कलाविहीन समाज, सभ्यता तो क्रूर होगी ही: अमीर चंद

संस्कार भारती के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री 54 वर्षीय अमीर चंद ने कुछ 'कठिन' सवालों के भी बेबाकी से जवाब दिए.

संस्कार भारती के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री अमीर चंद
शिवकेश मिश्र
  • नई दिल्ली,
  • 17 अप्रैल 2017,
  • अपडेटेड 1:44 PM IST

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद बढ़े कद और जिम्मेदारियों के लिहाज से जो कुछ नाम प्रमुखता से उभरे हैं, उनमें एक चेहरा संस्कार भारती के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री 54 वर्षीय अमीर चंद का भी है. वे 32 वर्ष से आरएसएस के प्रचारक हैं. केंद्रीय और अब तो दसियों राज्यों में भी सांस्कृतिक संस्थानों के शीर्ष पदों और समितियों की सैकड़ों नियुक्तियों के दौरान उनकी राय बेहद अहम मानी जाती रही है. हाल ही में शिवकेश के साथ 2-3 मुलाकातों में उन्होंने कुछ 'कठिन' सवालों के भी बेबाकी से जवाब दिएःसवालः संस्कार भारती की ओर से आप एक प्रतिनिधिमंडल लेकर प्रधानमंत्री से मिलने वाले थे. किन मुद्दों पर बात होनी थी?जवाबः मुलाकात अभी होनी है. प्रधानमंत्री तात्कालिक और दीर्घकालिक योजनाओं के हिमायती हैं. आज एक सांस्कृतिक परिवेश का होना बहुत जरूरी है. बात सांस्कृतिक नीति को लेकर होगी.सवालः संस्कार भारती, आरएसएस का सांस्कृतिक एजेंडा क्या है?जवाबः संस्कार भारती का मानना है कि कला ही जीवन है. सौ साल पहले इसे ट्विस्ट करके कह दिया गया कि कला कला के लिए है. इससे हमारी मतभिन्नता है. भारत की मिट्टी से उपजी प्रदर्शनकारी और चाक्षुष कलाओं में यह दर्शन छिपा है कि हमारी कृतियों से आम जन को आनंद मिले, न कि वे आहत हों. यहां तो किसान, मजदूर भी थकने के बाद रात को गाकर, नाचकर हल्के हो जाते हैं. कलाविहीन व्यक्ति, समाज, सभ्यता क्रूर होगी ही. आज जिन संस्कृतियों में कला पर पाबंदी है, वहीं समस्या बढ़ रही है. अमेरिका आतंकवाद से निबटने पर इतना खर्च कर रहा है. इसकी बजाए वह उन इलाकों में कला को प्रोत्साहित करवाए या वहां जो कलाकर्म में लगे हैं, वे करते रहें, इसी का इंतजाम करवा दे तो ज्यादा भला होगा. देखिए, अकबर कला प्रेमी था, उसके दरबार में कलाओं का सम्मान था. वहीं औरंगजेब को और उसके बारे में जनता की राय देखिए.सवालः कला का वास्ता तो संवेदनाओं से है.जवाबः पूर्वोत्तर में रहते हुए एक बार मैं पासी घाट (अरुणाचल प्रदेश) में स्नातक की एक छात्रा से मिलने गया. वहां मैं उसके कलरफुल करघे को छूने लगा तो उसने रोक दिया, कहा कि आप पुरुष हैं. हमारी संस्कृति में पुरुषों का काम शिकार करना और संकट आने पर लडऩा है. अगर वो यह कला का काम करने लगा तो ज्यादा संवेदनशील हो जाएगा, अपना मूल काम कर पाने में उसे दिक्कत आएगी.सवालः पर देश के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा पिछले दिनों अक्सर विवादास्पद वक्तव्यों से बखेड़ा खड़ा करते रहे. आप लोगों ने इस पर उन्हें कुछ समझाने की जरूरत नहीं समझी?जवाबः वे जन प्रतिनिधि हैं. हमसे पहले जनता ने ही उन्हें समझा दिया. जनता से बड़ी कोई पाठशाला नहीं. कला में जिस तरह से श्रोताओं-दर्शकों की प्रतिक्रिया पैमाना है, उसी तरह से राजनीति में जनता भी महसूस करा देती है कि जन प्रतिनिधि कहां गलत या सही कर रहा है.सवालः दक्षिणपंथी सोच में खासकर मुसलमानों के प्रति इतनी नफरत का भाव आखिर क्यों रहता है?जवाबः यह धारणा गलत है. और ये दक्षिणपंथी-वामपंथी जुमले 100-150 वर्षों की उपज हैं. भारत में कभी ऐसी खेमेबाजी रही ही नहीं. ऐसा जान-बूझकर किया गया है. अब जैसे-जैसे राष्ट्रवाद का सूर्य प्रखर होगा, यह धारणा गलत साबित होगी.सवालः देश के शीर्षस्थ चित्रकारों में से एक एम.एफ. हुसैन और फिल्मकार दीपा मेहता के खिलाफ 'सफल' आंदोलन की जमीन तैयार करने का श्रेय संघ परिवार में सांस्कृतिक प्रशासक, नाटककार डी.पी. सिन्हा को दिया जाता रहा है. अब पुरस्कार वापसी के खिलाफ अनुपम खेर को आगे करके मुहिम चलाने के पीछे आपका नाम आया. इसका श्रेय लेते हैं आप?जवाबः पुरस्कार वापसी के मुद्दे पर देश को यह लगा कि दुनिया में भारत की जो साख बन रही है, यह उस पर बट्टा लगाने का एक षड्यंत्र है. इसलिए खेर, (मधुर) भंडारकर और (नरेंद्र) कोहली वगैरह की अगुआई में आंदोलन चला. उसमें अंतरधागे के रूप में हमारी भूमिका को श्रेय जाता है तो स्वीकार है.सवालः संघ के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक में आपने परिक्रमा करने वालों को फायदा पहुंचाने की खिंचाई की, बताते हैं. जवाब क्या मिला आपको?जवाबः परिक्रमा वालों पर पराक्रम करने वालों को अहमियत मिलनी ही चाहिए. सच को कभी कोई बाइपास नहीं कर सकता. सच कभी नुक्सान भी नहीं पहुंचाता.सवालः संघ, संस्कृति मंत्रालय, संस्कार भारती, सबके बीच समन्वय कैसे बनाते हैं?जवाबः चूंकि सबके सोचने की दिशा एक है, तो आपस में चर्चाएं होती रहती हैं.सवालः संस्कार भारती की दिल्ली इकाई में एक तबका कलाकारों को अहमियत देने के आपके रवैए के खिलाफ है, बताते हैं.जवाबः उनकी समझ कम है, ऐसा मान लीजिए. वैसे भी परिवर्तन में बल लगता है, समय लगता है. उतना धैर्य तो रखना पड़ेगा.सवालः आपके पसंदीदा लेखक कौन हैं?जवाबः ज्यादा पढ़ नहीं पाता पर महादेवी वर्मा का गद्य मुझे बहुत पसंद है.

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