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करियर

जानिए- अटॉर्नी, सॉलिसिटर व एडवोकेट जनरल में क्‍या अंतर होता है, किसान आंदोलन में क्‍यों आया जिक्र

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नए कृषि कानूनों के बचाव में भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल, दोनों ही सुप्रीम कोर्ट के आगे दलीलें रख रहे थे. हालांकि इसका कोई बड़ा असर नहीं पड़ा. जानिए- भारतीय कानून व्‍यवस्‍था में अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल, एडवोकेट जनरल, बैरिस्‍टर सहित तमाम पदों की भूमिका, कैसे होती है इनकी नियुक्‍त‍ि.

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बता दें कि‍ सरकार ने अपने शीर्ष कानूनी सलाहकारों को भेजा था, लेकिन अदालत में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के तर्क काम नहीं कर सके. सबसे पहले जानते हैं भारत के अटॉर्नी जनरल के बारे में जो भारत सरकार का प्रमुख कानूनी सलाहकार होता है. अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया (AGI) की नियुक्ति केंद्रीय कैबिनेट की सलाह पर राष्‍ट्रपति इनकी नियुक्ति करते हैं. संविधान के अनुच्‍छेद 76(1) में अटॉर्नी जनरल के रोल की व्‍याख्या है. 

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देश के सर्वोच्च कानून अधिकारी अटॉर्नी जनरल में मुख्‍य योग्‍यता उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के बराबर होनी चाहिए. वो भारत का नागरिक हो, उसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में काम करने का पांच वर्षों का अनुभव हो या किसी उच्च न्यायालय में वकालत का 10 वर्षों का अनुभव हो.

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देश के दूसरे नंबर का कानूनी अधिकारी सॉलिस‍िटर जनरल होता है, जो अटॉर्नी जनरल की सहायता करता है. बता दें कि‍ सॉलिसिटर जनरल को चार अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सहायता देते हैं. योग्‍यता की बात करें तो अटॉर्नी जनरल की तरह, सॉलिसिटर जनरल की योग्‍यता के भी मानक तय हैं.

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सॉलिसिटर विधि अधिकारियों (नियम और शर्तें) नियम, 1972 के संदर्भ में भारत में सॉलिसिटर जनरल सरकार को सलाह देते हैं और उनकी ओर से पेश होते हैं. सॉलिसिटर जनरल की नियुक्‍त‍ि कैबिनेट समिति सॉलिसिटर जनरल की नियुक्ति करती है.

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कौन होते हैं एडवोकेट जनरल
एडवोकेट जनरल यानी महाधिवक्ता राज्य प्रमुख को विधि संबंधी सलाह देने का कार्य करता है. वो राज्य के दोनों सदनों ( विधानसभा तथा विधान परिषद ) की कार्यवाही में और सदन में बोलने की शक्ति रखता है.

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LLB यानी Legum Baccalaures (लैटिन भाषा) यानी  अंग्रेजी में बैचलर ऑफ लॉ की पढ़ाई करने वाले स्‍टूडेंट वकील यानी लॉयर बनते हैं. इसमें कानून की बारीकी का अध्‍ययन कराया जाता है. वकील न्‍यायालय में किसी कानूनी मामले की पैरवी नहीं करते हैं. उसके पास कोर्ट में केस को लड़ने की अनुमति नहीं होती है. लेकिन जैसे ही उसको Bar Council of India (BCI) से सनद मिलती है यानी वो BCI की परीक्षा को पास कर लेता है तो किसी भी कोर्ट में खड़े होने के लिए अधिकृत हो जाता है तब वह एडवोकेट बन जाता है.