तुझे बिन जाने, बिन पहचाने मैंने हृदय से लगाया: मजरूह सुल्तानपुरी और टॉप 5 फिल्मी प्रेम गीत

मजरूह सुल्तानपुरी की जयंती पर साहित्य तक पर प्रेम पर लिखे उनके ये टॉप पांच फिल्मी प्रेम गीत के साथ ही पढ़िए उनके जीवन के कई अनजाने पहलुओं के बारे में 

मजरूह सुल्तानपुरी [फाइल फोटो- इंडिया टुडे]
जय प्रकाश पाण्डेय
  • नई दिल्ली,
  • 01 अक्टूबर 2019,
  • अपडेटेड 1:24 PM IST

मजरूह सुल्तानपुरी अगर जिंदा होते तो आज सौ साल पूरे कर चुके होते. इस मशहूर शायर का जन्म उत्तरप्रदेश के सुल्तानपुर में 1 अक्टूबर, 1919 को हुआ था. फिल्मों के लिए कमाल के गीत लिखने वाले मजरूह यों तो बचपन से ही शेरो-शायरी के शौकीन थे और कम उम्र में ही इलाकाई मुशायरों का अहम हिस्सा बन चुके थे, पर उन्हें फिल्मी दुनिया पसंद नहीं थी. आज हम फिल्म जगत के सुरीले दौर की कल्पना तक मजरूह साहब के बिना कर नहीं सकते. अपनी शेरो-शायरी के लिए मेडिकल की प्रैक्टिस बीच में ही छोड़ दी. मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी के संपर्क में वह परवान चढ़ने लगे और कहते हैं साल 1945 में सब्बो सिद्धकी इंस्टीट्यूट द्वारा संचालित एक मुशायरे में हिस्सा लेने मजरूह सुल्तानपुरी पहली बार मुंबई आए तो उनकी शायरी सुन मशहूर निर्माता एआर कारदार ने उनसे अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने की पेशकश की. मजरूह सुल्तानपुरी ने कारदार साहब की इस पेशकश को ठुकरा दिया क्योंकि वह किसी शायर के लिए फिल्मों के लिए गीत लिखने को तौहीन समझते थे वे अच्छी बात नहीं समझते थे.जिगर मुरादाबादी ने मजरूह सुल्तानपुरी को तब सलाह दी कि फिल्मों के लिए गीत लिखना कोई बुरी बात नहीं है. गीत लिखने से मिलने वाली धन राशि में से कुछ पैसे वे अपने परिवार के खर्च के लिए भेज सकते हैं. जिगर मुरादाबादी की सलाह पर मजरूह सुल्तानपुरी फिल्मों में गीत लिखने के लिए राजी हो गए. संगीतकार नौशाद के लिए उन्होंने पहला गीत ‘गेसू बिखराए, बादल आए झूम के’ क्या लिखा, फिल्मी दुनिया में एक अलग ही राह पकड़ ली.फिल्म ‘शाहजहां’, ‘अंदाज’, 'मेंहदी', ‘साथी’, ‘पाकीजा’, ‘तांगेवाला’, ‘धरमकांटा’ और ‘गुड्डू’, ‘फुटपाथ’, ‘आरपार’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘नौ दो ग्यारह’, ‘सोलवां साल’, ‘काला पानी’, ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘सुजाता’, 'बंबई का बाबू’, ‘बात एक रात की’, ‘तीन देवियां’, ‘ज्वैलथीफ’, ‘पेइंग गेस्ट’  और ‘अभिमान’  ‘फिर तीसरी मंजिल’, ‘बहारों के सपने’, ‘प्यार का मौसम’, ‘कारवां’, ‘यादों की बारात’, ‘हम किसी से कम नहीं’ और ‘जमाने को दिखाना है’ जैसी फिल्मों के सुपरहिट होने में उनके लिखे गीतों की भी बड़ी भूमिका थी. 25 मई, 2000 को इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले मजरूह सुल्तानपुरी ने चार दशक से भी लंबे सिने करियर में तकरीबन 300 फिल्मों के लिए 4000 गीत लिखे. साल 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘दोस्ती’ के ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ गीत के लिए वह सर्वश्रेष्ठ गीतकार के ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार से भी नवाजे गए. फिल्म जगत में अपने महत योगदान के लिए साल 1993 में मजरूह सुल्तानपुरी को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के’ से नवाजा गया. आज उनकी जयंती पर साहित्य तक पर पढ़िए उनके ये टॉप पांच फिल्मी प्रेम गीत. 1.होंठों में ऐसी बात मैं दबाके चली आईखुल जाये वोही बात तो दुहाई है दुहाईहाँ रे हाँ, बात जिसमें, प्यार तो है, ज़हर भी है, हायहोंठों में...हो शालू...रात काली नागन सी हुई है जवांहाय दय्या किसको डँसेगा ये समाजो देखूँ पीछे मुड़केतो पग में पायल तड़पेआगे चलूँ तो धड़कती है सारी अंगनाईहोंठों में...हो शालू...ऐसे मेरा ज्वाला सा तन लहरायेलट कहीं जाए घूँघट कहीं जायेअरे अब झुमका टूटेके मेरी बिंदिया छूटेअब तो बनके क़यामत लेती हूँ अंगड़ाईहोंठों में... 2.मेरी भीगी-भीगी सी, पलकों पे रह गएजैसे मेरे सपने बिखर केजले मन तेरा भी, किसी के मिलन कोअनामिका, तू भी तरसेमेरी भीगी ...तुझे बिन जाने, बिन पहचानेमैंने हृदय से लगायापर मेरे प्यार के बदले में तूनेमुझको ये दिन दिखलायाजैसे बिरहा की ऋतु मैंने काटीतड़पके आँहें भर-भर केजले मन तेरा ...आग से नाता, नारी से रिश्ताकाहे मन समझ न पायामुझे क्या हुआ था, इक बेवफ़ा सेहाय मुझे क्यों प्यार आयातेरी बेवफ़ाई पे, हँसे जग सारागली-गली गुज़रे जिधर सेजले मन तेरा ... 3.ये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवाकहा दो दिलों ने, की होंगे न मिल कर, कभी हम जुदाये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवाये क्या बात है आज की चांदनी में -2के हम खो गये प्यार की रागिनी मेंये बाहों में बाहें, ये बहकी निगाहेंलो आने लगा ज़िंदगी का मज़ाये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवासितारों की महफ़िल ने करके इशारा -2कहा अब तो सारा जहाँ है तुम्हारामुहब्बत जवाँ हो, खुला आसमाँ होकरे कोई दिल आरज़ू और क्याये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवाक़सम है तुम्हें तुम अगर मुझसे रूठे -2रहे सांस जब तक, ये बंधन न टूटेतुम्हें दिल दिया है, ये वादा किया हैसनम मैं तुम्हारी रहूँगी सदाये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवाकहा दो दिलों ने, की होंगे न मिल कर,कभी हम जुदाये रातें, ये मौसम, नदी का किनारा, ये चंचल हवा4.लूटे कोई मन का नगर बन के मेरा साथी -2कौन है वो, अपनों में कभी, ऐसा कहीं होता है,ये तो बड़ा धोखा हैलूटे कोई ...यहीं पे कहीं है, मेरे मन का चोरनज़र पड़े तो बइयाँ दूँ मरोड़ -2जाने दो, जैसे तुम प्यारे हो,वो भी मुझे प्यारा है, जीने का सहारा हैदेखो जी तुम्हारी यही बतियाँ मुझको हैं तड़पातींलूटे कोई ...रोग मेरे जी का, मेरे दिल का चैनसाँवला सा मुखड़ा, उसपे कारे नैन -2ऐसे को, रोके अब कौन भला,दिल से जो प्यारी है, सजनी हमारी हैका करूँ मैं बिन उसके रह भी नहीं पातीलूटे कोई .. 5.रहते थे कभी जिनके दिल मेंहम जान से भी प्यारों की तरहबैठे हैं उन्ही के कूचे मेंहम आज गुनहगारों की तरहदावा था जिन्हें हमदर्दी काखुद आके न पूछा हाल कभीमहफ़िल में बुलाया है हम पेहँसने को सितमगारों की तरहरहते थे...बरसों से सुलगते तन मन परअश्कों के तो छींटे दे ना सकेतपते हुए दिल के ज़ख्मों परबरसे भी तो अंगारों की तरहरहते थे...सौ रुप धरे जीने के लियेबैठे हैं हज़ारों ज़हर पियेठोकर ना लगाना हम खुद हैंगिरती हुई दीवारों की तरहरहते थे... 

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