मिजो नेशनल फ्रंट: बांस के जंगल में फूल खिले थे!

पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखिरी किला मिजोरम ढह गया है. मिजोरम में 10 सालों से सत्ता पर काबिज कांग्रेस को जनता ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है. अब सत्ता मिजो नेशनल फ्रंट के हाथों में है. अब जोरामथांगा एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एमएनएफ का गठन कैसे हुआ और कौन हैं जोरामथांगा?

मिजो नैशनल फ्रंट
सुशांत झा/मंजीत ठाकुर
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  • 12 दिसंबर 2018,
  • अपडेटेड 4:11 PM IST

मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट ने दस साल बाद सत्ता में वापसी की है और तीन राज्यों में जीत के जश्न में डूबी कांग्रेस के लिए पूर्वोत्तर से मानो एक दुखभरी पाती भेज दी है. जोरामथांगा एक दफा फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. लेकिन बहुत कम लोगों को इस पार्टी के जन्म की दिलचस्प कहानी मालूम है जो किसी फूल के खिलने से जुड़ी हुई है, लेकिन वो फूल ‘कमल’ का फूल नहीं था! वह फूल था बांस का.

आपने शायद बांस के फूल नहीं देखे होंगे, क्योंकि यह फूल खिलता ही बहुत बरसों में एक बार है. ऐसा करीब हर अड़तालीस साल बाद होता है जब बांस के जंगल में फूल खिलते हैं. 

बांस के फूलों के खिलने के दौरान चूहे इसे खाते हैं और इससे चूहों की प्रजनन शक्ति काफी बढ़ जाती है और हिंदुस्तानी लोकोक्तियों और मुहावरों में बांस के जंगल में फूल खिलने को अपशकुन माना जाता है. वजह यही है कि एक खेतिहर देश भारत में अगर चूहे अत्यधिक हो जाएं तो वो फसलों को चौपट करेंगे और अकाल की आशंका बढ़ जाएगी.

सन् 1959 की बात है. उस साल भी पूर्वोत्तर के बांस के जंगलों में फूल खिले थे. चूहों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई थी और उन्होंने पूरे इलाके के घरों-गोदामों के अनाज चट कर दिए. दिल्ली की सरकार जब तक जागती, भ्रष्ट अधिकारियों-व्यापारियों ने अनाज की कालाबाजारी कर ली और लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए. 

असम सरकार के एक पूर्व अकाउंटेंट ने इसके खिलाफ लोगों को गोलबंद करना और अपने स्तर पर राहत कार्य करना शुरू कर दिया. उसने नेशनल मिजो फेमिन फ्रंट बनाया (बाद में उसी का नाम मिजो नेशनल फ्रंट हो गया) और आंदोलन जल्दी ही भारत विरोधी हो गया. नतीजतन, भारत सरकार ने इलाके में फौज का जमावड़ा कर दिया. कहते हैं सेना ने गांवों से लोगों को उजाड़कर निगरानी करने के लिहाज से हाइवे के किनारे जबरन बसा दिया. ऐसा ही नगालैंड में भी हुआ था जब पिजो वहां अलगाववादी आन्दोलन चला रहे थे. 

मिजोरम में करीब दो दशक तक चले उस खूनी संघर्ष में हजारों लोग मारे गए, लापता हुए और बेघर हो गए. उस अलगाववादी आंदोलन को पाकिस्तान से भी धन और हथियारों की मदद मिली और अलगाववादी संगठन के नेता अक्सर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) जाते-आते रहते. जब अलगाववादियों ने मिजोरम के मुख्य शहर लुंगलेह पर कब्जा कर क्षेत्र को भारतीय संघ से आजाद करने की घोषणा कर दी तो भारत सरकार को पहली बार अपनी ही जनता के खिलाफ वायुसेना के इस्तेमाल के लिए मजबूर होना पड़ा. इससे अलगाववादियों को जंगल में शरण लेनी पड़ी और जान-माल का काफी नुक्सान हुआ.

सन् 1986 में राजीव गांधी के कार्यकाल में एक शांति समझौता हुआ जिसमें जी पार्थसारथी जैसे नौकरशाहों ने अहम भूमिका निभाई थी और उस आतंकवादी ने हथियार रख दिया. राज्य में चुनाव हुए और वो पूर्व आतंकवादी अब प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया. उस व्यक्ति का नाम था लालडेंगा और गोरिल्ला संगठन था वही मिजो नेशनल फ्रंट. जुलाई, 1990 में लालडेंगा की मृत्यु फेफड़े के कैंसर से हो गई और उसके बाद उनके कभी लेफ्टिनेंट और सचिव रहे जोरामथंगा पार्टी के अध्यक्ष बने. ये वहीं जोरामथंगा हैं जो, मिजो नेशनल फ्रंट के अलगाववादी स्वरूप के दौरान और मिजोरम की सन् 1966 में ‘आजादी’ की घोषणा के वक्त, लालडेंगा के विश्वस्त थे और भारत की आंखों में किरकिरी थे. लेकिन वक्त ने ऐसी पलटी मारी कि लालडेंगा और जोरामथंगा को शांति की अहमियत समझ में आ गई और मिजोरम आज पूर्वोत्तर के राज्यों में सबसे तरक्की करता हुआ राज्य है और विकास के कई मानकों पर एक मॉडल स्टेट है.

पिछली बार सन् 2008 में मिजोरम में बांस के जंगलों में फूल खिले थे और बांस की खेती के लिए बजट का प्रावधान उस समय सोशल मीडिया हास्य बन गया था जब वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सन् 2018-19 के बजट में ‘राष्ट्रीय बांस मिशन’ की घोषणा की! लेकिन छह दशक पहले कौन जानता था कि बांस के फूल की वजह से एक राजनीतिक दल का गठन हो जाएगा?

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