टेक आइकॉनः टॉयलेट क्रांतिकारी

शून्य डिस्चार्ज वाले टॉयल्ट सिस्टम का विकास जिससे पानी की बर्बादी कम होती है.

ऐसे बचाएं पानी जेडडीटीएस टॉयलेट के पास डॉ. तारे
आशीष मिश्र
  • नई दिल्ली,
  • 07 अक्टूबर 2019,
  • अपडेटेड 6:32 PM IST

टेक आइकॉन

विजेता: डॉ. विनोद तारे

जीत की वजह: शून्य डिस्चार्ज वाले टॉयल्ट सिस्टम का विकास जिससे पानी की बर्बादी कम होती है

वर्ष 2005 में, आइआइटी कानपुर को रेलवे और मानव संसाधान विकास मंत्रालयों ने एक अनूठा काम सौंपा था: भारतीय रेलवे के लिए शून्य डिस्चार्ज वाली टॉयलेट प्रणाली (जेडडीटीएस) विकसित करना. आइआइटी कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के तहत प्रबंधन कार्यक्रम और एनवायरनमेंट इंजीनियरिंग के प्रोफेसर 62 साल के डॉ. विनोद तारे के नेतृत्व में 12 लोगों की टीम इस काम पर जुट गई.

जेडडीटीएस परियोजना की लागत थी 2 करोड़ रुपए. लागत का 40-40 फीसद दो मंत्रालयों ने उठाया जबकि बाकी एक औद्योगिक भागीदार की तरफ से आया. जेडडीटीएस को सबसे पहले सालभर लंबे ट्रायल के लिए चेन्नै-जम्मू तवी एक्सप्रेस के एक ही पैसेंजर कोच में लगाया गया.

उसमें कामयाबी मिलने के बाद जेडडीटीएस टॉयलेट अब कई जगह लगाए जा चुके हैं—कश्मीर की डल झील में हाउस बोट से लेकर कोयंबत्तूर में प्राथमिक स्कूल तक. साल 2013 में प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान पानीरहित पेशाबघर और जेडडीटीएस लगाए गए. उनकी कामयाबी के बाद इस साल भी कुंभ मेले में छह अलग-अलग जगहों पर यह टॉयलेट लगाए गए.

जेडडीटीएस दिखने में तो पारंपरिक सचल टॉयलेट जैसे लगते हैं लेकिन उनमें पानी का संग्रहण और शोधन एकदम अलग तरीके से होता है. टॉयलेट सीट के नीचे लगे सेपरेटर के जरिए मल का ठोस व द्रव्य हिस्सा अलग-अलग किया जाता है. द्रव्य हिस्से को साफ करके टॉयलेट में क्रलश के इस्तेमाल में लाया जाता है जिससे फ्लशिंग में साफ पानी का इस्तेमाल बच जाता है. वहीं मल के ठोस हिस्से को वर्मीकंपोस्टिंग के जरिए बेहद उच्च गुणवत्ता वाली खाद में तब्दील कर दिया जाता है.

डॉ. तारे इन टॉयलेट का व्यावसायिक इस्तेमाल करना नहीं चाहते. वे कहते हैं, ''कई कंपनियां जेडडीटीएस की अवधारणा को खरीदना चाहती हैं लेकिन हम इस परियोजना का परिचालन और रखरखाव खुद करना चाहते हैं.''

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