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पीएम-किसान जैसी योजनाएं केवल मरहम-पट्टी की तरह हैं, किसानों की घटती आय और कृषि वृद्धि चिंता का मुख्य विषय

मनीष अग्निहोत्री
अजीत कुमार झा
  • नई दिल्ली,
  • 17 सितंबर 2019,
  • अपडेटेड 3:37 PM IST

अब तक क्या किया गया

पीएम-किसान योजना (न्यूनतम आय सहायता के तौर पर प्रति वर्ष 6,000 रु.) में सभी किसानों को शामिल करने के लिए योजना को विस्तार दिया जा चुका है. 29 अगस्त तक तीन किस्तें जारी की जा चुकी थी: पहली किस्त में 6.29 करोड़ किसानों को लाभ दिया गया, दूसरी किस्त में 3.63 करोड़ और तीसरी में 7,21,982 किसानों को.

कृषि मंत्रालय ने 10,000 किसान उत्पादक संगठन बनाने के लिए एक योजना की मंजूरी हासिल कर ली है

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को पुनर्जीवित करने के प्रस्ताव को राज्यों को भेज दिया गया है

छोटे और गरीब किसानों के लिए पेंशन योजना के पंजीकरण का काम शुरू किया गया. 30 अगस्त तक 5,36,637 किसानों की सूची तैयार

क्या यह पर्याप्त है?

नीति आयोग के अनुसार, 2011 और 2016 के बीच वास्तविक अर्थों में किसानों की आय में मात्र 0.44 प्रतिशत की वृद्धि हुई. कृषि में यह वृद्धि कछुए की रफ्तार वाली मानी जा सकती है. 2018-19 में कृषि और उससे संबंधित कार्यों में अनुमानित वृद्धि 2.7 प्रतिशत है, जो 2017-18 में 5 प्रतिशत के मुकाबले काफी कम है.

सुस्त रफ्तार और आर्थिक मंदी व किसानों की आय में बेहद कम वृद्धि के मद्देनजर अब तक जो कदम उठाए गए हैं वे केवल तात्कालिक राहत ही हैं

और क्या करने की जरूरत है

कृषि नीतियों का ध्यान वास्तव में उत्पादन से हटकर किसानों की आजीविका पर होना चाहिए

किसानों को एमएसपी और साथ ही 50 प्रतिशत के वादे के बावजूद ज्यादार राज्यों में एमएसपी के तहत अनाज और अन्य जिंसों की सरकारी खरीद बेहद कम है

मौसम के जोखिम, कीमतों में उतार-चढ़ाव और समय से कर्ज की अनुपलब्धता को देखते हुए किसानों की मदद के लिए कदम उठाने की जरूरत है

कृषि के बाजारों में बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है और किसानों को अपनी उपज का अगर बेहतर मूल्य पाना है तो उन्हें प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहना चाहिए

कृषि नीतियां ऐसी हों जिनसे वास्तविक किसानों का फायदा हो, न कि बिचौलियों को, जैसा ज्यादातर राज्यों में देखा जाता है

भूमि व जल के इस्तेमाल की क्षमता बढ़ाने के लिए नीतियां बनाने की जरूरत

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