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नदारद हुई नकदी, विकास बाधित

वित्त मंत्री ने बैंकों से बार-बार आग्रह किया है विकास जारी रखने के लिए कि वे कारोबार जगत को कर्ज दें. लेकिन डूबत खाते का आकार बढ़ने की आशंका बैंकों को खुले हाथ कर्ज बांटने से रोक रही.

कम्पल्शन शब्द ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में एक ऐसे दबाव के रूप में वर्णित है जो किसी को कुछ करने के लिए बाध्य करता है और इसमें कुछ कर डालने की ऐसी तीव्र इच्छा होती है जिसे रोकना मुश्किल है. वित्त मंत्री बनते ही प्रणब मुखर्जी जब भारतीय स्टेट बैंक के प्रमुख ओ.पी. भट्ट और पंजाब नेशनल बैंक के तत्कालीन प्रमुख के.सी. चक्रवर्ती सहित सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों से मिले तो उन्होंने उनसे अपने कम्पल्शन (विवशता)  के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को आगे ले जाने की अपनी इच्छा को भी साझा किया.

बैलेंस शीट को ठीक-ठाक रखने की विवशता
बैंक प्रमुखों ने भी अपनी तरफ से खुलासा किया कि उनके सामने भी बैलेंस शीट को ठीक-ठाक रखने की विवशता है. शब्दों की इस व्याख्या के अलावा तथ्य यह है कि उद्योग जगत नकदी के अभाव के दौर से गुजर रहा है. पैसा आसानी से उपलब्ध नहीं है और अगर है भी तो यह काफी महंगा है. 2008 के शुरुआत में आरबीआइ के मुद्रास्फीति प्रबंधन के जरिए अर्थव्यवस्था की नकेल कसने और फिर वैश्विक मंदी के नतीजों से भारतीय कॉर्पोरेट जगत पर दोहरी मार पड़ी है.

रिजर्व बैंक के पास रखना होता है कैश 
दरअसल, भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजी का प्रवाह इस बात पर निर्भर है कि रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति के तहत देश के बैंकों के लिए नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) और सांविधिक नकदी अनुपात (एसएलआर) कितना निर्धारित किया गया है.  सीआरआर के तहत बैंकों को अपने कैश रिजर्व का एक हिस्सा रिजर्व बैंक के पास जमा रखना होता है. सीआरआर में कमी होने पर रिजर्व बैंक के पास बैंकों को अपनी कम कैश आरक्षित रखनी होती है इससे बाजार में नकदी बढ़ जाती है. इसी तरह बैंकों को एसएलआर नकदी के अलावा सोने और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के रूप में रिजर्व बैंक के पास रखना होता है ताकि किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने के लिए बैंक इसका इस्तेमाल कर सकें.

रेपो दर
बाजार में नकदी बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक उस ब्याज दर को भी कम कर देता है जिस ब्याज दर पर वह दैनिक कामकाज के लिए बैंकों को पैसा उधार देता है. इस दर को रेपो दर कहते हैं. इसका उलटा रिवर्स रेपो रेट है जिसके तहत यदि बैंकों के पास दैनिक कामकाज में पूंजी बच जाती है तो वे इसे ब्याज पाने के लिए रिजर्व बैंक में जमा कर देते हैं. रिजर्व बैंक जब रिवर्स रेपो रेट कम करता है तो भी बाजार में नकदी बढ़ जाती है. रेपो दर और रिवर्स रेपो दर को मुख्य नीतिगत दरें या 'की पॉलिसी रेट्स' कहा जाता है.{mospagebreak}बैंकों के पास नकदी जितनी ज्‍यादा होगी, उद्योगों ओर कारोबार को भी यह उतनी ही आसानी से मिल सकेगी. इसी वजह से देश में अर्थव्यवस्था की विकास दर में बढ़ोतरी बनाए रखने के लिए सीआरआर और रेपो दर में कमी कर दी गई है. लेकिन इसके बावजूद बैंक को ओर से दिए जाने वाले कर्ज की मात्रा में लगातार गिरावट जारी है. बीती 22 मई को समाप्त हुए पखवाड़े में बैंकों की कर्ज बांटने की वृद्धि दर 16 फीसदी के रिकॉर्ड निचले स्तर पर थी जब कि पिछले साल इसी अवधि में यह 25 फीसदी थी.

मुख्‍य नीतिगत दरों में कटौती 
मुखर्जी बताते हैं कि 30 सितंबर, 2008 से अप्रैल, 2009 के बीच आरबीआइ ने मुख्य नीतिगत दरों में 450 आधार बिंदुओं की कटौती की. सीआरआर और एसएलआर में कमी भी की, मुखर्जी का कहना है, ''इन प्रयासों के जरिए बाजार में 4,22,000 करोड़ रु. से ज्यादा की नकदी बाजार में उपलब्ध करवा दी गई है.'' लेकिन इन सब कोशिशों से अर्थव्यवस्था को कोई प्रत्यक्ष मदद नहीं मिली है. पिछले चार महीनों से औद्योगिक उत्पादन की दर लगातार नकारात्मक बनी हुई है जिससे 2008-09 के लिए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 2.6 फीसदी रहा. अप्रैल में पहली बार इसने 1.4 फीसदी की  वृद्धि दर्ज की.
 
दरों में कटौती का असर
असली समस्या निश्चित रूप से ऋण की अनुपलब्धता की रही है. वाणिज्यिक क्षेत्र के लिए बैंकों से मिलने वाला कर्ज 2007-08 में 21 फीसदी था जो 2008-09 में कम होकर 16.9 फीसदी हो गया. वाणिज्यिक क्षेत्र को होने वाला संसाधनों का कुल प्रवाह 2008-09 में 6,79,040 करोड़ रु. था जो कि पूर्व वर्ष के 7,80,505 करोड़ रु. की तुलना में खासा कम था. रिजर्व बैंक के अधिकारियों के मुताबिक 6.5 फीसदी विकास दर बनाए रखने के लिए ऋण में 20 फीसदी की बढ़ोतरी होनी चाहिए. याद करें, 2005-06 के दौरान 9.5 फीसदी की विकास दर के वक्त कर्ज 39.6 फीसदी बढ़ा था. बैंकों की ओर से कर्ज की मात्रा में इस साल 40,000 करोड़ रु. की कमी आ गई. यानी आरबीआइ की ओर से प्रमुख दरों में कटौती का असर बैंकों द्वारा दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दरों में कमी के रूप में दिखाई नहीं दे रहा है. इसका मतलब साफ है कि बैंकों के लिए ब्याज दरें घटाने की परिस्थितियां तो बन गईं लेकिन उन्होंने यह फायदा अपने ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया. छह महीने के नीतिगत हस्तक्षेप के बाद भी जहां आम आदमी को 8.5 फीसदी से 10 फीसदी के बीच ऋण मिल रहा है, वहीं छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए यह दर 12 फीसदी से कम नहीं है.{mospagebreak}वैसे तो ऋण की कमी ने उद्योग जगत के सभी क्षेत्रों पर बुरा प्रभाव डाला है, फिर भी टेक्सटाइल और निर्यात को सबसे ज्यादा नुक्सान झेलना पड़ा है. आश्चर्य की बात नहीं कि फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन (एफआइईओ) के अध्यक्ष ए. शक्तिवेल विकास दर बनाए रखने के लिए वित्त मंत्री द्वारा अति लघु, लघु और मध्यम दर्जे के उद्योगों के लिए बैंकों से उधारी दरों में कटौती के अनुरोध पर उनके प्रति कृतज्ञता महसूस करते हैं. शक्तिवेल कहते हैं, ''रिजर्व बैंक ने 2009-10 के लिए ऋण की मात्रा में 18-20 फीसदी के बीच बढ़ोतरी का अनुमान  लगाया था लेकिन असल में यह काफी कम है.''

कर्ज की राशि डूबने का भय  
आखिर बैंक उधार क्यों नहीं दे रहे हैं? सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुख मानते हैं कि डिपॉजिट्स पर ऊंची ब्याज दरें इसका पहला कारण है. साथ ही आर्थिक मंदी की आशंका के मद्देनजर गैर-निष्पादनकारी आस्तियां (नॉन-पर्फार्मिंग एसेट्स या एनपीए) बढ़ने की दशा में कर्ज की राशि डूब जाने की आशंका को देखते हुए बैंक ब्याज दरों में कटौती से पीछे हट रहे हैं.

कॉस्ट ऑफ डिपॉजिट्स
माना जा रहा है कि 2011 तक बैंकों का कुल एनपीए 5 फीसदी को छू लेगा जबकि 2008 में यह 2.3 महज फीसदी था. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक कुल एनपीए मार्च 2008 के 55,000 करोड़ रु. की तुलना में तीन गुना होकर 1.9 लाख करोड़ रु. पहुंच जाएगा. सबसे तेज बढ़ोतरी आइसीआइसीआइ बैंक के कुल एनपीए में देखी गई है जो 1 से 4.33 फीसदी तक है. ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के सीएमडी आलोक के. मिश्र कहते हैं कि बैंक इच्छित सीमा तक उधार नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि जमा की लागत (कॉस्ट ऑफ डिपॉजिट्स) अभी भी बहुत अधिक है. उनका मानना है, ''एक बार इसमें गिरावट आने के बाद उधार पर ब्याज दरों में ज्यादा से ज्यादा कटौती की संभावनाएं खुलेंगी. अगर आपने एक साल के लिए अपने बैंक में डिपॉजिट्स जमा करवाएं है तो जब तक यह अवधि खत्म नहीं हो जाती, नए तरीके आजमाने की संभावना नहीं रहती है.

नीतिगत कटौतियां पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं
तीसरी और चौथी तिमाही में हमने काफी ऊंची ब्याज दर पर डिपॉजिट्स लिए हैं.'' हालांकि वे वित्त मंत्री की उस बात से सहमत नहीं हैं कि उधार पर ब्याज दरों में नीतिगत कटौतियां पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं हो रही हैं. वे कहते हैं, ''यह कैसे कोई कह सकता है कि हम उचित कदम नहीं उठा रहे हैं? हमारी उधारी दरें 14 फीसदी से घटकर 12 फीसदी पर आ गईं हैं. हम भी उद्योग को सहारा देते हैं और ऊंची दरें नहीं चाहते हैं.''{mospagebreak}आइसीआइसीआइ बैंक की प्रबंध निदेशक और सीईओ चंदा कोचर का कहना है कि पिछले छह महीनों में बैंक ने नीतिगत कटौतियों के बीच उधारी दरों में 150 आधार बिंदुओं तक की कमी की है. कोचर आश्वासन देती हैं, ''हमें खुदरा और कॉर्पोरेट ऋण मांग में सुधार की उम्मीद है. हम अपने खास उत्पाद क्षेत्रों में कर्ज मुहैया कराने के अवसरों पर फोकस कर रहे हैं.''

बढ़ता एनपीए कर्ज की राह में रोड़ा
एचएसबीसी की सीईओ नैना लाल किदवई का कहना है कि जब तक देश में बचत दरों में बदलाव नहीं आ जाता, बैंकों की कर्ज देने की गति धीमी ही बनी रही रहेगी. राष्ट्रीय बचत योजना और भविष्य निधि की दरों में बदलाव लाना होगा क्योंकि बैंकों में जमा धन को भी आखिरकार इनसे प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है. अगर ये दरें 8 से 9 फीसदी के बीच हैं, तो बैंकों की जमा दरें इनसे कम नहीं हो सकतीं. वैसे, किदवई के मुताबिक कर्ज देने में सबसे बड़ा रोड़ा बढ़ता हुआ एनपीए है. वे कहती हैं, ''बैंकिंग क्षेत्र का एनपीए दोगुना हो गया है. दुर्भाग्यवश अति लघु, लघु व मध्यम उद्योग क्षेत्र में एनपीए बढ़ रहा है जिसे असल में ऋण की काफी जरूरत है.
 
अग्रिमों में तेज गिरावट
अति लघु और लघु उद्योगों को मिलने वाले अग्रिमों में बढ़ोतरी एक साल पहले के 67.4 फीसदी की तुलना में तेज गिरावट के साथ फरवरी, 2009 में 35.4 फीसदी रह गई. उद्योग जगत के मुताबिक वह आर्थिक मंदी के बीच एनपीए को लेकर सतर्क है. लघु व मध्यम उद्योगों के परिसंघ के महासचिव अनिल भारद्वाज कहते हैं, ''प्राथमिक क्षेत्र होने के बावजूद हमारे लिए फंड मिल पाना मुश्किल होता है.'' लघु व मध्यम उद्योगों की सबसे आम मुश्किल यह है कि राष्ट्रीयकृत या यहां तक कि सहकारी बैंक भी प्रस्तावों की महज समीक्षा में चार से पांच महीने लगा देते हैं. पहले प्रोत्साहन पैकेज में इस सेक्टर को 20,000 करोड़ रु. मिल गए, अगली बार 7,500 करोड़ रु. आवंटित किए गए. बावजूद इसके लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका है.

आत्‍मविश्‍वास बहाली में लगेगा वक्‍त 
इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लि. के चेयरमैन एस.एस कोहली, जिन्होंने वित्त मंत्री के साथ हुई बैठक में भाग लिया, के मुताबिक बैंकिंग संस्थाएं वर्तमान मंदी से पूरी तरह अप्रभावित हैं, लेकिन आत्मविश्वास की कमी की वजह से उद्योग जगत को ऋण देने से इनकार कर रही हैं. कोहली कहते हैं, ''उद्योग जगत को कर्ज देने का आधार बढ़ाने की खातिर बैंकों की फिर से आत्मविश्वास बहाली में थोड़ा वक्त लगेगा.''  एस ऐंड पी के एशिया प्रशांत के मुख्य अर्थशास्त्री सुबीर गोकर्ण मानते हैं कि बजट से मिलने वाले संकेतों पर काफी कुछ निर्भर करेगा. यह साफ है कि सरकार और बैंकों पर दबाव बनाने के साथ ही दोनों को विकास दर 9 फीसदी करने की ओर कदम बढ़ाने होंगे. तब तक उद्योग जगत सिर्फ इंतजार ही कर सकता है.

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