माया के मंत्रियों पर कसा शिकंजा

मायावती ने अपने कार्यकाल के उत्तरार्ध में लोकायुक्त जांच के आधार पर मंत्रियों को पद से हटाने की मुहिम चलार्ई थी, लेकिन सपा राज में मायावती कार्यकाल के मंत्री जेल जाने लगे हैं.

आशीष मिश्र
  • नई दिल्‍ली,
  • 03 दिसंबर 2012,
  • अपडेटेड 1:42 PM IST

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार बनने के बाद बादशाह सिंह, पूर्ववर्ती मायावती सरकार के पहले मंत्री बने जिन्हें भष्टाचार के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ी. गत 4 अक्तूबर को सहकारिता विभाग की निर्माण इकाई 'श्रम एवं निर्माण सहकारी संघ लिमिटेड’ (लेकफेड) में बीएसपी सरकार के दौरान हुए 1,000 करोड़ रु. से अधिक के घोटाले में बादशाह सिंह का नाम उस कड़ी के रूप में सामने आया जिसने लेकफेड को काम दिलाने के एवज में घूस ली. केवल बादशाह ही नहीं मायावती सरकार के कई मंत्री भी जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं. ऐसे में जल्द ही गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो सकता है.

समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद यह पहला मौका था जब राज्य की जांच एजेंसी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर किसी नेता पर शिकंजा कसा हो. लेकफेड में हुए घोटाले से पर्दा उस वक्त उठा था जब गत 21 फरवरी को सहकारिता विभाग के अफसरों ने करोड़ों रु. के घालमेल का मुकदमा हुसैनगंज कोतवाली में दर्ज कराया. इसमें लेकफेड को काम देने के नाम पर 1,000 करोड़ रु. से अधिक की धांधली होने का शक जाहिर किया गया था. इसके बाद मामले की जांच पुलिस के को-ऑपरेटिव सेल के विशेष जांच ब्यूरो (एसआइबी) को दे दी गई थी.

एसआइबी ने तेजी से कार्रवाई करते हुए लेकफेड के कथित पीआरओ प्रवीण सिंह,  चीफ इंजीनियर गोविंद शरण श्रीवास्तव, कार्यकारी इंजीनियर डी.के. साहू और सुपरिटेंडेंट इंजीनियर अजय कुमार दोहरे को गिरफ्तार कर जांच शुरू की. इन आरोपियों ने मजिस्ट्रेट के सामने जो बयान दिया उसमें बादशाह सिंह पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने श्रम मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान यूपी के शहरों में लेबर अड्डों का निर्माण कराने के लिए आवंटित 100 करोड़ रु. का बजट लेकफेड को दिलाने के लिए पांच करोड़ रु. घूस ली.

एसआइबी के एक जांच अधिकारी के मुताबिक बादशाह सिंह के भतीजे सोनू सिंह और उसके सहयोगी अख्तर ने लेकफेड के पीआरओ प्रवीन सिंह से संपर्क साधा. इसके बाद प्रवीन सिंह ने लेकफेड के इंजीनियरों से बादशाह सिंह से मिलकर उनसे लेकफेड के लिए कोई निर्माण कार्य लेने की सलाह दी. इसके एवज में बादशाह सिंह को घूस देने के लिए लेकफेड के तत्कालीन चेयरमैन सुशील कटियार और प्रबंध निदेशक बी.पी. सिंह के निर्देश पर पंजाब नेशनल बैंक की लालबाग शाखा से 28 से 30 मार्च के बीच पांच करोड़ रु. निकाले गए.

2 अप्रैल, 2011 को पीआरओ प्रवीन सिंह, चीफ इंजीनियर गोविंद शरण श्रीवास्तव खरैला, महोबा स्थित बादशाह सिंह के आवास पर पहुंचे और वहां उन्हें पांच करोड़ रु. की रकम सौंपी. इसके बदले में लेबर अड्डा का कार्य लेकफेड को सौंपने का प्रस्ताव था. अधिकारी के मुताबिक घूस की रकम देने के लिए लेकफेड के तत्कालीन चेयरमैन सुशील कटियार की कार का इस्तेमाल किया गया. इस कार की डिक्की में पांच करोड़ रु. रखे गए.

बादशाह सिंह ने घूस की रकम लेने के बाद भी लेकफेड को काम नहीं सौंपा. जब बादशाह सिंह पर अधिकारियों ने घूस की रकम लौटाने का दबाव बनाया तो उन्होंने कहा कि उनके पास बहुत जमीन है जिसे बेच कर वह घोटाले की रकम वापस कर देंगे. बाद में सिंह केवल चार लाख रुपये ही देने को राजी हुए. मामले की जांच कर रहे एसआइबी के अधिकारियों ने बीते 3 अक्तूबर को बादशाह सिंह को पूछताछ के लिए बुलाया और उन पर सवालों की झड़ी लगा दी.

जांच के दौरान बादशाह सिंह इस कदर उलझे कि यहां तक बोल पड़े, ''बीएसपी सरकार में श्रम विभाग मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारी चलाते थे. वह जो चाहते थे वह होता था.” करीब तीन घंटे की पूछताछ के बाद बादशाह सिंह को जांच अधिकारी ए.पी. गंगवार ने गिरफ्तारी का मेमो थमाया और जेल भेज दिया.

बादशाह सिंह पहली बार सुर्खियों में नहीं आए हैं. इनका असली नाम रामेंद्र सिंह है लेकिन '80 के दशक में जब इन्होंने 'इंसाफ सेना’ का गठन किया तो नाम भी बदल लिया. हालांकि कुछ प्रमाणपत्रों में इनका नाम रामेंद्र सिंह ही है तो कुछ सरकारी दस्तावेजों में बादशाह सिंह. बीते वर्ष लोकायुक्त ने भी जांच में बादशाह सिंह के नाम में हेरफेर को उजागर किया था. इस वर्ष जनवरी में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बादशाह सिंह ने बीएसपी छोड़ बीजेपी का दामन थामा लेकिन चुनाव न जीत सके. बादशाह सिंह के जेल जाने के बाद बीजेपी अपने रुख को लेकर असमंजस में हैं, हालांकि एक खेमा खुलकर इनके बचाव में आ गया है. बादशाह सिंह के जेल पहुंचते ही वरिष्ठ बीजेपी नेता विनय कटियार उनसे मिलने पहुंच गए.

कटियार कहते हैं “यह कार्रवाई राजनैतिक द्वेष से की गई है. मुख्य आरोपी को पहले गिरफ्तार किया जाना चाहिए.” वहीं दूसरी ओर उमा भारती के समर्थकों ने बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व पर बादशाह सिंह पर कार्रवाई करने का दबाव बनाया है. प्रदेश बीजेपी कार्यकारिणी के एक सदस्य कहते हैं, ''केंद्रीय नेताओं के खामोश रहने से भ्रष्टाचार के विरुद्ध बीजेपी की जंग लगातार कमजोर हो रही है.”

हालांकि एसआइबी की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. घूस के जिस आरोप पर एसआइबी ने तुरंत कार्रवाई करते हुए बादशाह सिंह को गिरफ्तार किया वैसे ही आरोप बीएसपी सरकार के अन्य मंत्रियों पर भी लग रहे हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर को अभी तक पूछताछ का नोटिस भी नहीं भेजा गया है.

बीएसपी के कुछ नेताओं का नाम इस घोटाले में आने पर नेता प्रतिपक्ष और बीएसपी विधानमंडल दल के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं, ''सपा सरकार प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग कर बीएसपी की छवि खराब करने का काम कर रही है.” जांच एजेंसियों के रडार पर आए बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी कहते हैं, ''यदि मेरे ऊपर आरोप साबित हुए तो मैं पार्टी से इस्तीफा दे दूंगा लेकिन यदि आरोप साबित नहीं हुए तो मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना होगा.”

प्रदेश कांग्रेस के नेता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं कि अखिलेश सरकार यदि वास्तव में बीएसपी के शासनकाल के घोटालों को सामने लाने के मामले में संजीदा है तो सरकार को जांच में भी तेजी लानी चाहिए. राजपूत कहते हैं—जिस तरह जांच कार्यों में सुस्ती आई है उससे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इन दोनों पार्टियों की मिलीभगत की ओर भी इशारा होता है.

समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के कुछ महीनों के भीतर बीएसपी सरकार के कई घोटालों को सामने लाया गया लेकिन उतनी तेजी से जांच आगे नहीं बढ़ पा रही है. विधानमंडल सत्र के दौरान अखिलेश यादव सरकार ने मायावती के शासनकाल में पिछड़े वर्ग के छात्रों की स्कूल फीस प्रतिपूर्ति के 1,045 करोड़ रु. जिलों में न पहुंचने, सरकारी चीनी मिलों की बिक्री में हुई धांधली और जिला योजना समितियों द्वारा वर्ष 2011-2012 में विकास कार्यों के लिए मंजूर किए गए 9,000 करोड़ रु. जिलों में न पहुंचने की जांच वरिष्ठ मंत्री की अध्यक्षता वाली सर्वदलीय समिति से कराने की घोषणा की थी.

इस संसदीय समिति की अध्यक्षता के लिए संसदीय कार्य मंत्री आजम खान का नाम भी तय हो गया था लेकिन बजट सत्र के खत्म होने के तीन महीने से ज्यादा का अरसा बीत गया है, समिति का विधिवत गठन अभी तक नहीं हो पाया है. हालांकि इस पर विवाद शुरू हो चुका है.

आजम खान की अध्यक्षता पर सवालिया निशान लगाते हुए बीजेपी विधानमंडल दल के नेता हुकुम सिंह ने विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद को पत्र लिखकर उनसे खुद की अध्यक्षता में ही सर्वदलीय समिति गठित करने की मांग की है. हुकुम सिंह कहते हैं, ''आजम खान के पास कई सारे विभाग हैं और अब तो वह विश्वविद्यालय चलाने में भी व्यस्त हो गए हैं.” सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी बीएसपी के प्रति नरमी बरतने के किसी भी आरोप को सिरे से खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ''कोई ऐसा विभाग नहीं बचा जहां बीएसपी सरकार का भ्रष्टाचार सामने नहीं आया हो. रोज धांधली के नए-नए मामले उजागर हो रहे हैं. जांच का अपना तरीका है. किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा.”

बहरहाल मायावती सरकार के मंत्रियों पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोप सही साबित हुए तो यह उस सरकारी सिस्टम पर सवालिया निशान लगा देगा जिसमें मंत्रियों और अधिकारियों को पैसे की बंदरबांट की खुली छूट मिली थी. अखिलेश सरकार को न केवल भ्रष्टाचार की जांच के काम में तेजी लानी चाहिए बल्कि कुछ ऐसा बंदोबस्त भी करना चाहिए. नहीं तो मायावती सरकार के मंत्रियों जैसा हश्र उनकी सरकार के मंत्रियों का भी हो सकता है. लेकिन लगता यही है कि दोनों राजनैतिक दल एक-दूसरे के प्रति नरमी बरतने के मूड में हैं.

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