महतो वोट पर नजर

महतो ओबीसी हैं, जो जंगल महल क्षेत्र में कुल आबादी का 32 फीसद है. उनके अलावा दलितों और आदिवासियों का आबादी में 28 फीसद हिस्सा है

सुबीर हल्दर
रोमिता दत्ता
  • पश्चिम बंगाल,
  • 06 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 2:18 PM IST

अपने सिर पर एक गमछा लपेटे छत्रधर महतो ने धान कि रोपाई करते हुए अपनी एडिय़ां गीली मिट्टी में धंसाईं. किसान के रूप में अपने इस नए अवतार में वे अपनी भूमिपुत्र की छवि को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. उनके पास एक नया नारा भी है—'आदिवासियों के लिए एक आदिवासी.' वे उम्मीद कर रहे हैं कि इससे उन्हें और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जंगल महल क्षेत्र में अपनी खोई जमीन पाने का मौका मिल जाएगा.

यूएपीए (गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक कानून) समेत कई मामलों में 11 साल सलाखों के पीछे रहने के बाद छत्रधर फरवरी 2020 में बाहर आए तो उन्होंने देखा कि उनकी जमीन में काफी बदलाव हो चुका है. कभी वामपंथी राजनीति से लाल रहे उनके इस क्षेत्र पर इस समय केसरिया कोंपलें फूट रही थीं. महतो समुदाय के जो खास लोग एक समय तत्कालीन वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए उनके और माओवादी संगठन, पुलिस अत्याचारों के खिलाफ जन समिति (पीसीएपीए) के साथ खड़े थे, अब वे ही पंचायत तथा जिला परिषद पदाधिकारियों के रूप में सारे फैसले ले रहे हैं.

वे पक्के मकानों में रहते हैं, एसयूवी में घूमते हैं, और वे ही सत्ता का हिस्सा हैं. इन लोगों और आम लोगों के बीच का अंतर काफी स्पष्ट है और इसलिए लोगों में असंतोष है. लोग महसूस करते हैं कि महतो और उनके सियासी आका सरकारी योजनाओं में गरीबों को मिलनी वाली पात्रताओं को बीच में ही हड़प कर जा रहे हैं.

महतो ओबीसी हैं, जो जंगल महल क्षेत्र में कुल आबादी का 32 फीसद है. इस इलाके में पश्चिम मिदनापुर, पुरुलिया व बांकुड़ा जिलों की 42 विधानसभा सीटें आती हैं. उनके अलावा दलितों और आदिवासियों का आबादी में 28 फीसद हिस्सा है. बीते सप्ताह तृणमूल के सचिव के तौर पर महतो के मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश को महतो और इन समुदायों के लोगों का भरोसा फिर से जीतने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं माना जा रहा है कि महतो समुदाय ने 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को वोट दिया था.

अगर लोकसभा चुनावों की तर्ज पर ही लोग वोट डालते हैं तो भाजपा जंगल महल इलाके में 42 में से 35 सीटें जीत लेगी. इसलिए अगर कोई टीएमसी के लिए हालात संभाल सकता है तो वह छत्रधर ही हैं. वैसे भाजपा भी चुप नहीं बैठी है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने 2009 के दो मामले उनके खिलाफ ढूंढ निकाले हैं.

इनमें से एक माकपा के नेता की हत्या से और दूसरा राजधानी एक्सप्रेस को झारग्राम में बंधक बना लेने की घटना से जुड़ा है. छत्रधर उस वक्त जेल में थे, जाहिर है कि दोनों मामले प्रायोजित लगते हैं. लेकिन कानूनी तौर पर उनको उलझाए रखने के लिए तो वे पर्याप्त ही हैं. इस तरह जंगल महल में अब एक नया खेल चल रहा है.

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