भविष्य की कल्पनाः सिलिकॉन का कमाल

अकेले राजनीति ने भारत में तकनीकी प्रगति की दिशा निर्धारित की है और आगामी दशकों में देश 'बिग डेटा' की ओर आकर्षित हो सकता है

इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे
संध्या द्विवेदी
  • नई दिल्ली,
  • 08 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 5:20 PM IST

सन् 1998 में जब स्टैनफर्ड में दो बुद्धिमान स्नातक मिले और उन्होंने वर्ल्ड वाइड वेब को खंगालने वाले कोड को लिखा, उसके काफी पहले भारत अपना गूगल बना चुका था. और यह बात उस 'महान' प्राचीन भारत की नहीं है जब देवताओं की प्लास्टिक सर्जरी होती थी और असुरों के पास पुष्पक विमान होता था. इसका नाम था निकनेट (एनआइसीएनईटी) और यह वास्तव में अस्तित्व में था. इसे नेशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआइसी), नई दिल्ली के उत्साहियों ने विकसित किया था. तकनीकविद् नरसिंहैया शेषगिरि के नेतृत्व में एनआइसी ने 'प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम' राष्ट्रव्यापी डेटाबेस तैयार करवाया था, जिससे देश के किसी भी कोने में भारतीय अधिकारी जिलों के बारे में स्पष्ट और महत्वपूर्ण जानकारी हासिल कर सकते थे.

कोई दो राय नहीं कि इसे शुरुआती अड़चनों का सामना करना पड़ा था—बाबू वर्ग डेटा एंट्री सीखने का अनिच्छुक था, कंप्यूटरों को चलाने के लिए भरोसेमंद विद्युत आपूर्ति की कमी थी, पारदर्शी ई-गवर्नेंस के प्रति राजनैतिक विरोध था और ऐसी ही दूसरी दिक्कतें थीं, फिर भी निकनेट देश के लगभग हर जिले में पहुंच गया था तो इसका कुछ श्रेय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है जिन्होंने कंप्यूटरीकरण पर लगातार बल दिया था. निकनेट के प्रयासों के परिणामस्वरूप देश के पास मापनीय डेटाबेस था, जिसमें सूचनाएं ठसाठस भरी थीं और भारत दुनिया के सामने अपने सामाजिक-आर्थिक आंकड़े रखते हुए अपनी संभावनाओं के द्वार खोलने में सक्षम था. इस तरह, दुनिया के किसी भी सर्वर से जानकारियां निकाल लाने में सक्षम लैरी पेज और सर्जे ब्रिन के अल्गॉरिद्म के सहारे दुनिया का सबसे ताकतवर सर्च इंजन बनने के लगभग एक दशक पहले भारत में 'बिग डेटा' का जन्म हो चुका था.

फिर ऐसा क्यों कि अधिकतर भारतीयों ने निकनेट का नाम ही नहीं सुना है? यह भविष्योन्मुखी नेटवर्क भारतीय शासन गाथा का एक फुटनोट भर बन कर क्यों रह गया? दुखद यह है कि इसके उत्तर का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है—राजनीति. आजादी के बाद से, सिर्फ राजनीति ने ही भारत के तकनीकी उन्नयन की दिशा तय की है और आगामी दशक में भी स्थितियों में कोई बदलाव नहीं होगा.

मजबूत आंतरिक नेटवर्क वाले निकनेट को अपनी सेवाएं सार्वजनिक करने के लिए और सार्वजनिक उपक्रमों तथा निजी व्यवसायों के व्यापक उपभोक्ता वर्ग तक पहुंचने के लिए इंटरनेट की आवश्यकता थी. भारत ने जब 15 अगस्त, 1995 को वाणिज्यिक इंटरनेट के लिए अपने दरवाजे खोले तो निकनेट को भी ऑनलाइन होने की उम्मीदें जगीं. लेकिन तत्कालीन दूरसंचार विभाग और विदेश संचार निगम लिमिटेड (वीएसएनएल) एकल इंटरनेट सेवा प्रदाता बना रहना चाहता था और उसने निकनेट के प्रयासों का पुरजोर विरोध किया. इतिहास में ऐसा अक्सर होता है कि उसके महत्वपूर्ण क्षण छोटे और महत्वहीन विवादों में उलझे होते हैं. शेषगिरि और वीएसएनएल के अध्यक्ष वी.के. सिंगल प्रतिद्वंद्वी थे और एक-दूसरे के इरादों पर गहरा संदेह करते थे. निकनेट-वीएसएनएल सहयोग की संभावना पर चर्चा करने के लिए आयोजित एक बैठक में शेषगिरि ने वीएसएनएल नेतृत्व पर इससे 'असुरक्षित' होने का आरोप लगाया. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इसके जवाब में सिंगल ने शेषगिरि की चिंताओं को 'निरर्थक बकवास' बताया. और, इस तरह दुनिया का पहला 'गूगल' बनने की निकनेट की आकांक्षाओं का अंत हो गया.

आधुनिक भारत में प्रौद्योगिकी की प्रगति को जहर पिलाने वालों में केवल नौकरशाही की आंतरिक प्रतिद्वंद्विताएं ही नहीं हैं, उच्चस्तरीय राजनीति भी इसी जैसी अपराधी थी. 1983 में जब भारत सरकार ने देश की पहली सेमीकंडक्टर बनाने की इकाई स्थापित करने की सोची तो इसका संयंत्र स्थापित करने के स्थान के विकल्पों का चयन छांटते-छांटते मद्रास (अब चेन्नै) या मोहाली तक पहुंच गया. मद्रास स्पष्ट पसंद लग रहा था, क्योंकि वहां कोरोमंडल तट तक आसान पहुंच, पानी की प्रचुर आपूर्ति और बढिय़ा जलवायु की उपलब्धता थी. ऐसा होता तो यह संयंत्र भारत की आइटी क्रांति के मक्का, बेंगलूरू से कुछ घंटे की दूरी पर होता.

लेकिन, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड की स्थापना के लिए मद्रास की बजाए मोहाली को चुना. तत्कालीन प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार जी. पार्थसारथी के अनुसार, ऐसा करने के लिए उनके सहयोगी और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने उनके ऊपर दबाव डाला था. एक हाथ पीठ पर बांध कर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में उतरा सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में ही नहीं था. कुछ साल बाद, एससीएल परिसर में एक रहस्यमयी आग ने भारत को सेमीकंडक्टर हब बनाने की बची-खुची उम्मीदें भी बुझा दीं.

भारतीय गणराज्य की स्थापना के समय से ही तकनीकी प्रगति और राजनीति के कमर से जुड़े होने की बात पर किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए. हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद हमारे देश को आजादी मिली थी. परमाणु युग की संभावनाएं भयानक थीं, लेकिन नए-नए आजाद हुए देशों के लिए इसमें असीम संभावनाएं भी थीं. किसी अर्थव्यवस्था को उन्नत बनाने और किसी राष्ट्र को सुरक्षित करने के लिए रडार और माइक्रोवेव से लेकर डीडीटी और खाद्य प्रसंस्करण तक आज जिन तकनीकों की जरूरत पड़ती है, उनमें से अधिकांश का विकास युद्ध के दौरान हुआ था. भारत को इन तकनीकों की सख्त जरूरत थी, लेकिन देश खुद को स्वतंत्रता संग्राम वाली राजनीति से ठीक से अलग नहीं कर सका था. स्वतंत्रता आंदोलन के अगुआ महात्मा गांधी का मशीनों पर विश्वास नहीं था और उनकी राजनैतिक विरासत को आगे ले जाने वाले जवाहरलाल नेहरू को उच्च तकनीकों से हाथ भर की दूरी बनाकर रखनी पड़ी.

इसके बाद के दशकों में प्रौद्योगिकी के प्रति यह संदेह विभिन्न रूपों में प्रकट हुआ: 1970 के दशक में भारत सरकार ने श्रम संघों का गुस्सा दबाने के लिए सार्वजनिक उपक्रमों में कंप्यूटरीकरण को हतोत्साहित किया. 1972 में श्रम मंत्रालय की ओर से नियुक्त एक समिति ने पाया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि स्वचालन अपनाए जाने के कारण रोजगारों में व्यापक कमी आएगी, लेकिन सरकार फिर भी लोकलुभावनवाद में फंसी रही. मजे की बात है कि रोजमर्रा की राजनीति से अछूते रहे हमारे अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रम इस दौरान मजबूत हुए और देश के लिए गर्व का कारण बने. तब की स्थिति में भारतीयों से उम्मीद की जा रही थी कि वे अपनी निगाहें आसमान की ओर करके अंतरिक्ष प्रक्षेपण की सफलता पर प्रसन्न हों, लेकिन रोजमर्रा के कामकाज के लिए मोटर-चालित बैलगाडिय़ों का इस्तेमाल करें. वी.एस. नायपॉल ने एक मशहूर टिप्पणी में बैलगाडिय़ों के मशीनीकरण को ''संबंधित लोगों के लिए वास्तविकता और उपयोगिता से कटा हुआ मजेदार बौद्धिक कौतुक'' कहा था.

1980 के दशक के उत्तरार्ध में अर्थव्यवस्था का उदारीकरण शुरू होने के बाद ही भारतीयों को उपभोक्ताओं की सुविधा वाली तकनीकों को अपनाने का मौका मिला; चाहे वह वॉशिंग मशीनों के रूप में रहा हो या फिर, रेफ्रिजरेटर, एयर-कंडिशनर, हिताची टीवी, कैसियो घड़ी या सोनी का वॉकमैन. 1991 के सुधारों और वर्तमान के बीच के दशकों में भारत में पर्सनल कंप्यूटर और बाद में मोबाइल टेलीफोन सर्वव्यापी हुए. भारतीय कंपनियों ने पश्चिमी जगत में सहस्राब्दी के बदलाव के साथ आई वाइ2के समस्या से बाधित मशीनों को ठीक करने में मदद की, जिससे उनके राजस्व में वृद्धि हुई और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग में बड़े पैमाने पर दिलचस्पी पैदा हुई. वाइ2के से निपटने में भारतीय हस्तक्षेप संभव होने का कारण सिर्फ यह था कि राजनैतिक वर्ग नए-नए विकसित हो रहे सॉफ्टवेयर निर्यात उद्योग से दूर था. रात में जब देश सोता था तब होने वाले इस काम का उस समय की अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव नहीं था, जिसके चलते उसे विकसित होने का मौका मिल गया.

वर्तमान स्थिति: 2014 में राष्ट्रीय मंच पर नरेंद्र मोदी का उभार भारत के तकनीकी विकास में सुखद समय पर हुआ. चीनी मैन्युफैक्चरिंग में तेजी के परिणामस्वरूप भारत भर में सस्ते मोबाइल फोन का प्रसार हो चुका था; भारतीय प्रौद्योगिकीविदों का दुनिया में सिक्का जम चुका था और सिलिकॉन वैली में भी उन्हें नेतृत्वकारी भूमिकाएं मिलने लगी थीं; 1998 के पोकरण परमाणु परीक्षण के बाद से भारत-अमेरिका संबंधों पर पसरी ठंडक काफी कम हो चुकी थी, जिसके कारण वह नई दिल्ली के लिए उच्च प्रौद्योगिकी के लिए दरवाजे खोल रहा था.

इसीलिए मोदी के 'डिजिटल इंडिया' दृष्टिकोण को सफल बनाने वाले बहुत से कारक मौजूद थे. हालांकि यह सरकार भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही तकनीक में राजनीति घुसेडऩे के रोग से बच नहीं पाई है. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के खिलाफ अहिंसक विरोधों का सामना होने पर इसने मनमानी ताकत के साथ भारत के कुछ हिस्सों में इंटरनेट बंद किया है. बिना किसी कानूनी आधार के इसने विरोध प्रदर्शनों की निगरानी करने के लिए चेहरे की पहचान और मानव रहित ड्रोन जैसी उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल किया है. इसने राजनैतिक परिणामों के डर से आर्थिक आंकड़ों और सार्वजनिक आंकड़ों की शुचिता नष्ट की है. और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में कई पार्टियां आज गलत सूचना अभियानों का सहारा लेती हैं, लेकिन विपक्षियों पर हमला करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्रभावी राजनैतिक शक्ति में बदलने का पाप मूल रूप से भाजपा का ही था. लोगों के मन में मशीनों के प्रति संदेह और अविश्वास की जिन दीवारों को ध्वस्त होने में दशकों लगे थे, इन स्थितियों ने उन्हें एक बार फिर खड़ा कर दिया है.

हमारे जैसे शोर-शराबे वाले लोकतंत्र में तकनीकी उन्नति को राष्ट्रीय राजनीति से साफ-साफ अलग कर पाना वास्तव में असंभव है. वास्तव में, तकनीकी जगत द्वारा अविवेकी तरीके से वैज्ञानिक सफलताओं के इस्तेमाल के फैसलों से देश का नुक्सान ही होगा. आने वाले दशक में समाज का व्यापक रूप से 'सूचनाकरण' होगा: इंटरनेट ऑफ थिंग्स युक्तियों और भावनाओं को पकडऩे में सक्षम मशीनों द्वारा एकत्रित डेटा भंडार से देश की सामाजिक, आर्थिक और रणनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं को गति मिलेगी. आधुनिक मशीनें भारतीयों के एक छोटे और कुलीन समूहों तक सीमित नहीं होंगी—लेकिन इससे खतरा भी बढ़ेगा.

तकनीक का प्रभाव क्षेत्र जितना व्यापक होगा, राजनेता उसकी ओर उतने ही ज्यादा खिंचे आएंगे. यह समय भारतीय उद्यमियों या प्रौद्योगिकीविद् समुदाय की ओर ध्यान देने का नहीं है. वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठों में शामिल हैं और आने वाले तकनीकी व्यवधानों से निपटने में सक्षम हैं. उनकी बजाए भारतीय शासनतंत्र पर ध्यान देने की जरूरत है, जिसके राजनैतिक गुणा-भाग से देश में तकनीकी विकास की संभावनाएं पैदा होंगी या नष्ट होंगी. सात दशकों के बाद अब हमारा शासक वर्ग प्रौद्योगिकी को राजनीति के पहले और सबसे महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में देखने लगा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाला दशक कुछ अलग होगा.

अरुण मोहन सुकुमार टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के द लेचर स्कूल में शोध छात्र और मिडनाइट्स मशीन्स: अ पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ टेक्नोलॉजी इन इंडिया नामक पुस्तक के लेखक हैं. पेशे से अधिवक्ता सुकुमार ने 2015 से 2019 तक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की तकनीकी पहल का नेतृत्व किया है

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