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मोहब्बत का जुनूनः पाक की जेल में बिताए 2 हजार 232 दिन

जेल की सख्त दीवारों के पीछे छह साल गुजारने के बाद भी हामिद को ये पता नहीं है कि जिसके लिए उसने सरहद के लकीरें तोड़ीं सचमुच उसकी वो मोहब्बत पाकिस्तान में थी भी या नहीं. पर मोहब्बत के उन अहसासों से वो आज भी उतनी ही मोहब्बत करता है.

हामिद को पाकिस्तान की जेल में बुरी तरह से टॉर्चर किया गया हामिद को पाकिस्तान की जेल में बुरी तरह से टॉर्चर किया गया

नफरत की बुनियाद पर खींची गई हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरहद की लकीरों के इस पार और उस पार अब भी मोहब्बत के फूल खिलते हैं. मगर मोहब्बत से नफरत करने वालों को ये ना तब गवारा था और ना अब गवारा है. इसीलिए वो आशिक को भी जासूस का चोला पहना देते हैं. मुंबई के एक नौजवान को इंटरनेट पर चैटिंग के दौरान एक लड़की से प्यार हो जाता है. बाद में पता चलता है कि लड़की पाकिस्तानी है. वीज़ा मिलता नहीं तो लड़का बिना वीजा के ही अफगानिस्तान के रास्ते पाकिस्तान पहुंच जाता है. मगर पाकिस्तान की सरज़मीन पर अभी उसने कदम रखा ही था कि फिर कब वो आशिक से जासूस बना दिया गया खुद उसे भी पता नहीं चला.

एक आवाज़ सरहद के उस पार की थी और एक आवाज़ सरहद के इस पार की. दोनों ने प्यार से एक दूसरे को आवाज़ दी तो दिलों की सरहदों की तमाम लकीरें मिट गई. प्यार कब होता है. क्यों होता है. कैसे होता है. कहां होता है. किसी को नहीं मालूम. फिर ये सरहदों को कहां मानने वाला था. नहीं माना. और बस यहीं प्यार खता कर बैठा. कमबख्त, वो दिल और मुल्क की सरहद को एक मान बैठा. अंजाम ये हुआ कि उसकी जिंदगी के बेशकीमती छह साल उससे छीन लिए गए.

अगर किसी की मोहबब्त किसी की तोहमत बना दी जाए. किसी के प्यार में पड़ जाने वाले किसी आशिक को जासूस करार दे दिया जाए. और फिर पूरे छह साल तक वो आशिक की बजाए भारतीय खुफिया एजेंसी के एजेंट के तौर पर जेल की सलाखों के पीछे कैद रहे. तो वो क्या उसका पूरा खानदान मोहब्बत से तौबा कर लेगा. मुंबई के हामिद अंसारी की कहानी बस यही है. कहानी उन छह सालों की जो बिना किसी कुसूर के उसने पाकिस्तान की जेल की चारदीवारी में काटे.

मुंबई. ख्वाबों का शहर. जी हां, हामिद अंसारी की कहानी ख्वाबों की नगरी इसी मुंबई से से शुरु होती है. पर हामिद की जिंदगी में तब तक ऐसा कुछ भी खास नहीं था. मुंबई के एक कालेज की वाइस प्रिंसिपल फौजिया और बैंकर निहाल अंसारी का सबसे छोटा बेटा हामिद तब 33 साल का था. एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में तब उसने नई-नई लेक्चरर की नौकरी ज्वाइन की थी. सब कुछ ठीक चल रहा था. पर तभी 2012 के शुरूआत में सोशल मीडिया के ज़रिए एक लड़की हामिद के दिल मे दस्तक देती है. बेतार इंटरनेट की मदद से दोनों के दिलों के तार धीरे-धीरे जुड़ते-जुड़ते जाते हैं.

मगर फिर एक रोज़ अचानक पता चलता है कि हामिद अनजाने में ही वीर-ज़ारा की कहानी का हिस्सा बन गया है. क्योंकि जिस लड़की ने हामिद के दिल पर दस्तक दी थी वो पाकिस्तानी थी. पाकिस्तान के उस खैबर पख्तूनखा इलाके की रहने वाली जो पूरे पाकिस्तान में ऑनर किलिंग के लिए सबसे ज्यादा बदनाम है. मगर दिल तो दिल है. सरहदों को कहां मानता. फिर भले ही वो सरहद पाकिस्तान की हो.

लिहाज़ा सरहदें भुला कर हामिद ने अपनी मोहब्बत की हद आजमाने की ठान ली. 2012 में उसने मुंबई के एक वकील से मदद मांगी. कहा किसी तरह पाकिस्तानी वीज़ा दिला दें. वकील ने हामिद की कहानी सुनी और हंस कर उसे टाल दिया. कहा जा कर करियर की सोचो. पाकिस्तान जाकर वो भी खैबरपख्तूनखा पहुंच कर अपनी मोहब्बत को हासिल करना नामुमकिन है. भूल जाओ उसे.

पर हामिद कहां मानने वाला था. दिल ज़िद पर अड़ा था. लिहाज़ा दिल के हाथों मजबूर होकर हामिद ने उसी बेतार से मदद लेने का फैसला किया. इंटरनेट के ज़रिए उसने पाकिस्तान में खास कर खैबरपख्तूनखा में उन लोगों को ढूंढना शुरू किया जिनकी मदद से वो अपनी मोहब्बत तक पहुंच सकता था. काफी कोशिशें की, पर यहां भी मासूसी ही हाथ लगी.

वीज़ा पहले ही मना हो चुका था. लिहाज़ा अब हामिद को पास सिर्फ एक ही रास्ता बचा था और वो था सरहद की लकीर को लांघ कर पाकिस्तान पहुंचना और अपनी ज़ारा को हिंदुस्तान लाना. हामिद फैसला कर चुका था. मगर उसे ये भी पता था कि घर वाले किसी भी कीमत पर उसे पाकिस्तान जाने नहीं देंगे. वो भी बिना वीज़ा के और वीज़ा मिल नहीं रहा था. लिहाज़ा नवंबर 2012 में एक दिन अचानक हामिद घर वालों को ख़बर देता है. खबर ये कि एक एयरलाइन कंपनी में नौकरी का ऑफर है, मगर इसके लिए उसे अफगानिस्तान जाना होगा.

हामिद ने पाकिस्तान जाने के लिए गलत रास्ता अख्तियार करने से पहले पूरे दस महीने तक ईमानदारी से कोशिश की थी कि उसे पाकिस्तान का वीजा मिल जाए. और वो कानूनी तरीके से अपनी मोहब्बत को हिंदुस्तान ले आए. मगर इधर वीजा नहीं मिल रहा था और उधर पाकिस्तान से अचानक एक खबर आती है. वो खबर सुन कर हामिद बेचैन हो उठता है. मगर उसे मालूम नहीं था कि ये खबर दरअसल उसके लिए एक जाल थी.

आखिरी वक्त तक हामिद कानूनी तरीके से ही पाकिस्तान जाना चाहता था. इसीलिए उसने पाकिस्तानी हाई कमीशन से वीजा लेने की लगातार कोशिश की थी. मगर इसी बीच हुआ ये कि अचानक पाकिस्तान से उसे खबर आई कि जिस लड़की के साथ उसके जज़्बात जुड़े हैं, उसकी शादी ज़बरदस्ती कहीं और की जा रही है. यहां तक कि उस लड़की ने खुद हामिद से मदद मांगी.

खबर सुन कर हामिद परेशान हो उठा. इसी बीच पाकिस्तान से उसे कुछ लोग लगातार ये कह कर उकसाने लगे कि तुम क्या कर रहे हो. लड़की की शादी हो जाएगी. जल्दी आ जाओ. और उन्हीं लोगों में से एक ने हामिद को अफगानिस्तान के रास्ते पाकिस्तान आने का आइडिया दिया.

4 नवंबर 2012

मुंबई के वर्सोवा से निकलकर हामिद ने फ्लाइट पकड़ी और काबुल पहुंच गया. बिना इस बात की परवाह किए कि वो जो करने जा रहा है वो उसकी ज़िंदगी को ऐसे काले अंधेरे में झोंक देगा, जहां से निकलना आसान नहीं होगा. ऊपर से हामिद उस लड़की के बारे में जानता भी क्या था. बस यही कि वो पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के एक गांव में रहती है. हामिद उन अनजान लोगों के कहने पर काबुल पहंच चुका था. इसके बाद अफगानिस्तान के कबायली इलाकों के रास्ते गैरकानूनी तरीके से वो पाकिस्तान पहुंच गया. उन लोगों ने हामिद को पाकिस्तान का जाली आईडी कार्ड भी दे दिया.

पाकिस्तान में दाखिल होते ही बाद में उन्हीं लोगों ने हामिद की मुखबरी कर दी और पाकिस्तानी एजेंसी ने सरहदी इलाके में ही फर्ज़ी आईडी के साथ हामिद को गिरफ्तार कर लिया. अब चूंकि हामिद एक हिंदुस्तानी था. और उनके पास से फर्ज़ी दस्तावेज़ भी मिले थे. लिहाज़ा पाकिस्तानी एजेंसी ने उसें भारतीय जासूस करार देकर उसे जेल में डाल दिया.

इधर, अफगानिस्तान जाने के शुरूआती कुछ दिनों तक तो हामिद का फोन उसके मां-बाप को आता रहा. मगर फिर अचानक उसका फोन आना बंद हो गया. इसके बाद मां-बाप ने हामिद की तलाश शुरू की. सोशल मीडिया खंगाल डाला. फेसबुक अकाउंट चेक किया. ई-मेल देखे, तब कहीं जाकर घर वालों को पता चला कि हामिद एक पाकिस्तानी लड़की से चै‍टिंग करता था और दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे. इसके बाद एक पत्रकार की मेहनत और भारत सरकार और घर वालों की कोशिशों से पता चला कि हामिद पाकिस्तान की जेल में जासूसी के इल्जाम में बंद है.

हामिद की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान की मिलिट्री कोर्ट ने जासूसी के इल्जाम में हामिद को तीन साल की सज़ा सुनाई थी. तीन साल वो बिना सज़ा के ही वहां कैद था और आखिर में रिहा होने के बाद छह साल बाद वो वापस हिंदुस्तान अपने घर लौटा. मगर इस कसक के साथ कि जिसके लिए वो सरहद पार गया था, उसकी एक झलक तक वो नहीं देख पाया.

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