संविधान पीठ को संवैधानिक मूल्यों की याद दिलाई मुस्लिम पक्ष ने

अदालत के फैसले तथ्यों पर होते हैं भावनाओं पर नहीं. सुप्रीम कोर्ट संविधान का रखवाला है. ये बात कोर्ट को याद दिलाने का मुस्लिम पक्ष का शायद कोई मकसद रहा हो जो कि इस केस में स्पष्ट तो नहीं होता है.

साभार-इंडिया टुडे साभार-इंडिया टुडे
मनीष दीक्षित
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  • 21 अक्टूबर 2019,
  • अपडेटेड 7:16 PM IST

अयोध्या में राम जन्मभूमि केस में दोनों पक्षों की अपीलों पर दलीलों का क्रम 17 अक्तूबर को खत्म हो गया. इसके बाद वैकल्पिक राहत (मोल्डिंग ऑफ रिलीफ) की मांग भी हिंदू और मुस्लिम पक्षों ने एक के बाद एक दाखिल कर दी. मोल्डिंग ऑफ रिलीफ एक प्रक्रिया है जिसके तहत पक्षकार अपनी मूल मांग न माने जाने की स्थिति में उसके बदले वैकल्पिक राहत मांगते हैं. मुस्लिम पक्ष ने वैकल्पिक राहत की मांग सीलबंद लिफाफे में दाखिल की जिस पर हिंदू पक्ष ने आपत्ति जाहिर की. लेकिन अदालत ने इस मांग को रिकॉर्ड पर ले लिया है.

वैकल्पिक राहत के मसले पर एक कदम आगे बढ़ते हुए रामलला की तरफ से सुप्रीम कोर्ट से विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए पूरी जमीन खुद को देने की मांग की गई है. कहा गया है कि हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार कर निर्मोही अखाड़ा या मुस्लिम पक्ष को कोई हिस्सा न दिया जाए. एएसआइ की रिपोर्ट से साबित है कि यहां मंदिर हुआ करता था. लिहाजा पूरी जमीन ही हिंदू पक्ष को दे दी जाए.  

लेकिन मुस्लिम पक्ष की मांग विषय से कुछ हटकर है. ये एक दीवानी केस है और इसमें जमीन के मालिकाना हक को लेकर हिंदू-मुस्लिम पक्ष कोर्ट में हैं. मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि फैसला ऐसा आए जिसमें संवैधानिक मूल्य परिलक्षित हों. क्योंकि ये मामला देश की भावी पीढ़ियों को प्रभावित करेगी. सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से दाखिल इस अपील में कहा गया है कि कोर्ट देशहित में फैसला दे. सुप्रीम कोर्ट संविधान का रखवाला है और उसके फैसले में बहुसांस्कृतिक और अनेक धर्मों वाली संस्कृति की झलक मिलनी चाहिए. भविष्य की पीढ़ियां इस फैसले को कैसे देखेंगी, इसका भी ध्यान फैसले में रखा जाना चाहिए.

अदालत के फैसले तथ्यों पर होते हैं भावनाओं पर नहीं. सुप्रीम कोर्ट संविधान का रखवाला है. ये बात कोर्ट को याद दिलाने का मुस्लिम पक्ष का शायद कोई मकसद रहा हो जो कि इस केस में स्पष्ट तो नहीं होता है. मुख्य मांग उसकी भी जमीन पर कब्जे की है लेकिन मोल्डिंग ऑफ रिलीफ में मुस्लिम पक्ष एक भावुक अपील कर रहा है जो कि अपने आप में अमूर्त किस्म की है. ये केस किसी छोटी-मोटी अदालत में नहीं संविधान पीठ में चल रहा है और मुख्य न्यायाधीश समेत पीठ में पांच जजों ने सवा महीने इसकी सुनवाई की है.

संविधान पीठ को फैसला देते वक्त संविधान के मूल्यों का उपदेश देना कितनी युक्तिसंगत बात है ये तो फैसला आने पर ही पता चलेगा. लेकिन इतना तो तय है कि मुस्लिम पक्ष ने तथ्यों के साथ भावुक अपील भी कर दी है. अदालत के फैसले तथ्यों और गवाहों पर आधारित होते हैं. इस मामले में सीधे कोई गवाह है नहीं. तथ्यों के नाम पर ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्य हैं. भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट है जो कि केस में एक अहम सुबूत कही जा सकती है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विवादित जमीन को तीन भागों में बांटा था जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील हुई और हिंदू-मुस्लिम पक्ष ने पूरी जमीन का मालिकाना हक मांगा है.

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