बचपन का यौन शोषण जिन्दगीभर डराता है

हम जो कुछ भी अपने बचपन में देखते हैं, सुनते हैं वो जिन्दगीभर हमारे साथ रहता है. इसलिए मां-बाप कोशिश करते हैं कि बच्चे को ज्यादा से ज्यादा अच्छी आदतें सिखाएं ताकि वो आगे चलकर एक अच्छा नागरिक बने.

child abuse
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 07 जुलाई 2015,
  • अपडेटेड 7:23 PM IST

हम जो कुछ भी अपने बचपन में देखते हैं, सुनते हैं, सीखते हैं या फिर सहते हैं वो जिन्दगीभर हमारे साथ रहता है. इसलिए मां-बाप कोशिश करते हैं कि बच्चे को ज्यादा से ज्यादा अच्छी आदतें सिखाएं ताकि वो आगे चलकर एक अच्छा नागरिक बने.

पर कई बार ऐसा होता है कि मां-बाप या घर में बड़ों के होने के बावजूद बच्चा खुद को नेगलेक्ट महसूस करता है. कई बार स्थिति इससे भी बुरी हो जाती है. ऐसे में जरूरी है कि बच्चे पर पूरा ध्यान दिया जाए ताकि बचपन की कोई कड़वी याद उसके आने वाले भविष्य को बर्बाद न करे.

कैसे बच्चे होते हैं शोषण का शिकार? इसका कोई क्राइटेरिया नहीं है. समाज के किसी भी वर्ग के बच्चे को ये झेलना पड़ सकता है. ऐसे परिवार जहां अस्थिरता होती है, अशिक्षा होती है, अकेलापन होता है, गरीबी होती है, बेरोजगारी होती है और सामाजिक बिखराव होता है, वहां इस तरह के मामले होने का अंदेशा तुलनात्मक रूप से अधिक होता है.

हमारे समाज में ऐसी सोच है कि सिर्फ बच्च‍ियों के साथ ही शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक दुराचार होता है लेकिन ऐसा नहीं है. कई मामलों में लड़कों को भी शारीरिक शोषण, मानसिक आघात और भावनात्मक ठोकर का सामना करना पड़ता है.

बच्चों के साथ किसी भी उम्र में शोषण हो सकता है. बीते कुछ सालों में तो कई ऐसे मामले आए हैं जिनमें दो साल या उससे भी छोटी उम्र के बच्चे के साथ शोषण की पुष्ट‍ि हुई है. कई बार ऐसा इसलिए भी होता है कि मां-बाप बच्चे के साथ समय नहीं बिताते और बच्चा अपनी परेशानी उनसे शेयर नहीं कर पाता है.

क्या होता है असर? शोषण चाहे जैसा भी हो बच्चे पर उसका नकारात्मक असर ही होता है. इससे बच्चा शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तीनों रूप से टूटा हुआ महसूस करता है. पर भावनात्मक पहलू से वो सबसे अधिक प्रभावित होता है. वो खुद पर तो भरोसा खोता ही है साथ ही अपने घर के बड़ों के प्रति भी वो भरोसा नहीं रख पाता है.

शोषण की समयावधि भी इसे काफी प्रभावित करती है. ऐसे बच्चों में तोड़फोड़ और अपने लिए ही खतरा बनने के चांसेज ज्यादा होते हैं. ऐसे बच्चे नशे के प्रति भी ज्यादा आकर्षित होते हैं.

समय के साथ जब ये बच्चे बड़े होते हैं तो कभी-कभी उनमें बदले की भावना भी घर कर जाती है और वे अपने बच्चों को भी उसी तरह परेशान करते हैं जैसे वो खुद हुए होते हैं. उनके इस व्यवहार का असर उनके बाकी संबंधों पर भी पड़ता है.

क्या है हल? पहले तो ऐसे हालात ही नहीं बनने देने चाहिए जिसमें बच्चा किसी भी ऐसी अप्रिय घटना का शिकार ही न हो. आप उसे ज्यादा वक्त के लिए अकेला न छोडें. बच्चे से ज्यादा से ज्यादा बात करें ताकि आपको उसी हर गतिविधि का अंदाजा रहे. साथ ही अगर ऐसा कुछ हो जाता है तो काउंसलर की मदद लेना न भूलें. साथ ही बच्चे को ये यकीन दिलाने की कोशिश करें कि वो आप पर भरोसा कर सकता है.

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की एक स्टडी के अनुसार, बचपन में हुई ऐसी किसी भी अप्रिय घटना का सबसे ज्यादा असर दिमागी तौर पर होता है.

ऐसे में कोशिश की जानी चाहिए कि बच्चे को ज्यादा से ज्यादा प्यार दिया जाए और उसकी हर छोटी-बड़ी हरकत पर छिपी हुई नजर रखी जाए ताकि वो डिप्रेशन में न जाने पाए.

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