मुहर्रम: मजलिसों का दौर शुरू, घरों में मातम, 10वें दिन हुई थी इमाम हुसैन की शहादत

इस्लाम धर्म में मुहर्रम का महीना मुसलमानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस बार मुहर्रम का महीना 1 सितंबर से शुरू हुआ है लेकिन इस महीने का 10वां दिन सबसे अहम होता है. इस दिन को रोज-ए-आशुरा कहते हैं. इस बार रोज-ए-आशुरा 10 सितंबर को है.  

मुहर्रम के महीने का 10वां दिन सबसे अहम
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 02 सितंबर 2019,
  • अपडेटेड 7:37 AM IST

इस्लाम धर्म में मुहर्रम का महीना मुसलमानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. खासकर शिया मुस्लिम समुदाय इसे गम के महीने के तौर पर मनाते हैं. मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है. इस बार मुहर्रम का महीना 1 सितंबर से शुरू हुआ है.

मुहर्रम का पूरा महीना बेहद खास माना जाता है. लेकिन इस महीने का 10वां दिन सबसे अहम  होता है. इस दिन को रोज-ए-आशुरा कहते हैं. इस बार रोए-आशुरा 10 सितंबर को है.

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मुहर्रम के महीने को शिया और सुन्नी दोनों मनाते हैं. लेकिन इसे मनाने के तरीके और इसकी मान्यताएं एक दूसरे से काफी अलग हैं. शिया समुदाय के लोगों को मुहर्रम की 1 तारीख से लेकर 9 तारीख तक रोजा रखने की छूट होती है. शिया उलेमा के मुताबिक, मुहर्रम की 10 तारीख यानी रोज-ए-आशुरा के दिन रोजा रखना हराम है.

जबकि सुन्नी समुदाय के लोग मुहर्रम की 9 और 10 तारीख को रोजा रखते हैं. हालांकि, इस दौरान रोजा रखना मुस्लिम लोगों पर फर्ज नहीं है, लेकिन इसे सवाब के तौर पर रखते हैं.

मुहर्रम चांद दिखते ही सभी शिया मुस्लिमों के घरों और इमामबाड़ों में मजलिसों का दौर शुरू हो जाता है. इमाम हुसैन की शहादत के गम में शिया और कुछ इलाकों में सुन्नी मुस्लिम मातम करते हैं और जुलूस निकालते हैं.

शिया समुदाय में ये सिलसिला पूरे 2 महीने 8 दिन तक चलता है. महीने भर शिया समुदाय के लोग मातम करते हैं. सभी तरह के जश्न से दूर रहते हैं. इस दौरान वे लाल सुर्ख और चमक वाले कपड़े नहीं पहनते हैं. ज्यादातर काले रंग के ही कपड़े पहनते हैं.

मुहर्रम का चांद दिखाई देते ही सभी शिया समुदाय के लोग गम में डूब जाते हैं. शिया महिलाएं और लड़कियां चांद निकलने के साथ ही अपने हाथों की चूड़ियों को तोड़ देती हैं. इतना ही नहीं वे सभी श्रृंगार की चीजों से भी पूरे 2 महीने 8 दिन के लिए दूरी बना लेती हैं.

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