भगवा पार्टी रिझाने लगी अल्पसंख्यक को

केंद्र में सत्ता तक पहुंचने के लिए केरल की प्रभावशाली सीरियन चर्च और पिछड़ी हिंदू जातियों को लुभाने के लिए बीजेपी ने कस ली है कमर. लेकिन क्या सफल होगी वह?

एम.जी. राधाकृष्णन
  • त्रिवेंद्रम,
  • 21 जनवरी 2014,
  • अपडेटेड 4:07 PM IST

इस नए साल पर केरल में ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था. राज्य के प्रभावशाली मलंकरा सीरियन चर्च के दोनों संघर्षरत गुटों के पादरियों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की.उनसे मिलने पहुंचे प्रदेश बीजेपी नेताओं से मुलाकात के बाद पादरियों ने कहा कि बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार में उन्हें कोई ऐसी बात नजर नहीं आती जिस पर एतराज जताया जाए.मलंकरा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च (एमओएससी) के प्रमुख कैथोलिकोस बैसेलियोस मार थोमा पॉलोज द्वितीय ने 23 दिसंबर को कोट्टायम स्थित एमओएससी मुख्यालय पर संवावदाताओं से यह कहकर मोदी को क्रिसमस का उपहार दिया, ''हालांकि मोदी की नॉन-सेक्युलर के तौर पर बहुत आलोचना की जाती है, पर गुजरात के हमारे समुदाय के सदस्यों को उनसे कोई शिकायत नहीं है.उनमें से ज्यादातर व्यापारी हैं और कहते हैं कि मोदी व्यापार समर्थक हैं.” 25 लाख सदस्यों वाला एमओएससी समृद्ध और पारंपरिक रूप से कांग्रेस समर्थक चर्च है. 8 जनवरी को राष्ट्रीय सचिव पी.के. कृष्णदास के नेतृत्व में बीजेपी की एक टीम ने दूसरे गुट मलंकरा सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च (एमएसओसी) के मुखिया मेट्रोपॉलिटन थॉमस मास थेमोथियोस से मुलाकात की तो उन्होंने कहा, ''मजबूत इरादों वाले प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सक्षम प्रशासन देश के लिए बेहद जरूरी है.”लगभग 35 लाख सदस्यों वाले केरल के सबसे बड़े ईसाई समूह कैथोलिक और अन्य संप्रदायों ने अभी तक मोदी पर जबान नहीं खोली है. जहां सभी चर्च कांग्रेस अथवा केरल कांग्रेस (केसी) की तरफ  झुकाव रखते हैं, वहीं गैर-कैथोलिक (जिनमें सीरियाई प्रमुख हैं) यदा-कदा कांग्रेस से अपना मतभेद जाहिर करते रहते हैं.बीजेपी न तो कभी 140 सदस्यीय केरल विधानसभा की कोई सीट जीत पाई है और न ही प्रदेश की 20 लोकसभा सीटों में से कोई सीट. इसकी मुख्य वजह प्रदेश की आबादी के 42 फीसदी हिस्से का दो अल्पसंख्यक समुदाय-मुसलमान (25 फीसदी) और ईसाई (17 फीसदी)— है.गठबंधन की राजनीति की वजह से महज 5 से 8 फीसदी वोट पाने वाली मुस्लिम लीग और केरल कांग्रेस प्रदेश की राजनीति पर हावी हैं. हालांकि बीजेपी ने हाल के वर्षों में प्रदेश में 5 से 10 फीसदी तक वोट पाए हैं मगर वह कभी कोई सीट नहीं जीत सकी है.केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सबसे ज्यादा 4,000 से ज्यादा शाखाएं लगती हैं जो गुजरात की तीन गुनी हैं. बीजेपी के महासचिव के. सुरेंद्र कहते हैं, ''हमारी चुनावी उपस्थिति हमारी असली ताकत जाहिर नहीं करती.नए सहयोगियों को पाने के हमारे प्रयासों के साथ यह बदल जाएगी.” केरल की दो सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियों सीपीएम और कांगेस ने ईसाइयों पर उमड़े बीजेपी के इस प्रेम पर अभी तक कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है.इधर, बीजेपी ने तमाम पिछड़े हिंदू समूहों के साथ भी नजदीकियां बनाई हैं. पिछले साल अगस्त और सितंबर में एझवा समुदाय के श्री नारायण धर्म परिपाल्यनायोगम (एसएनडीपी) और माता अमृतानंदमयी के मठ में हुए समारोहों में मोदी मुख्य अतिथि थे.अब प्रदेश में अनुसूचित जातियों के सबसे बड़े संगठन केरल पुलया महासभा (केपीएमएस) ने फरवरी में कोच्चि में होने वाले अपने शताब्दी सम्मलेन का उद्घाटन करने के लिए मोदी को आमंत्रित किया है.यह क्रिसमस बीजेपी को केरल में पिछड़ी हिंदू जातियों और ईसाइयों की मदद से तीसरा मोर्चा खड़ा करने के अपने लक्ष्य के और करीब ले आया है, जिससे इस सुदूर दक्षिणी राज्य की राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदल सकती है.

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