव या पूरे व्यक्तित्व में बदलाव
बहुत अधिक सोना और काम में अन‍िच्छा 

यदि आप खुद में या अपने किसी परिजन में लगातार इस तरह के बदलाव देखें तो उन्हें डॉक्टर से मिलना चाहिए.