यह शो रुकना नहीं चाहिए

जब तक यूएई में टूर्नामेंट की मेजबानी के लिए जरूरी अनुमति मिली, आइपीएल पर एक और संकट छा गया—चीनी कंपनी विवो 2020 के टूर्नामेंट का स्पॉन्सर बनने के वादे से पलट गई

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aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 11 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 11:11 PM IST

दुनियाभर में महामारी फैलने लगी तो सरकारें लॉकडाउन के लिए मजबूर हुईं. क्रिकेट खेलने वाले देशों के बीच संपर्क टूट गया था, इसलिए क्रिकेट में व्यवधान आना लाजिमी था. क्रिकेट बोर्ड से लेकर खिलाडिय़ों और मैच प्रसारकों से लेकर प्रायोजकों और प्रशंसकों तक, क्रिकेट के सभी हितधारक खेल कैलेंडर में व्यवधान से चिंतित थे. बहुत सारे खिलाडिय़ों की इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) के साथ विशेष रुचि और चिंता जुड़ी होती है. इसके पीछे कई अच्छी वजहें भी होती हैं.

निश्चित रूप से, आइसीसी (अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद) ट्वेंटी-20 विश्व कप का रद्द होना, जो अक्तूबर में ऑस्ट्रेलिया में खेला जाना था, अधिकतर क्रिकेट बोर्डों की प्राथमिकता में सबसे ऊपर था. आखिरकार, बहुत से ऐसे देश जो कम क्रिकेट खेलते हैं, उनके राजस्व का एक बड़ा हिस्सा आइसीसी के आयोजनों से ही तो आता है. लेकिन खिलाडिय़ों के लिए, जो इस खेल में सबसे अहम भूमिका में होते हैं, पैसा तो दरअसल आइपीएल से ही आता है; शेष क्रिकेट जो वे खेलते हैं, वह तो बस एक पूरक आय है.

ट्वेंटी-20 विश्व कप के रद्द होने और इस बात को लेकर एक व्यापक स्वीकृति के साथ कि महामारी के बीच भी जीवन रुकना नहीं चाहिए, आइपीएल से संबंधित सवाल क्या यह होना चाहिए से बदलकर यह कहां होना चाहिए हो गया और सभी संबंधित पक्षों ने इससे राहत की सांस ली. यह भारत में नहीं हो सकता यह बात तो लगभग तुरंत तय हो गई. चिकित्सा सुरक्षा की किसी भी डिग्री के साथ इस तरह के टूर्नामेंट की मेजबानी करना लगभग असंभव था. इस चुनौती के अलावा, जब भारत में कोविड के कारण लोगों की जिंदगी और आजीविका पर बड़ा संकट दिखता हो, ऐसे में दो महीने लंबा क्रिकेट उत्सव कराना गलत संदेश देता और उसकी आलोचना होती.

आइपीएल भारत के बाहर कराया जा सकता है, इस विचार के साथ ही जगहों की खोज शुरू हुई तो सबसे पहले न्यूजीलैंड के बारे में सोचा गया. दरअसल, क्रिकेट खेलने वाले प्रमुख देशों में न्यूजीलैंड ऐसा था जो महामारी से सबसे कम प्रभावित था. लेकिन मेजबान के रूप में न्यूजीलैंड के खिलाफ जो बात जा रही थी, वह उसका भौगोलिक नक्शे पर अलग-थलग होना था. यह बहुत संभव नहीं लगता कि इस तरह के टूर्नामेंट का वहां बहुत स्वागत होगा, और शायद इससे भी बड़ी बात कि यह आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं लगा.

श्रीलंका ने भी मैच के लिए अपने हाथ खड़े किए, पर यह हाथ किसी भी अन्य चीज से ज्यादा, उम्मीद में खड़ा किया था. श्रीलंका में वर्ष के उस वक्त दो महीने की बारिश-मुक्त शामें (या भारत के अधिकांश हिस्सों में भी) होना, एक ख्याली पुलाव ही होता.

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के लिए 'कहां' प्रश्न का उत्तर देना बहुत आसान रहा: बारिश की कोई संभावना नहीं और ज्यादा अहम बात कि भौगोलिक रूप से यूएई सबसे अधिक क्रिकेट देशों के खिलाडिय़ों के लिए बस एक उड़ान की दूरी पर है. यानी वहां एक केंद्रीय, एक स्थान पर क्वारंटीन संभव है.

वेस्टइंडीज ने इंग्लैंड में अपनी तीन टेस्ट मैचों की शृंखला खेली लेकिन उसके लिए जो तैयारियां हुईं वे अभूतपूर्व थीं. खिलाडिय़ों को क्वारंटीन की जरूरतें पूरी करनी थी और उन्होंने बायो सिक्योर बबल (एक अत्यंत सुरक्षित जैव-सुरक्षित माहौल) में अपना क्रिकेट खेला.

बबल निर्माण ने एक संकेत दिया कि कोविड के समय में टूर्नामेंट की मेजबानी करने के लिए किस तरह के इंतजाम करने होंगे. इस प्रयोग का अर्थ था कि लोगों के एक निश्चित समूह—खिलाडिय़ों, सहायक कर्मचारियों और बिल्कुल आवश्यक अन्य कर्मचारियों से—के अलावा अन्य कोई भी खेल के मैदान और टीम होटल जैसे मुख्य क्षेत्रों में न तो प्रवेश कर सकेगा न बाहर जा सकेगा. इंग्लैंड में दो स्थानों पर, होटल उन ग्राउंड्स में ही थे जहां मैच खेले गए.

इंग्लैंड के तेज गेंदबाज मार्क वुड ने कहा कि यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म में होने जैसा था. उन्होंने कई बार कहा है, ''हर कोई मास्क पहने था और आप किसी को भी देख नहीं सकते हैं. आपको पता नहीं चलता कि वे आपके लिए मित्रवत हैं या नहीं! यह थोड़ा अलग और अजीब है, लेकिन अब हमें इसकी आदत डालनी होगी.'' खिलाडिय़ों के शरीर का तापमान नियमित अंतराल पर लिया जाता था, और उस सुरक्षित बबल में प्रवेश करने से पहले कोविड जांच होती थी और बाद में भी थोड़े-थोड़े अंतराल पर जांच होती थी.

दुबई में जो बबल बनाया जाएगा वह एकदम इंग्लैंड के जैसा नहीं, पर उससे बहुत मिलता-जुलता होगा. यूएई में एक अहम अंतर यह है कि यहां खेल के स्थानों पर होटल नहीं हैं. यह निर्धारित किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात पहुंचने वाले सभी खिलाड़ी आगमन के पहले सप्ताह में तीन कोविड-19 जांच से गुजरेंगे और तीनों जांच में सुरक्षित पाए जाने के बाद ही उन्हें बायो-सिक्योर्ड बबल में प्रवेश दिया जाएगा. प्रत्येक स्थान पर कलर-कोडेड जोन होंगे—सबसे भीतरी जोन हरे रंग का होगा, जहां केवल खिलाडिय़ों और मैच अधिकारियों को प्रवेश की अनुमति होगी; नारंगी, जहां परिचालन कर्मचारी भी अपना काम कर सकते हैं; और सबसे बाहरी घेरा लाल रंग का होगा जहां बबल के बाहर से आवश्यक वस्तुओं जैसे कि भोजन, पानी और ऐसी ही अन्य वस्तुओं की नियमित रूप से आपूर्ति होगी.

इंग्लैंड में इसी तरह का सख्त अलगाव किया गया था—60 से कम लोगों को ग्रीन जोन में जाने दिया जाता था—पर यह आइपीएल के लिए बहुत अधिक जटिल होगा. प्रत्येक टीम में 24 खिलाड़ी हैं. उसमें कोच और सहायक कर्मचारियों को जोड़ लें. हर दिन दो मैच होने का मतलब है कि लोगों के अलग-अलग सेट मैच में शामिल हैं, यानी वास्तविक तस्वीर बहुत अलग हो सकती है. अकेले सुरक्षा इंतजाम ही थोड़े डराने वाले दिखते हैं.

जब इतनी सारी दिक्कतें हैं फिर आइपीएल का आयोजन कराया जाना इतना जरूरी क्यों है? उद्योग के विशेषज्ञ लीग की ब्रांड वैल्यू को सबसे बड़ी वजह मानते हैं. इस साल फरवरी में वित्तीय सलाहकार डफ ऐंड फेल्प्स के अनुमान के मुताबिक, आइपीएल का बाजार मूल्य 47,500 करोड़ रुपए है. अनुमान लगाया गया है कि आइपीएल के प्रत्येक संस्करण ने भारतीय अर्थव्यवस्था में 17.5—20 करोड़ डॉलर के बराबर योगदान किया.

सबसे अहम बात कि इस साल आइपीएल के न होने का मतलब था कि बीसीसीआइ (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) के कोष को एक बड़ी चपत लग जाती. पांच साल के प्रसारण अधिकारों के लिए स्टार, जिसने 2.55 अरब डॉलर (19,125 करोड़ रुपए) का भुगतान किया है, कतार में सबसे आगे होता, लेकिन फ्रेंचाइजी, खिलाड़ी, विज्ञापनकर्ता, प्रायोजक सभी बहुत तेजी से कतार में खड़े होने लगते. संभवत: यही वजह है कि जुलाई की शुरुआत में सौरव गांगुली ने कहा था: ''हम नहीं चाहते कि वर्ष 2020 बिना आइपीएल के खत्म हो जाए. हमारी पहली प्राथमिकता भारत है और भले ही हमें 35-40 दिन ही मिले, हम इसकी मेजबानी करेंगे. लेकिन हमें पता नहीं है कि हम कहां करेंगे.''

जब तक यूएई में टूर्नामेंट की मेजबानी के लिए जरूरी अनुमति मिली, आइपीएल पर एक और संकट छा गया—चीनी कंपनी विवो 2020 के टूर्नामेंट का स्पॉन्सर बनने के वादे से पलट गई. विवो और बीसीसीआइ दोनों ने चुप्पी साध रखी है—और 3 अगस्त तक परेशानी के कोई संकेत भी नहीं दिख रहे थे—अब यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों के बीच संबंधों का भविष्य क्या होगा. विवो ने 2015 में दो साल के सौदे पर हस्ताक्षर किए थे, और फिर 34 अरब डॉलर का भुगतान करके उसे अगले पांच साल के लिए यानी 2022 तक बढ़ाया था

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आखिरी समय में विवो के हाथ खींच लेने से अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या अन्य चीनी कंपनियों ने भी टीम के प्रायोजकों के रूप में जो निवेश किया है, उससे पीछे हट जाएंगी. खिलाडिय़ों और अन्य सभी हितधारकों के मन में फिलहाल एक ही सवाल चल रहा है 'अभी क्यों?' जहां पहले सारी बात किसी भी रूप में टूर्नामेंट खेलने की थी और इसे नि:स्वार्थ भाव से एक अरब लोगों के मनोरंजन के लिए बताया जा रहा था, वहीं अब जिसे धीमी आवाज में पूछा जा रहा है: जब दुनिया में आग लगी है तब भी आइपीएल क्यों खेला जाए?

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