सियासी मझधार में

कभी कद्दावर निर्दलीय उम्मीदवार रहे नेता अब आपराधिक मुकदमे और राजनीतिक ग्रहण का सामना कर रहे

सोमनाथ सेन
संध्या द्विवेदी
  • झारखंड,
  • 05 दिसंबर 2019,
  • अपडेटेड 6:14 PM IST

झारखंड के इकलौते 'निर्दलीय' मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा ने राज्य में 2006 से 2008 के दौरान करीब दो वर्ष तक राज्य पर शासन किया था. पर इस बार 30 नवंबर से राज्य में पांच चरणों में होने वाले विधानसभा के चुनावी दंगल से वे बाहर हो गए हैं. दरअसल, सितंबर 2017 में चुनाव आयोग के सामने 2009 के लोकसभा चुनाव में सिंहभूम से उम्मीदवारी के दौरान खर्च की गई राशि का ब्यौरा देने में वे विफल रहे थे.

इसलिए आयोग ने उन्हें चुनावी मैदान से तीन साल के लिए बाहर कर दिया है. कोड़ा ने आयोग की रोक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. अदालत ने 15 नवंबर को आयोग को एक नोटिस जारी किया. पर उसने यह भी फैसला दिया कि आयोग से जवाब लंबित होने की वजह से कोड़ा को चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं दी जा सकती.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) सितंबर, 2006 में अर्जुन मुंडा की अगुआई वाली भाजपा सरकार को गिराकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने वाले कोड़ा की पैसे का हेरफेर करने के आरोप में जांच कर रहा है. आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में वे झारखंड सतर्कता विभाग की जांच का भी सामना कर रहे हैं.

कोड़ा, हरिनारायण राय और एनोश एक्का कभी झारखंड के कद्दावर विधायक थे, पर आज विधानसभा चुनाव की दौड़ से बाहर निकाले जा चुके हैं. कभी कद्दावर रहे ऐसे चर्चित 'पांच नेताओं' में कमलेश सिंह और भानु प्रताप शाही भी शामिल थे. राय ने चुनाव लडऩे की अनुमति मांगने के लिए झारखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी जिसे 14 नवंबर को ठुकरा दिया गया. चुनाव आयोग की विशेष अदालत ने पूर्व मंत्री को जनवरी, 2017 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दोषी ठहराया और उन्हें सात साल जेल की सजा सुनाई. राय ने 2009 का विधानसभा चुनाव जीता था, लेकिन वे 2014 में हार गए थे.

एक्का ने दोनों विधानसभा चुनाव जीते, पर 2014 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले एक शिक्षक की हत्या के आरोप में चले मुकदमे में उन्हें जुलाई, 2018 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. फिर उनकी किस्मत ने भी उनका साथ छोड़ दिया. उनकी पत्नी मेनन एक्का दिसंबर, 2018 में कोलेबिरा विधानसभा सीट पर चौथे नंबर पर रहीं.

भवनाथपुर से मौजूदा विधायक शाही भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, पर उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है. उनके प्रतिद्वंद्वी उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को उछालने की कोशिश में हैं. ईडी इस पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के मनी-लॉन्ड्रिंग के मामले की भी जांच कर रहा है. उनकी संपत्ति जब्त की जा चुकी है. उनका नाम राज्य में हुए करोड़ों रुपए के दवा घोटाले में भी शामिल है.

कमलेश सिंह एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. उन्हें 2005 के विधानसभा चुनाव में सफलता मिली थी और उन्होंने अपनी सीट सिर्फ  35 वोटों से जीती थी. पर 2009 और 2014 के चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

झारखंड की राजनीति के इन पांच दिग्गजों ने मार्च, 2005 और दिसंबर, 2009 के बीच सत्ता के गलियारों में दबदबा बनाया था. उस दौरान राज्य में पांच सरकारों ने सत्ता संभाली थी और 11 महीने के लिए राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ था. तब कैबिनेट के अहम पदों पर ये सभी विराजमान रहे. झामुमो के शिबू सोरेन और मुंडा की सरकार के बाद सितंबर, 2006 में कोड़ा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए रास्ता बना. हालांकि, सोरेन ने कोड़ा को बाहर करने के लिए पांच कद्दावरों के इस गुट में फूट डाली और अगस्त, 2008 में फिर अपनी सरकार बनाई थी. तब एक्का ने पांच महीने के भीतर उप-चुनाव में सोरेन के खिलाफ एक उम्मीदवार मैदान में उतार दिया था और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए सोरेन के लिए वह चुनाव जीतना जरूरी था.

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