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श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर SC में याचिका, अधिकारों का उल्लंघन बताया

लॉकडाउन की वजह से तीन राज्यों की ओर से औद्योगिक इकाइयों को श्रम कल्याण कानूनों में ढील दिए जाने को लेकर खासी नाराजगी है. इस बदलाव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है. याचिका में कहा गया है कि यह श्रमिकों के अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट

  • तीन राज्यों के फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल
  • श्रमिकों के अधिकारों का साफ उल्लंघन बताया

  • यूपी सरकार ने अध्यादेश के जरिए कानून में दी छूट

कोरोना संकट और लॉकडाउन की वजह से देश में ज्यादातर उद्योग धंधे पूरी तरह से बंद हैं. इस बीच उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश में राज्य सरकार की ओर से औद्योगिक क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने के मद्देनजर श्रम कानूनों में ढील दी गई है, अब इन फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में केस पहुंच गया है.

तीन राज्यों की ओर से औद्योगिक इकाइयों को श्रम कल्याण कानूनों में ढील दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है. याचिका में कहा गया है कि यह श्रमिकों के अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है. कानून के बिना कार्यकारी आदेश के जरिए श्रम कानूनों को बदल नहीं सकते.

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कोरोना संकट से तबाह हुए अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की कोशिशों में गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में श्रम कल्याण कानूनों से औद्योगिक इकाइयों को छूट देने का फैसला लिया गया ताकि कोरोना महामारी के मद्देनजर आर्थिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने के लिए अन्य चीजों के साथ काम के घंटे बढ़ाने जैसे कई कदम उठाने की अनुमति दी जा सके.

यूपी में 3 साल के लिए श्रम कानून निलंबित

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पिछले दिनों प्रमुख श्रमिक कानूनों को शिथिल कर दिया. राज्य सरकार ने एक ऐसे अध्यादेश को मंजूरी दी जो प्रमुख श्रम कानूनों से छूट देता है और यह छूट 3 साल के लिए प्रभावी होगी.

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में पिछले दिनों हुई बैठक में कैबिनेट ने इसे मंजूरी दे दी. श्रमिक संघों से संबंधित सभी महत्वपूर्ण कानून, काम के विवादों को निपटाने, काम करने की स्थिति, अनुबंध आदि को मौजूदा और नए कारखानों के लिए तीन साल तक निलंबित रखा जाएगा.

मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कहा गया कि लॉकडाउन के कारण उत्तर प्रदेश में औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियां बहुत ज्यादा प्रभावित हुई हैं. लंबे समय तक सभी उद्योग बंद रहे. ऐसे में औद्योगिक क्षेत्र की ग्रोथ को प्रोत्साहित करना बहुत महत्वपूर्ण है. नया अध्यादेश मौजूदा उद्योगों, विनिर्माण इकाइयों और नई फर्मों पर भी लागू होगा.

यूपी में कुछ श्रम कानूनों को छूट

हालांकि, योगी सरकार ने कुछ श्रम कानूनों को इस अध्यादेश की परिधि से बाहर रखा है. इनमें बॉन्डेड लेबर सिस्टम (उन्मूलन) अधिनियम 1976, कर्मचारी मुआवजा अधिनियम 1923, भवन और अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम 1996 के तहत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के उपाय और मजदूरी का समय पर भुगतान सुनिश्चित करने संबंधी मजदूरी अधिनियम 1936 अपने मूल स्वरूप में ही लागू रहेंगे.

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कर्मचारी मुआवजा अधिनियम में काम के दौरान किसी तरह की दुर्घटना का शिकार होकर दिव्यांग होने की स्थिति में मुआवजे का प्रावधान करता है.

उत्तर प्रदेश की तरह मध्य प्रदेश और गुजरात में श्रम कानूनों में कई तरह की ढील दी गई है, जिसकी विपक्ष की ओर से लगातार आलोचना की जा रही है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस श्रम कानूनों के लेकर लगातार यूपी की योगी सरकार पर निशाना साध रही है.

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एमपी में बढ़ा काम का समय

उत्तर प्रदेश योगी सरकार की तरह मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने भी श्रम कानून में संशोधन कर कई बदलाव करते हुए कारखानों में काम करने की शिफ्ट अब 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे की कर दी.

साथ ही कारखानों, दुकानों, ठेकेदारों, बीड़ी निर्माताओं, मोटर परिवहन कर्मकार, मध्य प्रदेश भवन तथा अन्य संनिर्माण कर्मकार अधिनियम में आने वाली निर्माण एजेंसियों का पंजीयन और लाइसेंस भी अब एक दिन में ही मिल सकेगा. कारखाना लाइसेंस नवीनीकरण अब एक साल की बजाय 10 साल पर कराया जा सकेगा.

सरकार की ओर से किए गए इस संशोधन के तहत कारखाने 3 माह के लिए फैक्ट्री इंस्पेक्टर के निरीक्षण से मुक्त होंगी. फैक्ट्री खुद चुने गए थर्ड पार्टी निरीक्षक से कारखाने का निरीक्षण करवा सकेंगी.

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