इरफान खान को सेट पर खुश करके रखते थे-दीपक डोबरियाल

दीपक डोबरियाल हिंदी पट्टी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं. थिएटर करने वाले दीपक ने मकबूल से सिनेमा में कदम रखा. उन्होंने ओमकारा, मकबूल और तनु वेड्स मनु जैसी कई फिल्मों में ऐसे किरदार किए जिसके लिए वो जाने जाते हैं. हिंदी मीडियम के बाद अंग्रेजी मीडियम में भी वो इरफान खान के साथ दिखेंगे. मुंबई में नवीन कुमार के साथ बातचीत में दीपक डोबरियाल ने इरफान खान के अलावा कुछ जज्बाती बातें भी की हैं, पेश हैं-

दीपक डोबरियाल
नवीन कुमार
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  • 12 मार्च 2020,
  • अपडेटेड 3:57 PM IST

हिंदी मीडियम के बाद अंग्रेजी मीडियम में क्या सिर्फ भाषा का माध्यम बदला है या कुछ और है?

बात तो शिक्षा को लेकर ही है. लेकिन इसमें कुछ गंभीर बातें भी हैं जो आपको सोचने पर मजबूर करेगी कि शिक्षा संस्थान तो अपने देश में भी हैं. लेकिन ऐसी क्या बात है कि लड़की लंदन में ही पढ़ना चाहती है.

देश में शिक्षा के स्तर को लेकर आप क्या सोचते हैं?

देश में शिक्षा के स्तर को नेता और बिजनेसमैन ने खराब कर दिया है. राजनीतिक संरक्षण में शिक्षा माफिया समानांतर शैक्षणिक संस्थान कोचिंग के नाम पर चला रहा है. यह बिजनेस है जो शिक्षा को तहस-नहस कर रहा है. चुनावी खर्चों को खत्म करके उस पैसे का उपयोग शिक्षा में किया जाए तो युवाओं का भला हो सकता है. कोचिंग की दूकानों को तो पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए.

कैंसर का इलाज करके लौटे इरफान खान के साथ इस फिल्म में काम करते हुए उनके व्यक्तित्व में क्या बदलाव देखा?

इरफान भाई के साथ मैंने हिंदी मीडियम में भी काम किया था. लेकिन अंग्रेजी मीडियम में शूटिंग के दौरान माहौल बिल्कुल बदला हुआ था. इस बार उनके परफार्मेंस में प्रवाह अलग है. हम सारे ऐक्टर अपने किरदारों में ज्यादा मेहनत के साथ घुसे ताकि ऐक्टिंग का सारा बोझ इरफान भाई पर न रहे. उनकी फिलॉस्फी है. उनका नजरिया जो सोसायटी के प्रति वो महसूस करते हैं, वो सब दिखता है.

सेट पर उनके साथ को-स्टार्स ने किस तरह से तब्दीली रखी थी?

वो तब्दीली ऐसी थी कि उन्हें ऑफ स्क्रीन इंटरटेन करके रखना था. मैं, पंकज त्रिपाठी, रणवीर शौरी हम सब उन्हें हंसाकर रखते थे. डायरेक्टर होमी का निर्देश था कि जब तक इरफान न बोलें रेडी, कोई नहीं बोलेगा कि हम रेडी हैं. हंसने के बाद वो बोलते थे कि करें क्या ये सीन. तब शूट होता था. वो कमेस्ट्री फिल्म में भी दिखेगी.

आप कई सालों से काम कर रहे हैं. क्या आपको अपने मन का काम मिलता है?

मन का काम अभी तक तो कुछ भी नहीं आया है. हमारे यहां राइटर्स का अकाल पड़ा हुआ है. अंग्रेजी मीडियम की बात छोड़ दीजिए. अब भी कई राइटर्स लीड रोल पर ही सारा ध्यान रखते हैं. लेकिन कुछ राइटर हैं जो मेरे और पंकज त्रिपाठी जैसे कैरेकटर पर भी ध्यान देते हैं. लेकिन अभी भी ऐसे और राइटर्स की जरूरत है.

कोई ऐसी फिल्म जो चली नहीं हो. लेकिन उसमें आपको काम करके तसल्ली मिली हो?

ऐसी एक फिल्म है लाल कप्तान. इसकी शूटिंग राजस्थान में हुई थी. हमने जी-जान से मेहनत की थी. यह फिल्म नहीं चली. लेकिन मेरे काम को लोगों ने सराहा तो मन को थोड़ी तसल्ली मिलती है कि चलो मेहनत सफल रही.

आपने नामचीन कैंप और डाइरेक्टरों के साथ काम करके उनसे दूरी क्यों बना ली?

मैंने विशाल भारद्वाज, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, अनुराग कश्यप, रामगोपाल वर्मा के साथ काम किया. लेकिन मैं किसी कैंप के साथ चिपके रहना नहीं चाहता था. मैं स्क्रिप्ट, कहानी और डाइरेक्टर के साथ ही रहना चाहता था. इससे वो लोग मुझसे नाराज हो गए. लेकिन मैं अपनी शर्तों पर भी यहां टिका हुआ हूं. मुझे खुशी है कि जिन लोगों ने मुझे समझा उसमें से निखिल अडवाणी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, दिनेश विजन, आनंद राय ने मुझे अच्छी स्क्रिप्ट के लिए बुलाया है.

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