महाराष्ट्र-ढीला-ढाला गठजोड़

हाल में महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बालासाहेब थोराट की तीखी आलोचना की. उन्होंने कहा कि थोराट को सिर्फ अपनी सीट सांगमनेर की ही फिक्र है तथा वे पूरे राज्य में दौरा करने को तैयार नहीं हैं.

हाथ का साथ संयुक्त घोषणापत्र जारी करते हुए कांग्रेस और राकांपा के नेता
किरण डी. तारे
  • नई दिल्ली,
  • 15 अक्टूबर 2019,
  • अपडेटेड 5:53 PM IST

अपने गठबंधन का ऐलान कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने भले ही महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के काफी पहले कर दिया हो, लेकिन यहां तक कि आखिरी दौर में भी इस गठजोड़ में कोई उत्साह नहीं है. ये चुनाव 21 अक्तूबर को होने हैं. दोनों ही पार्टियां साख के संकट और तेजतर्रार नेतृत्व की कमी के साझा संकट से जूझ रही हैं.

हालात तब काफी बिगड़ गए जब इस साल लोकसभा चुनावों के पहले कांग्रेस के दिग्गज और तब विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे सुजय विखे पाटिल अहमदनगर सीट से अपनी उम्मीदवारी पर राकांपा के विरोध के कारण भाजपा में जा मिले. इसके बाद सोलापुर के राकांपा नेता रंजीतसिंह मोहिते पाटिल की विदाई हुई, जो मार्च के आखिर में भाजपा में शामिल हो गए. उसके बाद तो मानो भगदड़-सी मच गई. तब से कांग्रेस और राकांपा के करीब 16 विधायक अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा या शिवसेना में शामिल हो गए हैं. यह 1980 के बाद पाला बदलने वालों की सबसे बड़ी तादाद है.

कांग्रेस-राकांपा गठजोड़ संयुक्त विपक्ष की शक्ल भी नहीं ले पाया है. दलित संगठनों के मोर्चे वंचित बहुजन अघाड़ी को साथ लेने की उनकी कोशिशें भी नाकाम हो गई हैं क्योंकि उसके नेता प्रकाश आंबेडकर ने गठबंधन में 40 सीटों की मांग रख दी. राज्य में विधानसभा की कुल 288 सीटें हैं. वहीं, कांग्रेस को मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस समिति के तीन पूर्व अध्यक्षों मिलिंद देवड़ा, संजय निरुपम और कृपाशंकर सिंह के चुनाव अभियान से हट जाने से भी झटका लगा है.

तीनों ने नेतृत्व से अपने असंतोष को इसकी वजह बताया है. कांग्रेस विधायक अनंत गाडगिल कहते हैं कि विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची फाइनल करते वक्त उनकी बात को तवज्जो न दिए जाने से पार्टी के वरिष्ठ नेता नाराज हैं. पिछले साल अक्तूबर में कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व भाजपा विधायक आशीष देशमुख (जो नागपुर दक्षिण-पश्चिम सीट से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस के खिलाफ लड़ रहे हैं) ने हाल में महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बालासाहेब थोराट की तीखी आलोचना की. उन्होंने कहा कि थोराट को सिर्फ अपनी सीट सांगमनेर की ही फिक्र है तथा वे पूरे राज्य में दौरा करने को तैयार नहीं हैं.

राकांपा की कहानी भी कुछ अलग नहीं है. पार्टी वोटरों को आकर्षित करने के लिए पूरी तरह अपने अध्यक्ष शरद पवार पर निर्भर है. पवार ने पार्टी के मुख्य जनाधार, मराठा वोटरों को आकर्षित करने के लिए सिंतबर के आखिरी हफ्ते में कोल्हापुर और सतारा में रोड शो किया. ऐसा कम ही देखा गया है. मुंबरा में प्रभावी मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए 3 अक्तूबर को वे पांच घंटे तक चुनाव-प्रचार में शामिल रहे. पवार ने इंडिया टुडे से कहा कि उनकी पार्टी सरकार की नाकामियों पर फोकस कर रही है. पवार कहते हैं, ''मुख्यमंत्री फडऩवीस उद्योग को बढ़ावा देने और किसानों को राहत देने में नाकाम रहे हैं. यही उनकी इकलौती उपलब्धि है'' (देखें बातचीत: कांग्रेस वक्त की जरूरत है).

कांग्रेस-राकांपा गठजोड़ ने कुछ इलाकों में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के साथ रणनीतिक तालमेल कर रखा है, जिसमें कोथरूद (पुणे) और नासिक (पूर्व) सीट भी है. उन्होंने कोथरूद से अपना उम्मीदवार हटा लिया है और मनसे के किशोर शिंदे का समर्थन कर दिया है, जो राज्य भाजपा अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं. नासिक (पूर्व) में भाजपा की देवयानी फरांडे को राकांपा के बालासाहेब सानप से सीधी टक्कर दिलाने के लिए मनसे ने अपना उम्मीदवार हटा लिया है.

अपने साझा घोषणा-पत्र में कांग्रेस-राकांपा ने शिक्षित बेरोजगार युवकों को 5,000 रु. मासिक भत्ता, मजदूरों को न्यूनतम 21,000 रु. मासिक मजदूरी और ड्रिप इरीगेशन पर सौ फीसद सब्सिडी देने का ऐलान किया है. इसमें शहरी वोटरों को कर रियायत का भी वादा किया गया है. मसलन, सभी 15 नगरपालिका क्षेत्रों में 500 वर्ग फुट के मकान का संपत्ति कर माफ करने का ऐलान किया गया है. वैसे, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस-राकांपा 2014 में दोनों को हासिल कुल 81 सीटें भी जीतने में कामयाब हो पाएंगी.

16 विधायक कांग्रेस और राकांपा, दोनों पार्टियों के मार्च, 2019 के बाद पाला बदल चुके हैं.

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