एक मंदिर की महागाथा

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण तो अब हकीकत बनने जा रहा है, जिससे 30 साल लंबा जद्दोजहद भले सुलझ गया हो, मगर अभी कई सवाल हल होने बाकी.

व्यवस्था चुस्त (ऊपर) शिलान्यास स्थल की तैयारियों का जायजा लेते मुख्यमंत्री आदित्यनाथ; (नीचे बाएं)
आशीष मिश्र
  • नई दिल्ली,
  • 05 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 8:29 PM IST

लखनऊ-गोरखपुर राजमार्ग से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित रामघाट पर, राम जन्मभूमि न्यास की कार्यशाला में पत्थरों पर चोट करते हथौड़ी-छेनी की आवाज गूंज रही है. यहां अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशने का काम पिछले 28 साल से चल रहा है. शिलाओं, उन्हें इसी नाम से जाना जाता है, पर वर्षों से गंदगी और काई जमा हो गई है और यहां तक कि यह कार्यशाला खुद एक अस्थायी पुलिस शिविर बन गई.

हालांकि, नवंबर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया, तो यहां फिर से चहल-पहल बढ़ गई है. पत्थरों को पॉलिश करके एकदम नए जैसा चमका दिया गया है और उन्हें कार्यशाला के प्रवेश द्वार पर कतारबद्ध रख दिया गया है. ये नए राम मंदिर निर्माण स्थल तक पहुंचाए जाने के लिए तैयार हैं. शेष पत्थरों को अब निर्माण स्थल पर ही तराशा जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार केंद्र ने इस साल 5 फरवरी को 15-सदस्यीय श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया, और इस प्रकार मंदिर निर्माण की प्रक्रिया को गति मिली. इस साल 18 जुलाई को ट्रस्ट ने राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को एक प्रस्ताव भेजा. उसमें समारोह के लिए दो तारीखों—3 अगस्त और 5 का सुझाव दिया गया. पीएमओ ने 5 अगस्त को चुना. यह ऐसी तारीख है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए विशेष राजनैतिक महत्व रखती है. पिछले साल इसी तारीख को केंद्र ने अनुच्छेद 370 को बेमानी करके जम्मू-कश्मीर को मिला विशेष राज्य का दर्जा वापस ले लिया.

1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने और अयोध्या में अस्थाई राम मंदिर निर्माण के बाद यह पहला अवसर होगा जब कोई प्रधानमंत्री रामलला विराजमान के दर्शन करेंगे.

कोरोना वायरस महामारी के कारण किसी भी भव्य कार्यक्रम पर प्रतिबंध होने के बावजूद आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार शिलान्यास को सफल बनाने में जुटी है. लेकिन देश इस 'ऐतिहासिक’ क्षण का जब गवाह बनने जा रहा है, कई लोगों के दिमाग में कुछ जरूरी सवाल घुमड़ रहे हैं.

मोदी और मंदिर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक वक्त अपने गुरु लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के मुख्य सारथी भले रहे हों, मगर उन्होंने केंद्र में अपनी सत्ता के पिछले छह वर्षों मंल राम मंदिर के मुद्दे से सुरक्षित दूरी बनाए रखी. यहां तक कि अयोध्या में अपनी दो यात्राओं के दौरान उन्होंने 'विवादित स्थल’ की यात्रा से परहेज किया. अपने पहले कार्यकाल के आखिरी महीनों में, उन्होंने राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए संवैधानिक रास्ता अपनाने की मांग भी ठुकरा दी थी.

दिसंबर 2018 के आसपास की बात है जब विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव में भाजपा को 230 से कम सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही थी. राम मंदिर पर कानून बनाने के लिए पार्टी का प्रधानमंत्री पर जबरदस्त दबाव था. लेकिन प्रधानमंत्री टस से मस नहीं हुए और कहा कि चुनाव करीब हैं इसलिए इस मुद्दे पर कोई भी सांप्रदायिक टकराव ठीक नहीं होगा.

यहां तक कि जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में फैसला सुनाया, तो प्रधानमंत्री ने मंदिर निर्माण की बजाए राष्ट्र निर्माण के बारे में अधिक बात की और अपील की कि सभी अदालत के फैसले का सम्मान करें. लेकिन इससे कोई इनकार नहीं कि इस परियोजना के सबसे बड़े लाभार्थी प्रधानमंत्री ही होंगे. मंदिर का निर्माण पूरा करने का लक्ष्य 2024 में रखा गया है और उसी साल देश में अगले आम चुनाव होंगे. महामारी के दौर में भी मंदिर निर्माण शुरू करने की जल्दबाजी के पीछे यही वजह है.

अयोध्या के बाद काशी और मथुरा?

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के अनुकूल फैसले के बाद, कहा जाता है कि प्रधानमंत्री ने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जैसे संघ परिवार के कट्टर संगठनों को समझाने के लिए कड़ी मशक्कत की कि अतिउत्साह में काशी और मथुरा के मुद्दों को उछालने से परहेज करें. इन दोनों जगहों के मुद्दे भी हिंदुत्ववादी संगठनों के एजेंडे में लगातार रहे हैं.

हालांकि, अब भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या उग्र हिंदुत्ववादी तत्व इतनी आसानी से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को मान लेंगे कि देश में पूजा स्थल के स्वामित्व का अब कोई मुद्दा नहीं उठाया जाएगा? आलोचकों का यह भी मानना है कि 5 अगस्त को राम मंदिर निर्माण का काम शुरू करने का संघ परिवार का फैसला राजनैतिक कारणों से प्रेरित है. दरअसल महामारी को संभालने, बिगड़ती आर्थिक स्थिति और सीमा पर चीनी घुसपैठ जैसे मुद्दों को लेकर हो रही भाजपा की आलोचना से ध्यान हटाने के लिए यह समय चुना गया है. लेकिन विहिप के महासचिव मिलिंद परांडे इसका खंडन करते हैं. उनका कहना है कि 2024 तक मंदिर निर्माण पूरा करने का लक्ष्य ही एकमात्र वजह है. वे कहते हैं, ''कोरोना वायरस के कारण शिलान्यास समारोह में पहले ही देर हो चुकी है और इस तरह तो निर्माण कार्य मुश्किल में फंस सकता है.’’

भाजपा का पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी काशी और मथुरा को इतनी आसानी से छोड़ने को तैयार नहीं है. इस साल की शुरुआत में आरएसएस की एक बैठक में, कुछ वरिष्ठ नेताओं ने काशी और मथुरा के मुद्दे को उठाया और कहा कि इसे भी धीरे-धीरे बढ़ाने की अनुमति दी जा सकती है. उन्होंने पूर्व आरएसएस प्रमुख दिवंगत राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया के 1997 के एक भाषण का भी हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदुत्व की भावनाओं के लिहाज से काशी और मथुरा अयोध्या से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले में काशी और मथुरा के मुद्दों पर विराम लगा दिया गया है, संघ परिवार के सूत्रों का कहना है कि नेतृत्व इस बात से खुश है कि इसने धर्मनिरपेक्षता की बहस के दरवाजे खोले हैं. वे इसे देश में समान नागरिक संहिता कानून के लिए कदम बढ़ने के एक अवसर के रूप में देखते हैं. फैसले में धर्मनिरपेक्षता को संविधान की बुनियादी संरचना के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसे संघ एक नए धर्मनिरपेक्ष तानेबाने की तरह परिभाषित कर रहा है और उसे ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ के खात्मे की शुरुआत समझ रहा है.

योगी के दिन खिले

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उत्तर प्रदेश के मुख्ययमंत्री योगी आदित्यनाथ को वापस मंदिर के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है. उनके गुरु दिवंगत महंत अवैद्यनाथ, जो गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर थे, ने देशभर के धर्माचार्यों को राम जन्मभूमि के मुद्दे पर एकजुट करने के लिए 1984 में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया था. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाने में कारसेवकों की अगुआई अवैद्यनाथ भी कर रहे थे. 1990 के दशक से ही गोरखपुर वाकई राम जन्मभूमि आंदोलन का केंद्र रहा है, जहां के पीठाधीश्वर अब आदित्यनाथ हैं. मार्च 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद आदित्यनाथ 20 बार अयोध्या पहुंचे हैं. अपने कार्यकाल के कुछ ही महीने बाद उन्होंने फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया था.

भूमि पूजन की तिथि घोषित होने के बाद से मुख्यमंत्री इसमें काफी सक्रिय हो गए हैं. 25 जुलाई को तैयारियों का जायजा लेने के लिए आदित्यनाथ अयोध्या के कारसेवकपुरम पहुंचे. उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के अधिकारियों और विहिप के कुछेक नेताओं से बातचीत की और लार्सन ऐंड टुब्रो के अधिकारियों (मंदिर निर्माण का ठेका इसी कंपनी को मिला है) को शिलान्यास दिवस से पहले 69 हेक्टेयर के राम जन्मभूमि परिसर को समतल करने का काम पूरा करने को कहा. मुख्यमंत्री ने उन सुरक्षा निगरानी टावरों को भी हटाने का आदेश दे दिया है, जो दशकों से उस जगह की पहचान बने रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में दो साल से भी कम का समय शेष है और अयोध्या में मंदिर निर्माण राजनैतिक रूप से योगी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. भाजपा ने उस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है. पार्टी देशभर में 15 अगस्त से राम मंदिर और अनुच्छेद 370 को बेमानी करके जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने का जश्न मनाने का अभियान शुरू कर रही है.

इस दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठकें होंगी और सभाएं की जाएंगी. लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर बृजेश कुमार कहते हैं, ''मार्च 2022 में जब उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव होंगे, राम मंदिर निर्माण कार्य कम से कम 50 प्रतिशत पूरा हो चुका होगा. आदित्यनाथ और भाजपा, लोगों को यह बताने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे कि अगर सरकार बदलती है तो मंदिर निर्माण पर असर पड़ सकता है.’’

मंदिर निर्माण परियोजना

अयोध्या में राम मंदिर के लिए मॉडल तय करने की दिशा में पहला कदम 27 मई, 1992 को उठाया गया, जब विहिप नेता अशोक सिंघल ने अहमदाबाद के वास्तुकार चंद्रकांत सोमपुरा के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किए. सोमपुरा परिवार ने भारत और विदेश में कई भव्य मंदिरों का निर्माण किया है—चंद्रकांत के दादा प्रभाशंकर सोमपुरा 1951 में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य में जुटे वास्तुकारों में से एक थे. चंद्रकांत की उम्र अधिक होने (वे 78 वर्ष के हैं) के कारण उनके छोटे पुत्र आशीष अयोध्या परियोजना के प्रभारी हैं.

हालांकि मंदिर के डिजाइन में कोई बड़ा बदलाव तो नहीं किया गया है, लेकिन 17 जुलाई को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट की बैठक के बाद से इसका आकार दोगुना (देखें ग्राफिक) कर दिया गया है. आशीष बताते हैं, ‘‘इसके कुल क्षेत्रफल को बढ़ाने के लिए मंदिर का आकार बड़ा किया गया है. इसकी ऊंचाई में वृद्धि हुई है और एक अतिरिक्त मंजिल भी जोड़ दी गई है.’’ जहां तक लागत की बात है, उसका आकलन और गणना अभी की जा रही है. आशीष कहते हैं, ‘‘पुराने डिजाइन में अनुमानित खर्च 80 करोड़ रुपए था. लेकिन तब पत्थर 50 रुपए प्रति घन फुट की दर से उपलब्ध था. अब दाम 500 रुपए प्रति घन फुट से अधिक है. लागत गणना में इस सभी बातों का फर्क पड़ेगा.’’ उन्हें निर्माण के लक्ष्य की अवधि तक पूरा होने में कोई संदेह नहीं है. वे यह भी बताते हैं कि दरअसल ‘‘पहली मंजिल की दीवारों के लिए पत्थर की कटाई और नक्काशी पहले से ही की जा चुकी है.’’

मंदिर परियोजना अपने साथ अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्रों के लिए भरपूर सौगात लेकर आई है. अयोध्या के विधायक वेद प्रकाश गुप्ता कहते हैं, ‘‘133 करोड़ रुपए की परियोजनाओं पर काम चल रहा है.’’ इनमें 40 करोड़ रुपए की लागत वाला एक अयोध्या बाइपास और अयोध्या को चित्रकूट से जोडऩे वाला एक 165 किमी लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग भी शामिल है.

अयोध्या की 8,000 मुस्लिम आबादी भी आशा से भरी दिखती है. राम जन्मभूमि परिसर के आसपास के बेगमपुरा, दोराही कुआं, रामकोट और विभीषणकुंड जैसे क्षेत्रों में फैले मुसलमान पिछले तीन दशकों से कड़ी सुरक्षा के साए में रह रहे हैं, और अगर मंदिर के निर्माण से उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं तो इससे उन्हें बड़ी राहत मिलेगी. मंदिर परिसर के पास शाह आलमगीर मस्जिद के इमाम हाजी अखलाक कहते हैं, ‘‘अयोध्या का मुस्लिम समुदाय, मस्जिद विवाद पर अब पूर्ण विराम चाहता है.’’ बेगमपुरा इलाके में रहने वाले लगभग 200 मुस्लिम परिवार फूल उगाते हैं. जैसा कि फूल उगाने वालों में से एक मोहम्मद अकरम कहते हैं, ''राम मंदिर में फूलों की माला की मांग बढऩी चाहिए; इससे हमें फायदा होगा.’’

बेशक, अगर मंदिर निर्माण से मुस्लिम समुदाय भी लाभान्वित होता है, तो पिछले कुछ दशकों की उथल-पुथल से शायद निजात मिल जाएगा. हालांकि इसकी राजनैतिक फसल काटने पर तो राज्य और केंद्र दोनों में भाजपा की ही नजर है. 

पिछले छह साल से प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर मुद्दे से सुरक्षित दूरी बनाए रखी है

भव्य वास्तुकला

मंदिर की नई योजना हर लिहाज से काफी बड़ी

अग्र भाग

चौड़ाई 235 फुट

84,600

वर्ग फुट

पाश्व भाग

लंबाई 360 फुट

नया निर्माण रकबा होगा, जो पहले के 37,590 वर्ग फुट से लगभग दोगुना है

50,000

लोग अब मंदिर में एक साथ पूजा-अर्चना कर सकेंगे

राम मंदिर नागर शैली में बनेगा, जिसमें गर्भ गृह अष्टïकोणीय होगा

नए डिजाइन में एक शिखर और पांच मंडप होंगे, जैसे गूढ़ मंडप के साथ नृत्य, रंग, प्रार्थना और कीर्तन मंडप होंगे

मंदिर में अब तीन मंजिल होगी. रामलला पहली मंजिल पर होंगे, दूसरी मंजिल पर राम दरबार होगा और तीसरी मंजिल पर खुला हॉल होगा

मंदिर की वास्तुकला के हिसाब से उसके 17 पहलू होंगे शिखर, गर्भगृह, कलश, गोपुरम, रथ, उरुशृंगा, मंडप, अर्द्धमंडप, जागती, स्तंभ, परिक्रमा, सुकंठ, तोरण, अंतराल, गवाक्ष, अमलक और अधिष्ठान

मुख्य मंदिर गुलाबी पत्थर से बना होगा. समूचे मंदिर में 3.25 लाख घन फुट पत्थर लगेगा. इसमें लोहे का इस्तेमाल नहीं होगा

परिसर में पेड़-पौधे वही होंगे, जिनका वाल्मिकी रामायण में जिक्र है. इनमें चंदन, अगारु, आम, अशोक, महुआ, टुंग और केदार के वृक्ष शामिल हैं

‘‘यह विरले गौरव की बात है कि मेरे परिवार को आजाद भारत में सोमनाथ और अयोध्या के दो सबसे ऌप्रसिद्घ और महत्वपूर्ण मंदिरों की डिजाइन करने का मौका मिला.’’

चंद्रकांत सोमपुरा

‘‘अयोध्या मंदिर के आर्किटेक्ट उनके दादा प्रभाशंकर सोमपुरा 1951 में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की परियोजना से जुड़े थे’’

इससे तो शायद ही कोई इनकार करे कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ

के लिए मार्च 2022 के विधानसभा चुनावों में राम मंदिर वरदान साबित हो सकता है

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