शातिर चीन का फौलादी हमला

हिमालय पर सियासी और सैन्य युक्तियों से बांहें मरोडऩे की शी जिनपिंग की युक्ति फिलहाल उलझी. लेकिन चीन की कूटनीतिक मंशा न पढ़ पाना भारत के लिए चिंता की बात.

हवाई प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तरी क्षेत्र के आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल वाइ.के. जो
संदीप उन्नीथन
  • नई दिल्ली,
  • 05 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 11:36 PM IST

पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच हिमालयी गतिरोध चौथे महीने में प्रवेश कर चुका है और भारतीय सशस्त्र बल अब भी हाइ अलर्ट पर हैं. बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता 28 जुलाई को संकेत देते दिखाई दिए कि संकट समाप्त हो चुका है. उन्होंने कहा कि भारतीय और चीनी सैन्य दस्ते ‘‘सरहद के ज्यादातर हिस्सों में पूरी तरह पीछे हट गए’’ हैं.

उनका आशय यह था कि वे उन ज्यादातर इलाकों से पीछे चले गए हैं जहां एकदम आमने-सामने टकराव की स्थिति में आ गए थे. हालांकि भारतीय रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि जमीनी स्थिति में बदलाव नहीं आया है. चीनी गलवान घाटी और गश्त चौकी 15 से पीछे हटे हैं, लेकिन गोगरा और हॉट स्प्रिंग्ज इलाके में नहीं. सर्वाधिक झगड़े की जड़ है पैंगोंग लेक की फिंगर 5 और 8 के बीच चीनी सेना की मौजूदगी. दोनों सेनाओं के बीच कमांडर स्तर की वार्ता में इसी पर जिच पैदा हो गई थी. पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने वहां पीछे हटने से मना कर दिया है.

इस बीच भारत ने चीन को पीछे हटने और 5 मई से पहले की जमीनी स्थिति बहाल करने पर मजबूर करने को कूटनीतिक, आर्थिक और सियासी, पूरा जोर लगा दिया. उसने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान सरीखे समान विचार वाले देशों की सहायता ली. मसलन, उसने अमेरिकी यूएसएस निमित्ज कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के साथ 21 जुलाई को नौसैन्य अभ्यास किया और हिंद महासागर में, जहां से चीन के तेल के जहाज गुजरते हैं, भारतीय नौसेना की तैनाती की. साथ ही, भारतीय बाजार में चीनी स्मार्टफोन ऐप पर रोक लगाने सरीखे आर्थिक प्रतिबंध लगाए.

इस सबका फौरी नतीजा जो हो, भारत और चीन अपने रिश्तों में तीन दशकों के सबसे बड़े बदलाव से गुजर रहे हैं. 1988 में राजीव गांधी बीजिंग की यात्रा पर गए थे और वहां दोनों देशों ने सीमा विवादों का समाधान खोजने को संयुक्त कार्य समूह बनाया था. संबंधों को नए सिरे से तय करने की यह जरूरत इसलिए आन पड़ी क्योंकि हालिया घटनाओं की वजह से नई दिल्ली को एहसास हुआ कि पूर्वी लद्दाख में स्थिति को खतरे की कगार तक धकेलने की चीन की पैंतरेबाजी ताइवान से लेकर दक्षिण चीन सागर तक उसकी तमाम सीमाओं के इर्द-गिर्द घट रही घटनाओं से अलग नहीं है.

सचाइयों से बचने और मुद्दे को टालने वाली कूटनीतिक लफ्फाजी से भरे चाहे जितने बयान बीजिंग ने जारी किए हों, तथ्य यह है कि चीन की लड़ाकू आक्रामकता अप्रैल के आखिरी दिनों में जबरदस्त सैन्य लामबंदी के साथ शुरू हो गई थी; विडंबना यह कि दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की यह 70वीं जयंती है. पूर्वी लद्दाख में 840 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर यह सैन्य लामबंदी सेंट्रल मिलिटरी कमीशन के चेयरमैन और फौजी वर्दी में खुलेआम सामने आने वाले पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दोटूक स्वीकृति के बगैर मुमकिन नहीं हो सकती थी.

भारतीय खुफिया सूत्र जून की शुरुआत में चीन के संयुक्त युद्ध कमान केंद्र की तरफ वीवीआइपी उड़ानों की तादाद में भारी बढ़ोतरी की तरफ इशारा करते हैं. बीजिंग से 20 किमी उत्तरपश्चिम में स्थित यह केंद्र पीएलए का गढ़ है. उनका कहना है कि टकरावों के वक्त के आसपास ऐसा होना गहरा संकेत है कि शी का इरादा चीनी संसद नेशनल पीपल्स कांग्रेस के मई के आखिर में समाप्त तीसरे सत्र के बाद सरहद पर घटनाओं की शुरुआत करने का था.

किस तरह जमीन पर उतरा पीएलए का गेमप्लान

अप्रैल के आखिर में जब भारत में राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन दूसरे महीने की तरफ बढ़ रहा था, पीएलए तिब्बत के पठार पर मॉक वॉरगेम यानी पूर्ण युद्ध अभ्यासों को अंजाम दे रही थी. चीन कई साल से अपने सैन्य दस्तों को 15,000 फुट से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित तिब्बती पठार पर युद्ध की बेहद मुश्किल हकीकतों से दोचार करवाता रहा था. वहां हवा के विरल होने का मतलब है कि लड़ाकू विमान पूरा ईंधन और हथियारों का वजन लेकर नहीं उड़ सकते और तोपों से निकला गोला-बारूद ठीक उसी रास्ते नहीं जाता जैसा वह मैदानों में जाता है.

इन सैन्य अभ्यासों के जोश और रफ्तार में 2016 से तेजी आई थी. यही वक्त था जब चीन ने सिक्यांग और तिब्बत सैन्य जिलों को मिलाकर एक विशाल पश्चिमी थिएटर कमांड (डब्ल्यूटीसी) बनाया था. यह उन व्यापक सुधारों का हिस्सा था जिन्हें शी ने पीएलए में अंजाम दिया था और जो चीन के इतिहास में सबसे बड़े सुधार थे. 2,30,000 सैनिकों और 157 युद्धक विमानों के साथ डब्ल्यूटीसी चीन की सबसे बड़ी सैन्य कमान बन गई, जो तेजी से तैनाती में सक्षम होने के साथ फुर्तीली और मशीनों से सुसज्जित ताकत की शक्ल में पीएलए के कायापलट में बेहद अहम थी.

2013 में शी के राष्ट्रपति के रूप में आगमन के बाद चीन ने एलएसी के इर्द-गिर्द घुसपैठें बढ़ा दी थीं. पैदल और वाहन-सवार गश्ती दल जमीनों पर अपना दावा करने लगे. यह 2006 में ही शुरू हो गया था. उससे पहले चीन ने तिब्बती पठार में 36,000 मील से ज्यादा लंबी डामर वाली सड़कें बना ली थीं, किंघाई-तिब्बत रेलवे का काम पूरा कर लिया था. इससे भी अहम, सहायक सड़कें बना ली थीं, जिनसे उसके सैन्य दस्ते एलएसी तक आ सकते थे. शी के मातहत घुसपैठें बड़े गतिरोधों में बदल गईं. इनमें 2013 में डेप्सांग और 2014 में चुमार के गतिरोध सबसे बड़े थे.

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 6 जनवरी 2020 को रिपोर्ट छापी कि ‘युद्धाभ्यासों के दौरान ल्हासा से लेकर सरहद के अग्रिम रक्षा मोर्चों तक पूरे इलाके में 4,000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर ले जाकर हेलिकॉप्टर, हथियारबंद वाहन, भारी गोला-बारूद और विमानरोधी मिसाइलें तैनात कर दी गईं.’ इन अभ्यासों का मकसद साफ था—इस पठार पर चीन का सामना जिस एकमात्र दुश्मन भारत से है, उसके साथ युद्ध की तैयारी करना.

पीएलए का हरेक अभ्यास उन दुश्मनों के साथ, जिन्होंने 'पहाड़ी दर्रों पर कब्जा’ कर लिया है, लड़ाई की सिम्युलेट यानी मिलती-जुलती परिस्थितियों में किया गया और इसमें हल्के टैंक से लेकर सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर तक तमाम किस्म के युद्ध के साजो-सामान शामिल थे, जिन्हें बेहद ऊंचे इलाकों में लड़ाई के लिए अधिकतम क्षमता तक अनुकूल बनाया गया. यह भी एक वजह है कि भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान इन अभ्यासों पर हर साल कड़ी नजर रखता रहा है.

लेकिन सैन्य अभ्यास असली लामबंदी पर पर्दा डालने का असरदार तरीका भी हैं, वर्ना सामान्य हालात में तो हथियारबंद वाहनों और लड़ाकू विमानों की इतनी जबरदस्त आवाजाही से सरहद के इस पार खतरे की घंटियां बज उठतीं. इंडिया टुडे ने सैन्य और खुफिया अफसरों के साथ मिलकर पीएलए की पूरी योजना को समझा जो इस प्रकार है.

अप्रैल के आखिरी दिनों में मोटरों से सुसज्जित दो पैदल डिवीजन यानी ट्रकों और हथियारबंद गाडिय़ों में सवार सैनिक, जो होटन में युद्धाभ्यासरत थे, अभ्यास वाले इलाके से निकलकर एलएसी पर पश्चिमी तिब्बत हाइवे के नाम से भी जाने जाने वाले जी 219 की तरफ नीचे बढ़ने लगे. इनमें दक्षिण सिक्यांग मिलिटरी डिवीजन की 6 मैकेनाइज्ड इंफैंट्री डिवीजन और 4 हाइलैंड मोटराइज्ड इंफैंट्री डिवीजन शामिल थीं. अक्साइ चिन हाइवे से एलएसी की दूरी 115-155 किमी है, जहां दो पहाड़ी दर्रों को पार करके 12 घंटे ड्राइव कर पहुंच सकते हैं.

सैनिकों ने जल्द ही मोर्चा संभाल लिया. अगला चरण अप्रैल के आखिर और मई की शुरुआत में परवान चढ़ा. पीएलए की छोटी-छोटी टुकडिय़ां एलएसी के इर्द-गिर्द आगे बढ़ीं और उन्होंने पूर्वी लद्दाख में कई जगहों पर अस्थायी कैंप बना लिए. ये कैंप तकरीबन एक साथ गोगरा, हॉट स्प्रिंग्ज, डेप्सांग, गलवान घाटी और पैंगोंग लेक सरीखी जगहों पर अचानक उभर आए, जो इन जगहों के चीनी भूभाग होने का दावा था.

यह उस ‘फॉरवर्ड नीति’ का ही भिन्न रूप था, जिसका इस्तेमाल भारत ने 1962 की जंग से पहले किया था. यह गजब का सैन्य छल और चालाकी भी थी और इस मिश्रित लामबंदी योजना में भिन्न किस्म की चीजें—युद्धाभ्यास और घुसपैठ—जोड़ दी गई थीं. सैन्य दस्तों की तैनाती नाकाबंदी का कदम था, ताकि घुसपैठ को भारतीय सेना के हाथों सैन्यबल से उखाड़ फेंकने से बचाया जा सके.

शुरुआती जड़ता के बाद भारत की प्रतिक्रिया पूर्वी लद्दाख में अपनी ताकत बढ़ाना थी. मई के आखिर तक उसने दो डिवीजन या करीब 30,000 सैनिक और दो हथियारबंद ब्रिगेड और उनके साथ 180 टैंक ताबड़तोड़ पूर्वी लद्दाख में पहुंचाने शुरू कर दिए. वायु सेना ने हेलिकॉप्टर गनशिप और लड़ाकू विमानों की तैनाती की और टैंकों को हवाई रास्ते से पहुंचाने के लिए भारी वजनवाहक विमान काम में लिए. चीन की हरकत ने 1996 के शांति समझौते के हरेक प्रावधान की धज्जियां उड़ा दीं.

भारत का राजनैतिक, कूटनीतिक और सुरक्षा प्रतिष्ठान कयास ही लगाता रह गया कि चीन की मंशा क्या और उसकी इस एकाएक आक्रामकता की वजह क्या है—9 अगस्त को जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटना, भारत का सरहद पर सड़क निर्माण में तेजी लाना या उसका शी की बेल्ट ऐंड रोड पहल में शामिल न होना, जिसे शायद चीन ने अपना तिरस्कार और भारत की भूल माना हो. तैनाती की अंतिम स्थिति बिल्कुल साफ थी. यह एलएसी को बदलने की खुल्लमखुल्ला कोशिश भर नहीं थी, उससे भी ज्यादा यह 3,448 किमी लंबी सरहदी पट्टी पर सियासी और सैन्य युक्तियों से जोर-जबरदस्ती का जबरदस्त खेल था.

कैबिनेट सचिवालय में पूर्व अतिरिक्त सचिव और चाइना सेंटर फॉर एनालिसिस ऐंड स्ट्रैटजी के प्रेसीडेंट जयदेव रानाडे कहते हैं, ‘‘इस ऑपरेशन की योजना बनाने में महीनों का वक्त लगा होगा. यह 'भारत को सबक सिखाने’ की शी की योजना का हिस्सा था. अपने आकलन में वे शायद मानकर चल रहे होंगे हमारी तरफ से प्रतिक्रिया नहीं होगी.’’ एलएसी के पार चढ़ाई के लिए दो डिवीजन नाकाफी थीं; इसके लिए पीएलए को कम से कम छह डिवीजन की जरूरत होती.

इतना बल तो केवल उस काम के लिए काफी था जिसे पूर्व डीजी, आर्टिलरी, लेफ्टिनेंट जनरल पी. रविशंकर ''युद्ध से बचने की आक्रामकता’’ कहते हैं. वाहन, टैंक और तोपखाना बाकायदा व्यवस्थित जगह पर नहीं रखा गया बल्कि खुले में छोड़ दिया गया, जो उपग्रहों से साफ देखा जा सकता था. भारतीय विश्लेषक इसका यह अर्थ निकाल रहे हैं कि चीन की मंशा संदेश देने की थी, धावा बोलने की नहीं.

तो क्या इसमें कोई खुफिया नाकामी थी?

सेना के अफसर इससे इनकार करते हुए कहते हैं कि वे चीनी सैनिकों की आवाजाही पर लगातार नजर गड़ाए थे. तभी तो आमने-सामने टकराव हुए. वे कहते हैं, ‘‘हमने उन्हें रोका और वापस भेज दिया. यह (कि हमें उनकी तैनाती का पता न था) सही नहीं.’’ सेना के एक बड़े अफसर कहते हैं, ‘‘हम जानते थे कि वे अञ्जयास के इलाके में थे. हर साल (आते थे) और सीबीएम के मुताबिक लौट जाएंगे. यह भरोसा और विश्वास तोडऩा है.

हम भी (अभ्यास) करते हैं, पर हम (एलएसी पर) जाकर बैठ नहीं जाते. उसने तमाम समझौते हवा में उड़ा दिए.’’ एक और अफसर बताते हैं, ‘‘सैन्य दस्तों की आवाजाही को मानवरहित हवाई वाहनों ने देखा. (चीनी) टैंक और होवित्जर उनके गहराई वाले इलाकों में हैं (अग्रिम मोर्चों से कई किमी दूर), लेकिन पीएलके की टुकडिय़ों से भरे ट्रक तेजी से एलएसी की ओर बढ़े. चीनी सैनिकों के जमावड़े का मुकाबला करने को भारतीय सेना भी तेजी से लामबंद हुई. चीनी गलवान घाटी में घुसपैठ की कोशिश कर रहे थे. वहां उनकी कोई सड़क नहीं है. 5 मई को चीनी सैन्य दस्ते श्योक और गलवान नदियों की तरफ बढ़े और उन्हें रोकने की कोशिश में भारतीय सैनिकों का उनसे टकराव हुआ.’’

भारतीय और चीनी टुकडिय़ों के बीच पहला टकराव 5 मई की शाम को और फिर दूसरा 9 मई को उत्तर सिक्किम के नाथु ला में हुआ. उसके बाद 15 मई को ज्यादा बड़ा टकराव पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे पर फिंगर 4 पर हुआ, जब चीनी सेना हथियारबंद सैनिक वाहनों और ट्रकों के साथ आई और उसने फिंगर 4 और 8 के बीच उन्हें तैनात कर दिया. (फिंगर या अंगुली झील की ओर जाने वाले पहाड़ी रास्ते हैं.) एक सूत्र बताते हैं, ''चीनियों ने फिंगर 4 और 8 के बीच 1999 में एक सड़क बना ली थी. भारतीय सैनिक फिंगर 8 तक गश्त भले लगाते रहे हों, पर केवल फिंगर 4 तक की जमीन उनके पास है.

चीनियों ने फिंगर 4 तक सड़क बना ली थी और उन्हें अपने बेस से, जो बमुश्किल 10 किमी दूर सिरिजाप में है, लॉजिस्टिक्स की ज्यादा आसान पहुंच हासिल है.’’ चीनी सैनिकों ने भारतीय सैन्य टुकडिय़ों को अपने गश्ती बिंदुओं तक पहुंचने से रोका और दोनों के बीच हाथापाई हो गई. हाथापाई की घटनाएं पहले ज्यादा होती थीं, हालांकि वे एक जगह तक सीमित रहती थीं. मई के मध्य तक भी सेना ने इसे साधारण से ज्यादा कुछ नहीं माना—या सार्वजनिक तौर पर नहीं बताया कि ऐसा हुआ है.

सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाणे ने 14 मई को मीडिया को बताया, ‘‘यह बात बहुत स्पष्ट है कि ये दोनों घटनाएं न तो आपस में जुड़ी हैं और न ही इनका दूसरी वैश्विक या स्थानीय गतिविधियों से वास्ता है. सभी घटनाओं को स्थापित प्रक्रिया... स्थापित प्रोटोकॉल और वुहान तथा मामल्लापुरम शिखर सम्मेलनों के बाद प्रधानमंत्री के दिए गए रणनीतिक दिशानिर्देशों के मुताबिक संभाला जाता है.’’ ठीक एक महीने बाद 15 जून को गलवान में जानलेवा टकराव हुआ. 16 बिहार रेजीमेंट के कमांडिंग अफसर कर्नल बी. संतोष बाबू और 19 भारतीय सैनिकों के अलावा अज्ञात संक्चया में चीनी सैनिक मारे गए.

जम्मू के मैदानों से लेकर उत्तराखंड की सीमा के नजदीक ऊबडख़ाबड़ बेहद ऊंचाई पर स्थित रेगिस्तानों तक घोड़े की नाल के आकार जैसी 2,000 किमी लंबी भूभागीय पट्टी की रखवाली का जिम्मा सेना की ऊधमपुर स्थित नॉर्दन कमान के कंधों पर है. इस सैन्य कमान के पास लेह स्थित 14 कोर है, जिनमें से एक डिवीजन पाकिस्तान का सामना करती है और दूसरी चीन का. जमीन पर सेना की अपनी खुफिया क्षमताएं एलएसी पर 50 किमी की छोटी-सी पट्टी तक सीमित हैं.

वह एलएसी की निगरानी जमीन पर लगे सेंसर, रणनीतिक ड्रोन, सीमा के उस पार जासूस और पैदल गश्त के जरिए कर सकती है. ‘‘अगर वे अपने गहराई वाले इलाके में कुछ कर रहे हैं, तो हमें कैसे पता चलेगा?’’ एक पूर्व उत्तरी सैन्य कमांडर कहते हैं कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि एलएसी के लिए समर्पित ‘24 घंटे की सतत निगरानी क्षमता’ वाला उपग्रह नहीं है. तकनीकी खुफिया जानकारी से आवाजाही तो पकड़ में आ जाएगी पर दुश्मन की मंशा की निगरानी और इस तरह सैन्य दुस्साहस की पूर्व चेतावनी का काम कहीं पेचीदा है.

इस मामले में यह काम दिल्ली की तमाम एजेंसियों की भूलभुलैया ने किया. बाहरी खुफिया जानकारियां जुटाने का विशिष्ट काम भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च ऐंड एनैलिसिस विंग (आरऐंडएडब्ल्यू या रॉ) का है. यह जासूसी विमानों और विदेशी एजेंटों से जानकारी इकट्ठा करती है. एनटीआरओ (राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन) के पास जासूसी और निगरानी उपग्रह हैं और यह कंप्यूटरों के जरिए खुफिया जानकारी जुटाता है.

केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के मातहत डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के पास एक डिफेंस इमेज प्रोसेसिंग ऐंड एनालिसिस सेंटर है, जिसे उपग्रह और जासूसी विमानों से प्राप्त तस्वीरों के विश्लेषण का काम सौंपा गया है. यह सारी खुफिया जानकारी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (एनएससीएस) के पास आती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के मातहत है. एनएससीएस के पास एक ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमेटी (जेआइसी) हुआ करती थी, जो खुफिया जानकारी का मिलान करके सुरक्षा प्रतिष्ठान के 29 पतों पर साप्ताहिक आकलन भेजा करती थी.

इस जेआइसी को 2014 में भंग कर दिया गया और जीआइसी के कामों को अंजाम देने के लिए एनएससीएस को नए सिरे से संगठित करके इसके मातहत चार शाखाएं बना दी गईं. यह पता नहीं है कि एसएससीएस ने सेना को ज्यादा बड़े पैमाने पर हुई तैनातियों के बारे में चेतावनी दी या नहीं (एनएसए के दक्रतर को उनकी टिप्पणी के लिए भेजे गए निवेदन का जवाब नहीं मिला). एनएससीएस के एक पूर्व सदस्य स्वीकारते हैं, ‘‘हमारे पास यह देखने की क्षमता नहीं है कि मुक्का पडऩे वाला है. हम उन खुफिया जानकारियों के विश्लेषण में कमजोर हैं, जो धैर्य के साथ चीर-फाड़ करने के लिए हमारे पास आती हैं.’’

जून आते-आते साफ था कि वुहान और मामल्लापुरम की भावना तार-तार हो चुकी है. चीनी पक्ष ने बहुत-से शांति समझौतों का उल्लंघन किया था और उसके कूटनीतिज्ञों की जुबानों से घिसी-पिटी बातें उगली जा रही थीं. 3 जुलाई को लद्दाख में निमु से सैन्य दस्तों का निराक्षण करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन या राष्ट्रपति शी का नाम लिए बगैर कहा कि ‘‘विस्तारवाद का युग समाप्त हो चुका है.’’

मुश्किल से 48 घंटे से कुछ ज्यादा वक्त बाद एनएसए डोभाल ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से बात की और उसके बाद दोनों पक्ष लद्दाख में सरहद पर पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू करने को राजी हो गए. भारत ने बड़ी कामयाबी बताते हुए बढ़-चढ़कर इसका डंका पीटा, पर महीने भर बाद यह और भले कुछ भी लगे, कामयाबी तो नहीं लगती. पीएलए जहां है, वहीं है, और लंबी, अंधेरी लड़ाई के लिए डटा हुआ है.

—साथ में, गौरव सी. सावंत

पीएलए सैनिकों के दल अप्रैल के आखिर और मई के शुरू में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कई जगह आगे बढ़ आए और गलवान वैली समेत कई जगहों पर अपने अस्थायी कैंप स्थापित कर लिए

चीन पिछले कई वर्षों से ऊंचे ठिकानों पर विषम परिस्थितियों में लोहा लेने के इरादे से अपने सैनिकों को तैयार करता आ रहा है.

भिड़ंत की भूमिका भारतीय और चीनी सैनिक मई में संवाद करते हुए; 15 जून को गलवान वैली में गुत्थमगुत्था

पहला चरण

सालाना सैन्य अभ्यास

1 जनवरी-अप्रैल

पीएलए के दक्षिणी सिक्यांग सैन्य जिले के दो या अधिक बख्तरबंद डिवीजनों ने होटन में अपना अभ्यास शुरू किया. ये अभ्यास पिछले कुछ सालों से नियमित रूप से हो रहे थे. इसमें बाकी चीजों के साथ हल्के टैंक और स्वचालित तोपखाने शामिल थे और इसके साथ ही ‘दुश्मन’ के कब्जे वाले पर्वतीय दर्रों को अपने ‘कब्जे’ में लेने का भी अभ्यास किया गया

और इस तरह आ घुसा ड्रैगन

अप्रैल के आखिरी हफ्ते में पीएलए ने अपने सालाना अभ्यास की कवायदों में से एक को पूर्वी लद्दाख में पूरे साजो-सामान के साथ सैन्य तैनाती में बदल दिया. यह भारत और चीन के बीच 1962 के युद्ध के बाद से सबसे बड़ी तनातनी की शुरुआत थी. उसने इस तरह दिया करतूत को अंजाम:

दूसरा चरण

यूं घुमाया रास्ता

अप्रैल का आखिरी हफ्ता

दो डिवीजन फौजें होटन के अभ्यास क्षेत्र से अलग होकर एलएसी की तरफ बढ़ीं. वे जी219 से फीडर सड़कों या वेस्टर्न हाइवे के जरिए एलएसी की ओर आगे बढ़ीं जो सिक्यांग को तिब्बत के साथ जोड़ती है. इसमें उन्हें कुछ दिन लग गए

तीसरा चरण

लो, आ जमें अप्रैल के अंत में

दोनों डिवीजन एलएसी पर कई जगहों पर रास्ता रोकने के अंदाज में आ डटीं

चौथा चरण

घुसपैठ

मई की शुरुआत

चीनी फौजियों ने एलएसी के साथ कई स्थानों पर आगे बढऩा शुरू किया—डेप्सांग मैदान, गोगरा, हॉट स्प्रिंग्स, गलवान वैली और पेंगांग त्सो में फिंगर 4 तक

भारतीय फौज की प्रतिक्रिया

बराबरी की तैनाती

मध्य मई

भारतीय टुकडिय़ों और पीएलए के सैनिकों के बीच कई जगहों पर झड़पें हुईं. 5 मई को जनरल एम.एम. नरवाणे ने कहा कि इन झड़पों का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं.

भारतीय सेना को एहसास हुआ कि पीएलए की तैनाती चीन की सेना की किसी भी तरह की वापसी को रोकने के लिए है. बातचीत की शुरुआत, 15 जून को गलवान में खूनी झड़प.

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