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बच्चों से डरने वाला और बड़ों पर कातिलाना हमला करने वाला कोरोना हुआ डिकोड

कोविड के दौर में ही मल्टी-सिस्टम इनफ्लेमेट्री सिंड्रोम ऑफ चाइल्ड की रहस्यमय बीमारी ने अमेरिका और यूरोप खासकर ब्रिटेन को अपनी चपेट में ले लिया है. हालांकि भारत देश में ऐसा केस नहीं सामने आया है.

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सांकेतिक तस्वीर (पीटीआई)
सांकेतिक तस्वीर (पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • भारत में नहीं आया मल्टी-सिस्टम इनफ्लेमेट्री सिंड्रोम ऑफ चाइल्ड
  • रहस्यमय सिंड्रोम ने अमेरिका और यूरोप में तबाही मचाई
  • गेट या रिसेप्टर की वजह बच्चों में कोरोना का असर कम होता है

एक वक्त के बाद कोरोना वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है. हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि 10 साल से कम उम्र के बच्चों पर कोरोना वायरस का असर बहुत हल्का ही होता है. गहरा असर होने की अवस्था को मल्टी-सिस्टम इनफ्लेमेट्री सिंड्रोम ऑफ चाइल्ड कहते हैं जो कि बहुत रेयर है.

कोविड के दौर में ही मल्टी-सिस्टम इनफ्लेमेट्री सिंड्रोम ऑफ चाइल्ड की रहस्यमय बीमारी ने अमेरिका और यूरोप खासकर ब्रिटेन को अपनी चपेट में ले लिया है. हालांकि भारत देश में ऐसा केस नहीं सामने आया है.

इनफेक्शियस डिजीज स्पेशलिस्ट और एम्स में इंफेक्सियस डिजीज में डीएम डॉक्टर जतिन आहूजा ने बताया कि बच्चों पर कोरोना वायरस का प्रभाव पड़ता तो है, लेकिन बहुत कम. इसकी कई वजहें हैं. जिस गेट या रिसेप्टर से कोरोना फेफड़ों में प्रवेश करता है, वो गेट बच्चों में बहुत कम होता है. इस गेट को एंजियोटेनसिन कनवर्टिग एनजाइम (ACE2) कहते हैं.

ये गेट उम्र बढ़ने के साथ ही बढ़ता है. जाहिर सी बात है ACE2 वाला गेट बच्चों के फेफड़ों में ना के बराबर होगा तो कोरोना वायरस कम अटैच होगा और इनफेक्शन भी कम ही होगा.

इसका उल्टा भी उतना ही सही है कि बड़ों में ACE2 वाला गेट ज्यादा होने से बड़ों पर कातिलाना हमला करेगा. दूसरी बड़ी वजह बच्चों में टाइप 2 हेल्पर सेल (TH2)  होते हैं जिनकी इम्यूनिटी हाई होती है जो किसी भी जलन या सूजन से लड़कर उसे खत्म कर देती है. इन TH2 कोशिकाओं से टी-सेलों में इंटरल्यूकिन 10 का उच्च स्तर होता है. इंटरल्यूकिन फेफड़ों को इम्यूनिटी भी देते हैं. इसे ह्यूमन साइटोकिन सिनथेसिस भी कहा जाता है.  

कोविड मरीजों पर हुए शोध से पता लगा है कि मरीजों में टी-सेल की तादाद काफी कम हो जाती है. ऐसे में वायरस से लड़ने की क्षमता भी घट जाती है. डॉ. जतिन आहूजा कहते हैं कि सबसे बड़ी बात ये है कि बच्चो में नॉर्मल फ्लू अक्सर होता है, इसकी वजह से बनने वाली एंटी बॉडी क्रॉस प्रोटेक्टिव इम्युनिटी का काम करते हुए बच्चों को कोरोना वायरस से बचाती है.
 
द लैंसेट चाइल्ड एंड एडोलसेंट हेल्थ जर्नल की एक रिसर्च के हवाले से बताया गया है कि नए जन्में और 18 साल तक के बीच की उम्र वाले करीब 65 प्रतिशत बच्चे भले ही अस्पतालों में भर्ती हुए हो लेकिन 10 में से सिर्फ एक को ही आईसीयू में भर्ती कराने की नौबत आई.
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