India Today Conclave East: मोदी के आने के बाद कम हुई है वंशवादी राजनीति- नि‍शि‍कांत दुबे

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2019 के दूसरे दिन वंशवादी राजनीति पर आयोजित एक महत्वपूर्ण सत्र को बीजेपी सांसद डॉ. निशिकांत दुबे, पश्चिम बंगाल के कांग्रेस विधायक ईशा खान चौधरी और सीपीएम नेता डॉ. फाउद हलीम ने भी संबो‍धि‍त किया.

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट के दूसरे दिन राजनीति में वंशवाद पर चर्चा (फोटो: यासिर इकबाल)
aajtak.in
  • कोलकाता,
  • 07 दिसंबर 2019,
  • अपडेटेड 7:26 AM IST

  • 'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2019' का आज दूसरा और आखिरी दिन है
  • आज राजनीति से लेकर महिला सुरक्षा तक कई मसलों पर चर्चा

राजनीति में वंशवाद से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन 2014 में बीजेपी का नेतृत्व नरेंद्र माेदी के संभालने के बाद कम से कम बीजेपी में तो यह बुराई बहुत कम हो गई है. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट को संबोधि‍त करते हुए बीजेपी सांसद  डॉ. निशिकांत दुबे ने यह बात कही. राजनीति में वंशवाद पर आयोजित सत्र को दुबे के अलावा पश्चिम बंगाल के कांग्रेस विधायक ईशा खान चौधरी और सीपीएम नेता डॉ. फाउद हलीम ने भी संबो‍धि‍त किया.

कोलकाता के ओबेरॉय ग्रैंड होटल में  'इंडिया टुडे कॉन्क्लेव ईस्ट 2019' का आज दूसरा और आखिरी दिन है. आज इस कार्यक्रम में भारत में महिलाओं की सुरक्षा पर चर्चा हुई, वहीं आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का मुद्दा भी फोकस में रहेगा.

मोदी के आने के बाद कम हुई वंशवाद की बुराई

सत्र 'मूट पॉइंट: पॉलिटिकल लीगैसी: अ बर्डन ऑर अ फोर्स मल्टीप्लायर?  को संबोधि‍त करते हुए डॉ. निशिकांत दुबे ने कहा कि 2014 के बाद शायद बीजेपी में यह बुराई कुछ हद तक रही हो, लेकिन अब यह काफी कम हो गया है. उन्होंने कहा, 'मैं खुद उदाहरण हूं. तीसरी बार सांसद हूं और मेरी कोई राजनीतिक विरासत नहीं है. मोदी जी के आने के बाद इन चीजों को कम करने का प्रयास किया.  कर्नाटक में अनंत कुमार की मौत के बाद उनकी पत्नी नहीं बल्कि एक युवा को टिकट दिया गया. झारखंड में सिर्फ एक टिकट सूर्यदेव सिंह जी के परिवार को दिया गया.

उन्होंने कहा, 'हरियाणा में राव इंद्रजीत सिंह अपने बेटे को लड़ाना चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और पार्टी को इसका नुकसान भी उठाना पड़ा. इसी तरह झारखंड के इलेक्शन में भी कई नेता अपने बेटा-बेटी को देखना चाहते थे, लेकिन हमने नहीं दिया.' 

उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि 2014 के बाद वंशवाद की राजनीति कम हो रही है. राजस्थान में कोई लीगैसी नहीं है, वसुंधरा राजे की वहां शादी हुई थी और वे वहां नेता बनी. यूपी में 73 सांसद हैं, जिनमें ज्यादातर नए गांव, गरीबी से आए लोग हैं. अब पॉलिटिकल वर्कर जीतकर आ रहा है. रमन सिंह के बेटे को बीजेपी ने टिकट नहीं दिया.

नेता के वंशज का राजनीति में आना स्वाभाविक: ईशा खान चौधरी

पश्चिम बंगाल में दिग्गज नेता अब्दुल गनी खान चौधरी के भतीजे और कांग्रेस विधायक ईशा खान चौधरी ने कहा, 'एक्टर के बेटे, डॉक्टर के बेटे-बेटी भी उस पेशे में आते हैं, तो राजनीति में भी कई बार ऐसा होता है. मालदा में सिर्फ गनी खान चौधरी के परिवार की बात नहीं है, बल्कि वहां पूरी कांग्रेस पार्टी अच्छा काम कर रही थी. गनी खान की मौत के बाद वहां और लोग भी अच्छा काम कर रहे हैं. कांग्रेस ने अच्छा काम किया और 12 में से 8 विधानसभा में कांग्रेस ने जीत हासिल की.

उन्होंने कहा, 'मैंने खुद तय किया कि अपने इलाके में बदलाव करना है, गरीबी को दूर करना है. यह सच है कि अगर सरनेम नहीं होता कनाडा से यहां आकर राजनीति में एंटर करने में आसानी नहीं होती, मुझे टिकट मिलने में आसानी हुई है. लेकिन अब बदलाव आ रहा है. राहुल गांधी जी खुद ही नए लोगों को जगह दे रहे हैं.

सामंती सिस्टम में वंशवाद स्वाभाविक: सीपीएम नेता डॉ. फाउद हलीम 

वंशवाद पर सीपीएम नेता डॉ. फाउद हलीम ने कहा कि सामंती सिस्टम में वंशवाद स्वाभाविक होता है, लेकिन वामपंथी राजनीति की बात करें, तो वहां विचारधारा की राजनीति होती है. उन्होंने कहा, 'मैं भी राजनीति में तीसरी पीढ़ी का नेता हूं. लेकिन मैं कभी उस सीट पर चुनाव नहीं लड़ा जिसमें मेरे पिता लड़ते रहे हैं. लेफ्ट में नई पीढ़ी को जगह दी जा रही है.'

उन्होंने कहा, ' इस मामले में हमारे नेता ज्योति बसु बहुत साफ थे कि सीपीएम में सिर्फ विचारधारा की राजनीति चलेगी. बंगाल फेमिली राज के खिलाफ है और यहां की जनता यह समझती है. अगर विचारधारा, विकास पर काम नहीं करेंगे, लोग आपको दुबारा नहीं चुनेंगे. लोग आपकी डिलिवरी से आपको को आंकते हैं.' 

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