पश्चिम बंगालः राह बनाती भाजपा

झारग्राम में भाजपा और निर्दलीयों ने कुल मिलाकर 399 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी को केवल 371 सीटों पर संतोष करना पड़ा. भाजपा राज्य भर में 18 प्रतिशत वोट हासिल करके टीएमसी की मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है.

राजनैतिक हिंसा के खिलाफ कोलकाता में प्रदर्शन करता भाजपा का महिला मोर्चा
मंजीत ठाकुर/संध्या द्विवेदी
  • नई दिल्ली,
  • 26 जून 2018,
  • अपडेटेड 3:30 PM IST

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह 27 जून को पश्चिम बंगाल के दौरे पर जाने वाले हैं और वे पुरुलिया में विशेष रूप से रुकेंगे, जहां हालिया पंचायत चुनावों में पार्टी को अपने लिए मजबूत जमीन देखने को मिली. यह आदिवासी जिलों झारग्राम और मिदनापुर के निकट है.

यहां सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को मिली 726 सीटों के मुकाबले भाजपा को 602 सीटें मिली थीं. झारग्राम में भाजपा और निर्दलीयों ने कुल मिलाकर 399 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी को केवल 371 सीटों पर संतोष करना पड़ा. भाजपा राज्य भर में 18 प्रतिशत वोट हासिल करके टीएमसी की मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है.

कभी ताकतवर रहे वाम मोर्चा और कांग्रेस को क्रमशः 4.5 और 3.3 प्रतिशत वोट ही मिले. भाजपा के नेता इन नतीजों से काफी उत्साहित हैं. उनका नारा—"एबार बंगाल'' यानी इस बार बंगाल, सच भी साबित हो सकता है.

2013 में पंचायत  की कुल सीटों की महज 18 प्रतिशत सीटों पर ही उम्मीदवार खड़े करने वाली भाजपा ने इस साल पंचायत की 58,000 सीटों की 48 प्रतिशत सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे. पार्टी ने वाम मोर्चा और कांग्रेस को मिलाकर, उससे भी ज्यादा उम्मीदवार उतारे थे. 2013 में भाजपा को जहां एक भी सीट नहीं मिली थी, इस बार 5,500 सीटें मिली हैं.

पार्टी महासचिव सायंतन बसु कहते हैं कि पार्टी ने खुद को टीएमसी के असली विकल्प के तौर पर साबित किया है. वे कहते हैं, "हमने तमाम कठिनाइयों के बावजूद तृणमूल से टक्कर ली.''

भाजपा को ज्यादा सफलता वाम मोर्चा के तेजी से सिकुड़ते जनाधार के कारण मिली है. वाम मोर्चा के नेता जमीन पर पार्टी में भगदड़ की पुष्टि करते हैं. पश्चिम मिदनापुर में माकपा के एक नेता अपना नाम गुप्त रखने के अनुरोध पर कहते हैं, "हमारे कम से कम 70 प्रतिशत नेता और कार्यकर्ता झारग्राम, पुरुलिया और बांकुरा में या तो भाजपा के उम्मीदवार बन गए हैं या उनके उम्मीदवारों के साथ चले गए हैं.''

कांग्रेस नेता अब्दुल मन्नान कहते हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भाजपा दोनों ही मिलकर बंगाल के धर्मनिरपेक्ष चरित्र तो तबाह करने में जुटी हैं. वे कहते हैं, "वे (ममता बनर्जी) अपनी पार्टी तोडऩे वाली नीतियों के जरिए धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं.'' बसु इस बात की खिल्ली उड़ाते हैं, "कांग्रेस और वाम मोर्चा को जनता ने एक के बाद एक चुनाव में खारिज कर दिया है. लोग अपना वोट बर्बाद करना नहीं चाहते हैं.''

पंचायत चुनावों में कई जिलों में टीएमसी विरोधी वोट भाजपा के पीछे एकत्र हो गए. सियासी विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में यह नए राजनैतिक समीकरण की शुरुआत है.

चुनाव आयोग से संबंधित एक अधिकारी कहते हैं, "जिन जगहों पर भारी मतदान—85 से 90 प्रतिशत तक—हुआ और जहां मतदान पत्रों को लेकर सबसे कम शिकायतें मिलीं, वहां नतीजा विपक्ष, खासकर भाजपा के पक्ष में गया.'' आयोग के कठोर नियमों को देखते हुए आगामी आम चुनावों में चीजें भाजपा के पक्ष में जा सकती हैं.

संघ, बजरंग दल और विहिप के हजारों कैडरों के साथ भाजपा अपनी संगठनात्मक ताकत से टीएमसी का मुकाबला कर सकती है. क्या प्रदेश भाजपा बंगाल में लोकसभा की 22 (42 सीटों में से) सीटें जीतने के अमित शाह के लक्ष्य को हकीकत में बदल पाएगी?

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