‘इंदिरा गांधी के साथ वे सुनहरे दिन’

नटवर सिंह इंदिरा गांधी के साथ के दिनों को अच्छा मानते हैं. वे अपने सुनहरे दिनों—पाकिस्तान के खिलाफ 1971 के युद्ध से पहले-की घटनाओं को कुछ इस तरह याद करते हैं.

कावेरी बामज़ई
  • नई दिल्ली,
  • 05 अगस्त 2014,
  • अपडेटेड 5:07 PM IST

अक्तूबर (1971) के आखिरी हफ्ते में पोलैंड में पाकिस्तानी राजदूत ने, जो बंगाली थे, मुझसे मिलने के लिए कहा. ज्यादातर पश्चिमी पाकिस्तानियों के विपरीत वे काफी विनम्र और भले इंसान थे. हमारी मुलाकात के दौरान वे यह बताते हुए रो पड़े कि किस तरह पाकिस्तानी फौज, जिसमें 85 फीसदी पंजाबी थे, उनके लोगों पर बेरहमी से जुल्म ढा रही थी. उनके लिए ऐसी सरकार के लिए काम करना नामुमकिन जैसा हो चुका था, जो पूर्वी पाकिस्तान में अपने ही लोगों को मौत के घाट उतार रही थी. मैंने उनसे कहा कि हमें उनके लोगों के साथ पूरी सहानुभूति है और बिलाशक हम जो कुछ मदद कर सकते हैं, वे बेहद सावधानीपूर्वक कर रहे हैं और शायद आगे भी करते रहेंगे.राजदूत हाल ही में जेनेवा में आयोजित पाकिस्तानी राजदूतों की बैठक में हिस्सा ले चुके थे. वहां चर्चा का मुख्य विषय पूर्वी पाकिस्तान की घटनाएं और उसमें भारत की भूमिका को लेकर था. लेकिन वे वहां हुई चर्चा से खुश नहीं थे. राजदूत बशीर ने मुझे एक बड़ा-सा लिफाफा थमाया. उन्होंने कहा, “यह जेनेवा की बैठक का रिकॉर्ड है. कृपया आप इसे अपनी प्रधानमंत्री को भेज दें. वे आपको बेहतर समझती हैं. उनसे कहें कि मेरे लोगों की रक्षा करें.” मैं यह सुनकर अवाक रह गया. यह असाधारण और असंभव-सी लगने वाली घटना थी. गौर कीजिए कि पाकिस्तान का कोई राजदूत बेहद गोपनीय दस्तावेज भारत के राजदूत को सौंप रहा था. इस तरह की बातें सिर्फ जासूसी कहानियों में ही पढऩे को मिलती हैं, हकीकत में ऐसा नहीं सुना जाता. मैंने राजदूत महोदय को भरोसा दिलाया कि यह रिपोर्ट हफ्ते के अंत तक हमारे प्रधानमंत्री तक पहुंच जाएगी. मैंने सोच-समझकर वह रिपोर्ट सीधे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भेजी, न कि विदेश मंत्रालय को, जहां वह एक मेज से दूसरे मेज तक घूमती ही रह जाती. कुछ दिन बाद एक नाटकीय घटना हुई. राजदूत देर रात मेरे निवास पर आए. मैं देख सकता था कि वे कितने परेशान थे. बिना समय गंवाए उन्होंने कहा, “यह सिफर कोड है, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तानी राजदूत करते हैं.” मैं हैरान था, क्योंकि यह मंत्रालय को पहुंचाने के लिए अति गोपनीय कुंजी होती है. दूतावास में सिर्फ दो लोगों के पास यह कोड होता हैः मिशन का प्रमुख और सिफर असिस्टेंट. मैं पाकिस्तानी सिफर कोड खुद ही दिल्ली ले गया और उसे रॉ (आरएडब्ल्यू) के प्रमुख रामेश्वर नाथ काव को सौंप दिया. काव एक कुशल खुफिया एजेंट थे, जिनका नाम कम लोग ही जानते थे और चेहरे से तो गिने-चुने लोग ही उन्हें पहचान पाते थे.

Read more!

RECOMMENDED