दिलचस्प किस्सागोई

लेखक ने शुरू में स्पष्ट कर दिया है कि यह न तो कथा है, न ही कथेतर, इन दोनों के बीच का नरेटिव प्रोज है, जिसे सुविधा के लिए किस्सा कहा गया है. चूंकि यह बतकही है, लिहाजा एक-दो जगहों पर मामूली चूक को दिलकश किस्सागोई की वजह से नजरअंदाज किया जा सकता है.

माउथ ऑर्गन
मोहम्मद वक़ास
  • नई दिल्ली,
  • 14 अक्टूबर 2019,
  • अपडेटेड 2:08 PM IST

अगर व्यक्ति को घूमने-फिरने और पढऩे-लिखने का शौक है तो फिर उसके पास किस्से-कहानियों की कमी नहीं रहती. सुशोभित उन्हीं लोगों में शुमार हैं. खास बात यह है कि वे शब्दों के धनी हैं और अपनी बात को बड़ी सरलता से बोलचाल की जबान में पेश करते हैं.

192 पेज में कुल 56 किस्से हैं, और सब एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा. किताब का शीर्षक माउथ ऑर्गन भी एक किस्सा ही है, जिसमें वे माउथ ऑर्गन के ख्वाहिशमंद अपने बेटे चुनु के कौतूहल को शांत करने के लिए कई तरह की बातें बताते हैं.

आपको यह कुछ खास न लगे तो उससे अगला किस्सा ‘राजा लंगड़ा है’ पढि़ए और आमों के बारे में आपको काफी रोचक जानकारी मिलेगी, वह भी ज्ञान बघारने के अंदाज में नहीं बल्कि बतकही के तौर पर. अपने अनुभवों के बीच वे आम के बारे में साहित्यकारों की मशहूर उक्तियों, घटनाओं और शेरों का जिक्र करते हैं, जिससे किस्सा दिलचस्प बन जाता है.

इससे अगला किस्सा ‘शरीफा’ है, जिसे देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. वे बताते हैं कि इसे उर्दू में शरीफा, हिंदी में सीताफल और अंग्रेजी में कस्टर्ड फ्रूट कहते हैं. ‌हिंदीभाषी राज्यों में कुछ जगहों पर सीताफल से मुराद शरीफा नहीं बल्कि किसी सब्जी से होती है. लेकिन सुशोभित नामों की बहस में नहीं पड़ते. इस किताब के ज्यादातर किस्से रोचक हैं.

लेखक ने शुरू में स्पष्ट कर दिया है कि यह न तो कथा है, न ही कथेतर, इन दोनों के बीच का नरेटिव प्रोज है, जिसे सुविधा के लिए किस्सा कहा गया है. चूंकि यह बतकही है, लिहाजा एक-दो जगहों पर मामूली चूक को दिलकश किस्सागोई की वजह से नजरअंदाज किया जा सकता है. इस किताब को वाकई कहीं से भी पढ़ा जा सकता है.

माउथ ऑर्गन

(कहानी और कहानी के नानाविध आकारों की आज़माइश)

लेखक: सुशोभित

प्रकाशक: एका-हिंद युग्म

कीमत: 130 रुपए

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