युवाओं का हल्ला बोलः जॉब चाहिए, जुमला नहीं!

आर्थिक रूप से पिछड़ों को 10 फीसदी आरक्षण देकर भाजपा ने कोटा कार्ड खेल दिया है. भाजपा के दिग्गज अपनी पीठ थपथपाते नहीं थक रहे. लेकिन पिछले साल के बेरोजगारी के आंकड़े असल तस्वीर दिखाते हैं. मौजूदा वक्त में बेरोजगारी की बढ़ी हुई दर कुछ और ही कहानी कर रहे हैं.

युवाओं का हल्ला बोल
संध्या द्विवेदी
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  • 15 जनवरी 2019,
  • अपडेटेड 7:01 PM IST

आर्थिक रूप से पिछड़ों को 10 फीसदी आरक्षण देकर भाजपा ने कोटा कार्ड खेल दिया है. भाजपा के दिग्गज अपनी पीठ थपथपाते नहीं थक रहे. तो अब कोई गरीब बेरोजगार नहीं रहेगा! खुशी मिली इतनी की मन में न समाए! लेकिन आंकड़ों की तिरछी नजर पड़ते ही खुशी काफूर हो गई. क्योंकि पिछले साल के बेरोजगारी के आंकड़े असल तस्वीर दिखाते हैं. जनवरी 2018 में बेरोजगारी की दर जहां 5.07 थी वहीं दिसंबर आते आते यह तकरीबन 2 प्वाइंट गिरकर 7.38 हो गई. नया साल तो अभी-अभी शुरू ही हुआ है और बेरोजगारी का औसत आंकड़ा कुछ प्वाइंट बढ़कर 7.53 हो गया.

हर साल तकरीबन एक करोड़ लोग रोजगार पाने वालों की कतार में शामिल हो जाते हैं. तो अगर इन आंकड़ों को मोटे तौर पर भी देखें तो युवाओं को रोजगार देने के लिए आरक्षण की नहीं बल्कि खाली पड़े पदों को भरने की जरूरत है. अवसरों को बढ़ाने की जरूरत है. भर्तियों की प्रक्रिया समय सीमा के भीतर पूरा करने की जरूरत है. इन्हीं सब मांगों को लेकर देशभर के युवाओं ने ‘युवा हल्ला बोल’ बैनर तले दिल्ली में अपनी आवाज उठाने का फैसला कर लिया है. इस बैनर से अब तक करीब 50 से भी ज्यादा ऐसे संगठन जुड़ चुके हैं.  

इस मर्ज की दवा आरक्षण नहीं

स्वराज इंडिया से जुड़े आशुतोष कहते हैं, ‘‘नौकरियों की भारी कमी, खाली पड़े पद, परीक्षा में घपलेबाजी और रिक्रूटमेंट प्रक्रिया की समय सीमा का तय न होना बेरोजगारी की असल वजहें हैं.’’ वे कहते हैं, बेरोजगारी का जमीनी हल चाहिए और सरकार सियासी समाधान दे रही है. सरकार अगर खुद मशक्कत नहीं करना चाहती तो न सही. अब हम बेरोजगारी की असल वजहों को रेखांकित करेंगे और समाधान भी सुझाएंगे. 

27 जनवरी को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में युवा सम्मेलन होगा. जिसमें बेरोजगारी के मुद्दे और देशभर में चयन आयोगों और भर्ती बोर्डों के घपलों के खिलाफ लड़ रहे 50 से ज्यादा संगठनों के प्रतिनिधि इसमें शामिल होंगे. 

युवा संगठनों की चार मांगेः

1) खाली पड़े पदों को जल्दी भरा जाएः केंद्र और राज्यों के मिलाकर देशभर में 24 लाख से ज्यादा सरकारी पद खाली पड़े हैं. प्राइमरी और सेंकेंड्री शिक्षकों के कुल 11 लाख, पुलिस के साढ़े पांच लाख पद इसमें शामिल हैं.

2) चयन प्रक्रिया बिना भेदभाव और घपलेबाजी वाली होः चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और साफ-सुथरा बनाने के लिए एक एक्सपर्ट कमिटी की मांग भी इस बैनर तले की गई है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग मानते हुए तीन सदस्यीय कमिटी के गठन का आदेश दिया है. एक्सपर्ट के रूप में नंदन नीलकेणी, विजय भाटकर का नाम तय किया जा चुका है. एक नाम संगठन की तरफ से मांगा गया है. बैनर तले काम कर रहे युवाओं का मानना है कि खासतौर पर ऑनलाइन परीक्षा में जमकर घपलेबाजी होती है. कई ऐसे सॉफ्टवेयर बन चुके हैं जो एक जगह पर बैठे विद्यार्थी की स्क्रीन को एक्सेस कर सकते हैं. ऐसे में एग्जाम किसी एक सरकारी एजेंसी के जिम्मे ही होने चाहिए. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) भारत सरकार की सॉफ्टवेयर कंपनी है. पारदर्शी प्रक्रिया के लिए इस एजेंसी को ही जिम्मा सौंपना चाहिए.

3) मॉडल एक्जामिनेशन कोड लागू किया जाएः मॉडल एग्जामिनेशन कोड लागू करवाने के दो मकसद हैं. एक तो भर्ती की प्रक्रिया की समय-सीमा तय हो और दूसरे प्रक्रिया में पाई जाने वाली अनियमितताओं पर भी रोक लगे. हल्ला बोल संगठन की टीम ने सभी परीक्षाओं को ध्यान में रखते हुए भर्ती प्रक्रिया को नौ महीने की समय-सीमा में बांधने की मांग की है. साथ ही भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर रोक लगाने की मांग भी की है. जैसे वैकेंसी का विज्ञापन आने के बाद फार्म भरने के लिए 20 दिन का समय तय हो. अगले एक महीने में एडमिट कार्ड जारी कर दिया जाए. एग्जामिनेशन सेंटर सौ किलोमीटर की दूरी पर हो. एडमिट कार्ड जारी होने के बाद प्री 15 दिनों के भीतर हो जाना चाहिए. 

4) इन परीक्षाओं में हो पेपर लीक और घपलेबाजी की जांचः स्टाफ सेलेक्शन कमीशन सीजीएल, एसएससी सीएचएसएलइ-2017, रेलवे रिक्रूटमेंट, बिहार एसएससी परीक्षा, यूपीएसएसएससी परीक्षा, गुजरात कॉन्सटेबल, गांव विकास अधिकारी, 69 हजार असिस्टेंट टीचर, यूपी, नेशनल डिफेंस एकेडमी, राज्यसभा असिस्टेंट, इंडियन एअरफोर्स सेलेक्शन.

5) मुफ्त हो परीक्षा फीस और एप्लीकेशन फार्मः संगठन से जुडे अनुपम बताते हैं, एक फार्म भरने में औसतन 400-500 रु. का खर्च आता है. लाखों में एप्लीकेशन फार्म भरे जाते हैं और सैकड़ों में चयन होता है. बेरोजगार युवा के लिए सबसे बड़ा खर्च तो फार्म भरने का ही होता है. सरकार अगर बेरोजगार युवाओं की मदद करना चाहती है तो फिर फार्म और परीक्षा दोनों मुफ्त होने चाहिए.

युवा हल्लाबोल के बैनर तले अब तक 55 युवा पंचायतें देश भर में की जा चुकी हैं. इन पंचायतों के जरिए युवाओं को इस मुहिम से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है. आम चुनाव होने में मुश्किल से तीन महीने बाकी हैं. ऐसे में किसानों की नाराजगी झेल रही सरकार के सामने युवाओं के गुस्से को ठंडा करना बड़ी चुनौती होगी. 

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