महारानी की खामोशी

जब मोदी-शाह के पसंदीदा शेखावत कहते हैं कि उनकी (वसुंधरा) खामोशी विस्फोटक हो सकती है तो ऐसा इसलिए क्योंकि कयास नए राजनैतिक समीकरण के भी हैं

चद्रदीप कुमार
aajtak.in
  • जयपुर ,
  • 11 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 11:15 PM IST

इस जुलाई की 31 तारीख को भाजपा की राजस्थान इकाई ने राज्य कार्यकारिणी के नए सदस्यों के नामों की घोषणा की. उपाध्यक्ष, महासचिव, सचिव और अनुशासन समिति सदस्यों जैसे 30 पदों में से ज्यादातर वसुंधरा राजे विरोधी तिकड़ी—प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया, महासचिव (संगठन) चंद्रशेखर और विपक्ष के उप नेता राजेंद्र सिंह राठौर के नामांकित लोगों के पास चले गए. विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद से पार्टी ने ऐसा कोई मौका नहीं खोया है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री के विरोधियों को आगे न बढ़ाया गया हो. जब गजेंद्र शेखावत को केंद्रीय मंत्री और ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया, तभी रणनीति स्पष्ट हो गई थी—भाजपा राजे विरोधी नेताओं को खड़ा कर रही है. पार्टी ने उनके बेटे और चार बार के सांसद रहे दुष्यंत सिंह के मंत्री पद के दावे को भी नजदरअंदाज कर दिया.

राजस्थान में जब भाजपा ने अशोक गहलोत की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार को गिराने के लिए पूरा जोर लगा रही थी तो दो महीने के पूरे घटनाक्रम के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री अस्वाभाविक रूप से खामोश रहीं. 1 अगस्त को केंद्रीय जलशक्ति मंत्री शेखावत ने एक न्यूज एजेंसी से कहा, ''राजे की खामोशी एक ऐसी रणनीति हो सकती है जिसमें चुप्पी शब्दों से अधिक जोरदार होती है.'' यह एक संकेत था कि भाजपा आला कमान चिंतित है.

इस संदर्भ में, सात बार के विधायक राठौड़, एक खास केस स्टडी हैं. पार्टी और आरएसएस को उनके विवादित अतीत की वजह से उनसे चिढ़ है. लंबे समय तक वे चाहते थे कि राजे उन्हें किनारे लगा दें लेकिन जब 2014 में उन्होंने राठौड़ से दूरी बनाई तो विरोधी खेमे ने राठौड़ का बांहें खोलकर स्वागत किया. नई कार्यकारिणी में दो ऐसे युवा भी शामिल किए गए जो पहले उनकी मंडली में थे पर अब राजे के दुश्मनों में गिने जाते हैं. इनमें पहला नाम है अजय पाल सिंह, जिनका बहुत जनाधार नहीं है पर वे अब पार्टी उपाध्यक्ष हैं. सिख समुदाय के सिंह 2003 में मीडिया की निगाहों में आए थे जब राजे राज्य की राजनीति में गहलोत की कांग्रेस सरकार से भिडऩे के लिए उतरी थीं. तब राजे, अजय पाल सिंह के जयपुर स्थित भव्य बंगले में साल भर तक टिकी थीं.

बाद में उनको राजे ने राजस्थान हाउसिंग बोर्ड का चेयरमैन बनाकर उपकृत किया और यह तथ्य नजरअंदाज किया था कि उनकी रियल एस्टेट कंपनी है. अगले चार साल में उनकी कंपनी खूब फूली-फली. 2008 में चुनावों में उन्होंने राजे के लिए खूब फंड मुहैया कराया. 2008 के चुनाव अभियान के दौरान, और उसके बाद कई और बार, गहलोत ने टिप्पणी की थी कि अजयपाल राजे की दहशत से उनके सामने रो पड़े थे. दया की भीख मांगता उनका आंसुओं भर चेहरा तब स्थानीय अखबारों के पहले पन्ने पर छपा था. जब वे दोबारा मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने राजे के नजदीक आने की कोशिश की, पर कड़वाहट दूर नहीं हुई.

दूसरी बड़ी नियुक्ति बतौर महासचिव सांसद दिया कुमारी की है और यह संकेत है कि पार्टी जयपुर की राजकुमारी को धौलपुर की महारानी राजे के वैकल्पिक शाही चेहरे के रूप में पेश करना चाहती है.

इस बीच, प्रदेश अध्यक्ष पूनिया ने राजे-विरोधी रणनीति को खारिज करते हुए और कहा कि पार्टी अपने नेताओं के लिए भूमिका तय करती है. वे कहते है, ''हमने नए चेहरों और ऐसी नई जातियों को शामिल किया है जिनका प्रतिनिधित्व कम था.'' इस बात का समर्थन विधायक और पूर्व मंत्री वासुदेव देवनानी भी करते हैं. लेकिन क्या भाजपा राजे और उनकी टीम को हाशिए पर धकेलने का खतरा तब उठा सकती है जब कांग्रेस के गहलोत कुर्सी बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं? राजे कहती हैं कि वे पार्टी के फैसले से बंधी हैं; लेकिन इसके बाद गहलोत की टिप्पणी आई कि भाजपा में कद घटाने की कोशिशों से वे (राजे) बहुत नाखुश हैं. प्रदेश में भाजपा के 72 विधायक हैं इनमें से राजे को 45 विधायकों का समर्थन हासिल है और इनमें से अधिकतर राजे के प्रति बेहद वफादार हैं. बाकी के लोग बंटे हुए हैं, जिनमें से 20 लोग विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया के साथ हैं.

प्रदेश की राजनीति में राजे महत्वपूर्ण कारक हैं. वे सत्ताविरोधी लहर को बड़ी जीत में तब्दील करने में कामयाब रही हैं. यह प्रतिभा भाजपा या कांग्रेस के कुछ ही नेताओं में है. विधानसभा चुनावों में दो पराजयों में भी उन्होंने हाल के दशकों में दूसरों के मुकाबले अधिक सम्मानजनक सीटें हासिल की हैं. बहरहाल, जब मोदी-शाह के पसंदीदा शेखावत कहते हैं कि उनकी (वसुंधरा) खामोशी विस्फोटक हो सकती है, तो ऐसा इसलिए क्योंकि कयास नए उभरते राजनैतिक समीकरण के भी हैं.

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