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एजुकेशन न्यूज़

पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन: पहली बार पेरेंट्स बनने जा रहे हैं तो इसके बारे में जरूर जानना चाहिए

Representational Image (Getty)
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मां बनकर एक नई ज‍िन्‍दगी को दुनिया में लाना क‍िसी वरदान से कम नहीं है. लेकिन, ये वरदान कई बार मां के लिए अभ‍िशाप भी बन जाता है, अगर डिलीवरी के तुरंत बाद उसे घर-परिवार और डॉक्‍टर से सही गाइडेंस न म‍िले. जन्म देने के बाद महिलाओं में पोस्‍टपार्टम ब्‍लूज एक आम बात है, इससे तकरीबन 75 प्रतिशत मां ग्रसित हो जाती हैं, लेकिन जब यही ब्‍लूज खतरनाक डिप्रेशन का रूप ले ले तो ऐसे में डॉक्‍टरी इलाज बहुत जरूरी हो जाता है. आइए जानें- पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन के बारे में, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है.

प्रोफेेेेसर डॉ न‍िध‍ि गुप्‍ता, आगरा मेड‍िकल कॉलेज
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सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज आगरा में स्‍त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ प्रो. डॉ. निध‍ि गुप्‍ता पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन पर लंबे समय से काम कर रही हैं. उन्‍होंने इस डिप्रेशन पर कई पेपर भी लिखे हैं. aajtak.in से बातचीत में उन्‍होंने कहा क‍ि भारत में इस पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन पर बहुत ज्‍यादा चर्चा नहीं होती है. न ही ये प्रेग्‍नेंसी के दौरान ही काउंसिलिंग में शाम‍िल रहा है. लेकिन समाज जैसे जैसे आधुनिकता की ओर बढ़ा है, अब बिल्‍कुल सही समय है क‍ि लोगों को इस समस्‍या की तरफ जागरूक क‍िया जाए. 

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पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन का बेसिक कारण बताते हुए डॉ निध‍ि कहती हैं कि प्रेग्‍नेंसी के दौरान एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रोन, टेस्टोस्टेरोन जैसे हैप्‍पी हार्मोन्स बनते हैं. फिर प्रसव के बाद महिलाओं के हार्मोन्स में बदलाव होते हैं. इन हार्मोंस का स्‍तर एकदम नीचे आ जाता है. इसके अलावा शारीरिक बदलाव भी एक तरह की मानसिक समस्‍या पैदा करते हैं, इसे पोस्‍टपार्टम ब्‍लूज कहते हैं.

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IHBAS (Institute of Human Behaviour and Allied Sciences) के मनोचिकित्सक डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि पोस्‍टपार्टम साइक्रेटिक डिसऑर्डर को तीन श्रेण‍ियों में बांट सकते हैं. इसमें पहला पोस्‍टपार्टम ब्‍लूज, दूसरा पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन और तीसरी अवस्‍था पोस्‍टपार्टम साइकोसिस की होती है. पूरी दुनिया में 1000 मां में से 300‒750 पोस्‍टपार्टम ब्‍लूज का श‍िकार होती हैं. लेकिन ज्‍यादातर तकरीबन एक सप्ताह में नॉर्मल हो जाता है. लेकिन अगर ये आगे बढ़ता है तो ये पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन का रूप ले लेता है, लेकिन इसकी सबसे कठ‍िन स्‍थिति साइकोसिस की होती है. 

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डॉ ओमप्रकाश कहते हैं क‍ि इसमें सबसे कठ‍िन स्‍थि‍ति पोस्टपार्टम साइकोसिस की होती है. इसमें वैश्विक तौर पर 0.89 से 2.6 प्रति 1000 जन्म में ये आंकड़ा है. ये एक गंभीर विकार है जो चार सप्ताह के प्रसव के बाद शुरू होता है. इसके सिंप्‍टम इतने खतरनाक होते हैं कि मां खुद को या बच्‍चे को भी हानि पहुंचा सकती है. 

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डॉ निध‍ि के मुताबिक प्रसव के बाद इस तरह की समस्‍याएं लेकर कई मरीज आते हैं. अगर देखा जाए तो इस तरह के मामले सबसे पहले स्‍त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ के पास ही आते हैं. हम उनके लक्षणों के आधार पर ही निदान करते हैं. उससे बात करके ही तय होता है कि मरीज काउंसिलिंग से ठीक होगा या दवाओं से या फिर उसे मनोचिकित्‍सक की जरूरत है.

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कैसे पहचानते हैं लक्षण
डॉ निध‍ि बताती हैं कि पोस्‍टपार्टम डिप्रेशन की श‍िकार हर मां में अलग अलग लक्षण होते हैं. कुछ महिलाएं डिप्रेशन के दौरान बहुत वायलेंट, गुस्‍सैल और चिड़चिड़ी हो जाती हैं, वो सामान को तोड़ना, फेंकना और चिल्‍लाना जैसे काम करती हैं. इस प्रकार के लक्षण आने पर कई बार मां अपने बच्‍चों को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं.

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वहीं दूसरे प्रकार में महिलाएं बेहद शांत और उदास-अनमनी सी रहती हैं. उनमें खाना-पीना छोड़कर अकेले रहना और रोना आदि लक्षण द‍िखाई देते हैं. ऐसे में उनमें सुसाइडल टेंडेंसी भी आ जाती है, जिससे वो खुद को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं. 

 

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डॉ निध‍ि का कहना है कि इस तरह के मरीजों को तत्‍काल मनोचिकित्‍सा की जरूरत होती है. लेकिन इसके अलावा जिन महिलाओं में साइकोसिस के सिंप्‍टम्‍स जैसे इल्‍यूजन, भ्रम, तमाम शंकाएं जैसे लक्षण होते हैं. उनको मनोचिकित्‍सक तत्‍काल भर्ती करने की सलाह देते हैं. ऐसी महिलाओं से कई बार क्राइम भी हो सकते हैं. डॉ ओमप्रकाश कहते हैं क‍ि कई बार लोग इसे भूत प्रेत या बाधा से जोड़कर देखते हैं और इलाज नहीं कराते. इसमें मां अपने बच्‍चे को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. 

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डॉ निध‍ि कहती हैं क‍ि पोस्‍टपार्टम डिसऑडर्स की समस्‍या एक‍ल परिवारों के चलन के बाद और भी बढ़ी है. जिन परिवारों में पहले घर में मां-सास या बहनें वगैरह होती थीं, वहां प्रसूताओं को अच्‍छी केयर मिल जाती थी. आजकल एकल परिवारों में सारा प्रेशर जन्म देने वाली मां पर ही आ जाता है. इससे उनका पोषण, नींद और जीवनशैली पूरी तरह प्रभावित हो जाती है. 

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डॉ न‍िध‍ि इन ब्‍लूज और डिप्रेशन से बचाव के लिए महिलाओं की प्रसव पूर्व काउंसिलिंग और परिवार की तैयारी को बहुत जरूरी बताती हैं. वो कहती हैं क‍ि भारतीय समाज में जेंडर को लेकर भी प्रसूताओं पर प्रेशर डाला जाता है, खासकर लड़का होने का दबाव भी इसका कारक बन सकता है. इसलिए जरूरी है कि‍ परिवार के लोग सहयोगी के तौर पर मां का साथ दें और उसे ऐसे किसी भी प्रेशर से बाहर निकालें. 

 

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इसके अलावा अगर आप एकल परिवार में रहते हैं तो बच्‍चे के आने से पहले ही मानसिक रूप से तैयार होने के साथ साथ अपने आसपास के माहौल को भी तैयार करें. मसलन आपके परिवार से कौन आकर रह सकता है या अगर कोई नहीं आ सकता है तो 24 घंटे की हेल्‍प आपको कैसे मिल सकती है. क्‍योंकि प्रसव के बाद मां को बहुत ज्‍यादा केयर, नींद, पोषक भोजन और सकारात्‍मक माहौल की जरूरत होती है ताकि वो खुद को फिर से फिट कर सके.